संयुक्त राष्ट्र की एमिशन गैप रिपोर्ट 2026 के मुताबिक वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से अधिक समय तक जाने से रोकने के लिए अगले दशक में हर साल औसतन लगभग 6 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना अनिवार्य हो गया है। चूंकि G20 देशों की वैश्विक उत्सर्जन में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सेदारी है, इसलिए इन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और विकसित देशों पर जलवायु कार्रवाई के लिए सबसे बड़ा दबाव है। रिपोर्ट बताती है कि 2025 के स्तर की तुलना में 2030 तक 18% और 2035 तक 45% की कटौती करनी होगी, जबकि देशों की मौजूदा राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं (NDCs) इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं और इनके आधार पर तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। अंताल्या में होने वाले COP31 सम्मेलन से पहले इस रिपोर्ट ने G20 नेताओं पर अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को कड़ाई से लागू करने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाने, जीवाश्म ईंधन व मीथेन पर नियंत्रण रखने और कार्बन हटाने की तकनीकों को अपनाने का कूटनीतिक दबाव और अधिक बढ़ा दिया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे के बीच विकसित अर्थव्यवस्थाओं और G20 देशों पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कटौती करने का दबाव बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के ताजा विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से अधिक समय तक जाने से रोकने के लिए अगले दशक में हर साल औसतन लगभग 6 प्रतिशत उत्सर्जन घटाना आवश्यक होगा।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की अक्टूबर 2026 में जारी एमिशन गैप रिपोर्ट 2026 में तापमान वृद्धि को न्यूनतम संभव स्तर तक सीमित रखने का रास्ता बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 के उत्सर्जन स्तर की तुलना में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2030 तक 18 प्रतिशत और 2035 तक 45 प्रतिशत की कमी करनी होगी।
इसके बाद वर्ष 2040 तक उत्सर्जन में 69 प्रतिशत की कटौती आवश्यक होगी। इसके साथ बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से हटाकर स्थायी रूप से संग्रहित करना भी जरूरी होगा। इस रणनीति के तहत मध्य सदी के आसपास तापमान वृद्धि को अधिकतम 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और वर्ष 2100 तक इसे फिर 1.5 डिग्री या उससे नीचे लाने का लक्ष्य है।
रिपोर्ट के मुताबिक, G20 देशों की वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक रणनीति में इन देशों की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने बड़े उत्सर्जक देशों से नेतृत्वकारी भूमिका निभाने की अपील की है।
उन्होंने कहा है कि तापमान का 1.5 डिग्री से ऊपर जाना हार मान लेने जैसा नहीं है, लेकिन इस सीमा के उल्लंघन को कम अवधि और न्यूनतम स्तर तक सीमित रखने का अवसर तेजी से कम हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, देशों की मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं (NDCs) को पूरी तरह लागू करने के बावजूद वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में केवल 5 से 8 प्रतिशत और 2035 तक 11 से 15 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है। यह वैज्ञानिक आकलन के आधार पर आवश्यक कटौती से काफी कम है।
वर्तमान नीतियों के आधार पर इस सदी में वैश्विक तापमान लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि G20 के कुछ देश अपने निर्धारित 2030 लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन सामूहिक प्रयास अभी भी जलवायु विज्ञान के अनुरूप आवश्यक स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं पर विशेष रूप से दबाव है, क्योंकि ऐतिहासिक उत्सर्जन में उनकी बड़ी भूमिका रही है और उनके पास तेजी से कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए अपेक्षाकृत अधिक वित्तीय एवं तकनीकी क्षमता उपलब्ध है। UNEP रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्सर्जन में तेजी से और लगातार कटौती करना अब भी संभव है।
इसके लिए ऊर्जा प्रणालियों और औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक बदलाव, नवीकरणीय ऊर्जा का तेजी से विस्तार, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कमी तथा मीथेन उत्सर्जन पर नियंत्रण आवश्यक है।
इसके अलावा वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने और उसे स्थायी रूप से संग्रहित करने वाली तकनीकों को भी बड़े स्तर पर विकसित करना होगा। तुर्किये के अंताल्या में COP31 सम्मेलन के बीच इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से G20 नेताओं पर अपनी निकट अवधि की जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूत करने और उन्हें जमीन पर लागू करने का कूटनीतिक दबाव बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि उत्सर्जन में तत्काल और पर्याप्त कटौती शुरू नहीं हुई, तो तापमान वृद्धि के 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर रहने की अवधि और उसका स्तर दोनों बढ़ सकते हैं। इससे पारिस्थितिकी तंत्र, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने का खतरा है।

