
अखिलेश मयंक
पर्यावरण की कीमत पर विकास कितना जायज है, इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर एक बार फिर बड़ी बहस शुरू हो गई है, क्योंकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्रशासित प्रदेश अंडमान निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार क्षेत्र में केंद्र सरकार के विकास की एक बड़ी बहुप्रतीक्षित परियोजना को मंजूरी दे दी। इस परियोजना की लागत 81 हजार करोड़ से अधिक है। यह बड़ी परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बनेगी। इसमें एक बंदरगाह, हवाईअड्डा, बड़ी सिटी और उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक पावर प्लांट का निर्माण जैसी चीजें शामिल हैं।
इसमें पर्यावरण की दृष्टि से दुखद बात यह है कि इस परियोजना को मूर्त रूप देने के लिए लगभग 130 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के साढ़े आठ लाख से अधिक पुराने पेड़ों को काटा जाएगा। जब काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या इतनी अधिक है, तो यहां के जीव-जंतुओं, उनके रहवासों, वनस्पतियों और कुल मिलाकर वहां के स्थानीय पारिस्थिकीय तंत्र को कितना नुकसान पहुंचेगा, वह एक बड़ा व विचारणीय प्रश्न है। रोचक बात यह है कि इन काटे गए साढ़े आठ लाख से अधिक पेड़ों के नुकसान की भरपाई निकोबार क्षेत्र से सैकड़ों मील दूर हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में पौधे लगाकर की जाएगी। हरियाणा के जिन क्षेत्रों में पौधरोपण किया जाएगा, वे गुरुग्राम, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, नूंह, चरखी-दादरी जैसे जिलों के होंगे, जो राज्य के शुष्क क्षेत्रों में गिने जाते हैं।
एनजीटी के इस फैसले के बाद विकास बनाम पर्यावरण की पुरानी बहस एक बार फिर शुरू हो गई है। विकास करना अच्छी बात है लेकिन उसे पर्यावरण की कीमत पर कतई स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि यह मानवता के लिए विनाश को न्यौतने जैसा है। दुखद है कि इस संबंध में पर्यावरणविदों की बहुत सारी चिंताओं को नजरअंदाज कर दिया गया। पर्यावरण को इतना अधिक नुकसान न पहुंचे, उसकी मात्रा कम हो, इसके लिए बहुत से विकल्प दिए गए थे। उन विकल्पों में एक यह भी था कि इतनी संख्या में पेड़ों को कटने से बचाने के लिए इस परियोजना को टुकड़ों में पूरा किया जाए लेकिन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को नहीं माना। एनजीटी ने कहा कि इस परियोजना की पर्यावरण मंजूरी में पर्यावरण की रक्षा के लिए पर्याप्त शर्तें और सुरक्षा उपाय शामिल हैं, इसलिए इसे रोकने या इसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है। ट्रिब्यूनल ने परियोजना की समीक्षा के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति के निष्कर्षों को स्वीकार किया, जिसने पर्यावरण संबंधी चिंताओं का समाधान करने का प्रयास किया है।
ट्रिब्यूनल ने इस तर्क को भी नहीं माना कि सारा विकास एक स्थान पर केंद्रित करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। जबकि इस तर्क में पर्याप्त दम था, क्योंकि ग्रेट निकोबार का यह क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। 2004 में आई विनाशकारी सुनामी में इस क्षेत्र का एक बड़ा क्षेत्र चार से 15 फीट तक नीचे समुद्र में धंस गया था, जो अभी भी समुद्र में ही डूबा हुआ है।
पर्यावरण की कीमत पर विकास की बात आने पर सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि ठीक है,आप खूब विकास कर लीजिए, खूब पैसा बना लीजिए लेकिन यह किसके काम आएगा, जब नागरिकों का जीवन ही दांव पर लग जाएगा। जब वहां पर रहने वालों को सांस लेने के लिए शुद्ध हवा तक नसीब नहीं होगी। आखिर हवा को शुद्ध करने का काम तो वृक्ष करते हैं, न कि इमारतें। ऐसे में यह विकास लोगों के जीवन की कीमत पर हो रहा है, अगर ऐसा कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा।
लोगों के जीवन की कीमत पर विकास का एक उदाहरण दिल्ली का ले सकते हैं, जहां का पर्यावरण आज बेहद दूषित है। पिछले दिनों दिल्ली में हवा की गुणवत्ता बुरी तरह गिर गई थी। एअर क्वालिटी इन्डेक्स (एक्यूआई) इतना बुरा हो गया था कि जनसामान्य को सांस लेने में तकलीफ होने लगी। तमाम बीमार व्यक्तियों और बुजुर्गों को डाक्टरों ने सलाह दी कि जब तक दिल्ली के वायु की गुणवत्ता सामान्य नहीं हो जाती, आप लोग किसी हिल स्टेशन या किसी वैकल्पिक जगह पर जाकर रहें। उस स्थान पर रहें, जहां की हवा सांस लेने लायक हो। आपके जीवन के हित में यही एकमात्र विकल्प है।
अब सवाल उठता है कि दिल्ली में बमुश्किल अपना पेट पालने वाले गरीब लोग कौन से हिल स्टेशन पर जाकर रहें ? जिन लोगों की ये हैसियत नहीं है कि वे अल्मोड़ा या रानीखेत जैसे हिल स्टेशनों या दूसरे शहरों में जाकर कुछ महीनों तक अपने रहने का वैकल्पिक इंतजाम करें, क्या वे लोग दुनिया छोड़ दें? इस मामले में एक आम शहरी नागरिक के सामने कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं?
दिल्ली की अरावली पर्वतश्रृंखला को राजधानी का फेफड़ा कहा जाता है। पुराने लोगों को पता होगा कि कभी दिल्ली के आज के सबसे घनी बसावट वाले करोलबाग, झंडेवालान जैसे इलाकों में डायनामाइट लगाकर जमीन समतल की जाती थी, ताकि यहां का विकास हो सके। यहां कालोनियां बन सकें, लोगों को बसाया जा सके। आज दिल्ली पूरी तरह बस गई है। खूब बस गई है। बसती ही जा रही है पर बुरी तरह प्रदूषित है। वहां की हवा में जहर है। मौजूदा समय में अरावली पर्वतश्रृंखला के 30 प्रतिशत से अधिक वनक्षेत्र समाप्त हो गए हैं। उसका नतीजा यह है कि गर्मी में राजस्थान के रेगिस्तान से आने वाली गर्म और धूलभरी हवाएं राजधानी का तापमान इतना अधिक बढ़ा देती हैं कि वहां गर्मी असहनीय हो जाती है। अब निकोबार में जिस क्षेत्र के साढ़े आठ लाख से अधिक पेड़ एक साथ काटे जाएंगे, वहां के पर्यावरण का कितना विनाश होगा? उस क्षेत्र में आकर बसने वाले लोगों के सामने आने वाले दिनों में कितना और कैसा संकट आएगा?
अत्यधिक गर्मी के चलते राजधानी दिल्ली का ग्राउंडवाटर लेवल बहुत नीचे चला गया है। जिससे हर वर्ष गर्मी में शुद्ध पेयजल के संकट से भी जूझना पड़ता है। अब यहां हवा की गुणवत्ता बद से बदतर हो जाने के बाद लोगों के घरों में एअरप्यूरीफायर तो बढ़ गए हैं लेकिन विभिन्न विकास परियोजानाओं के नाम पर पेड़ अभी भी काटे जा रहे हैं। यहां की हवा की गुणवत्ता दिनोंदिन बदतर हो रही है। यही वजह है कि लोगों को हिल स्टेशनों पर जाने या रहने के लिए वैकल्पिक स्थान चुनने की डाक्टरी सलाहें मिल रही हैं। इसी का दूसरा खतरनाक पक्ष यह भी है कि लोगों को फेफड़े, त्वचा आदि संबंधी तमाम ऐसी घातक बीमारियां भी हो रही हैं, जिनका सीधा संबंध अंधाधुंध बढ़ते जानलेवा प्रदूषण से है। दिल्ली में प्रदूषणजनित बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या हर साल बढ़ रही है। राजधानी में अस्पताल तो तेजी से खुल रहे हैं लेकिन यहां इलाज करवाना आम नागरिकों की पहुंच से दूर है। अब जब लोग ही स्वस्थ नहीं रहेंगे, तो वे विकास को लेकर क्या करेंगे? आखिरकार, प्राथमिक चीज तो स्वस्थ शरीर है। जब शरीर और जीवन सुरक्षित होगा, तभी तो कोई व्यक्ति विकास का, उससे उत्पन्न सुविधाओं का उपभोग कर पाएगा। अगर अभी भी ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में दिल्ली की स्थिति इतनी बिगड़ सकती है कि वहां पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी लगानी पड़ सकती है।
दिल्ली का उदाहरण देने का उद्देश्य यही था कि पहले हमारे लिए पर्यावरण जरूरी है। क्योंकि यह सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी के साथ जुड़ा हुआ है। इसलिए विकास हो लेकिन पर्यावरण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय पारिस्थितिकीय संतुलन पर जोर दिया जाना चाहिए। क्योंकि यही मानवता के हित में है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पब्लिक पॉलिसी मामलों के जानकार हैं।)


