वेदांता समूह की कंपनी ‘हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड’ को कर्नाटक के गुंडलुपेट में दुर्लभ मृदा तत्व (REE) और यिट्रियम ब्लॉक के लिए पसंदीदा बोलीदाता (Preferred Bidder) चुना गया है और राज्य सरकार ने लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी किया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। वेदांता समूह की कंपनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को कर्नाटक के गुंडलुपेट में दुर्लभ मृदा तत्व (REE) और यिट्रियम ब्लॉक के लिए पसंदीदा बोलीदाता चुना गया है। राज्य सरकार ने कंपनी को खनन पट्टा दिए जाने की दिशा में लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी किया है।
हालांकि, इस घटनाक्रम की असली अहमियत केवल खनन ब्लॉक हासिल करने में नहीं, बल्कि इस क्षेत्र में मौजूद अनुमानित 41.9 लाख टन REO-युक्त भूवैज्ञानिक संसाधन में है। 314.21 हेक्टेयर में फैले गुंडलुपेट ब्लॉक में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के शुरुआती अध्ययनों में कार्बोनेटाइट-साइनाइट प्रणाली की पहचान की गई है।
सरकारी भूवैज्ञानिक कार्यों के अनुसार यहां करीब 41.9 लाख टन REO-bearing geological resource का अनुमान लगाया गया है, जिसमें कुल दुर्लभ मृदा ऑक्साइड (TREO) की औसत मात्रा लगभग 0.5 प्रतिशत है। यह आकलन 0.3 प्रतिशत के कटऑफ ग्रेड पर आधारित है।
हालांकि, इस आंकड़े को सीधे खनन योग्य भंडार मानना जल्दबाजी होगी। भूवैज्ञानिक संसाधन किसी क्षेत्र में मौजूद संभावित खनिज की मात्रा और गुणवत्ता का संकेत देता है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि पूरी मात्रा आर्थिक रूप से निकाली जा सके। इसके लिए विस्तृत ड्रिलिंग, खनिज संरचना का अध्ययन, धातुकर्म परीक्षण, रिकवरी दर, लागत और पर्यावरणीय व्यवहार्यता सहित कई चरणों की जांच आवश्यक होती है।
गुंडलुपेट इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक शुरुआती और पूरी तरह अन्वेषित संभावना नहीं है। GSI के अध्ययन में क्षेत्र में लगभग 1.7 किलोमीटर तक फैले कई कार्बोनेटाइट निकायों की पहचान की गई है। अन्वेषण कार्य G4 स्तर की प्रारंभिक पहचान से आगे बढ़कर G2 सामान्य अन्वेषण स्तर तक पहुंच चुका है। दुर्लभ मृदा तत्वों में नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे तत्व शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरणों और उच्च क्षमता वाले स्थायी चुंबकों में होता है।
ऐसे में भारत के लिए घरेलू REE संसाधनों की पहचान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन गुंडलुपेट परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती जमीन के नीचे मौजूद संसाधन को व्यावसायिक आपूर्ति में बदलने की होगी। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े संसाधन की मात्रा और औसत TREO ग्रेड बताते हैं, लेकिन इनमें आर्थिक रूप से वसूली योग्य भंडार, वास्तविक रिकवरी दर या अलग-अलग दुर्लभ तत्वों, खासकर नियोडिमियम-प्रसीओडिमियम और भारी REE जैसे डिस्प्रोसियम-टर्बियम, की विस्तृत मात्रा का पूरा आकलन सामने नहीं आया है।
हिंदुस्तान जिंक को लेकर कुछ रिपोर्टों में खनन पट्टा हासिल करने की बात कही गई है, लेकिन आधिकारिक प्रक्रिया की भाषा अधिक सावधानीपूर्ण है। कर्नाटक सरकार ने कंपनी को preferred bidder के रूप में चुना है और खनन पट्टा प्रदान करने की दिशा में Letter of Intent जारी किया है। इसलिए इसे अभी पूर्ण और अंतिम खनन पट्टा मिलना कहना सही नहीं होगा। हिंदुस्तान जिंक की स्थिति अन्य शुरुआती REE खोजकर्ताओं से अलग है। कंपनी के पास पहले से खनन क्षेत्र में संचालन का अनुभव, स्थापित बुनियादी ढांचा और अपेक्षाकृत मजबूत पूंजी आधार है। कंपनी ने दुर्लभ मृदा तत्वों के साथ-साथ टंगस्टन और पोटाश जैसे क्षेत्रों में भी विविधीकरण की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
फिर भी केवल खदान विकसित कर लेना भारत की दुर्लभ मृदा आपूर्ति श्रृंखला की पूरी समस्या का समाधान नहीं करेगा। REE की वास्तविक रणनीतिक ताकत अयस्क निकालने के बाद उसे अलग करने, शुद्ध करने, धातु में बदलने और अंततः उच्च गुणवत्ता वाले चुंबक तैयार करने की क्षमता में है। भारत में दुर्लभ मृदा संसाधन मौजूद होने के बावजूद चीन का दबदबा केवल खनन तक सीमित नहीं है। पृथक्करण, रिफाइनिंग, धातु उत्पादन और स्थायी चुंबकों के निर्माण जैसे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में चीन की स्थापित क्षमता भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
यही वजह है कि गुंडलुपेट को भारत की REE आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संभावित कदम तो माना जा सकता है, लेकिन इसे तत्काल चीन से स्वतंत्र दुर्लभ मृदा आपूर्ति श्रृंखला का आधार मानना उचित नहीं होगा। अब परियोजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आगे के अध्ययन खनिज संरचना के बारे में क्या बताते हैं, विशेष रूप से नियोडिमियम-प्रसीओडिमियम और भारी दुर्लभ मृदा तत्वों की वास्तविक उपलब्धता कितनी है, धातुकर्म प्रक्रिया में रिकवरी कितनी हासिल होती है और क्या बड़े पैमाने पर पृथक्करण एवं रिफाइनिंग की आर्थिक रूप से व्यवहार्य व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
इस लिहाज से गुंडलुपेट की कहानी फिलहाल “41.9 लाख टन का खनिज भंडार” नहीं, बल्कि 41.9 लाख टन के अनुमानित भूवैज्ञानिक संसाधन को वास्तविक और आर्थिक रूप से व्यवहार्य उत्पादन में बदलने की चुनौती है।
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