मांगे राम चौहान

यूरोप जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव झेल रहा है और वर्तमान में यह दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। वर्ष 1990 की तुलना में यहां का औसत तापमान 2.19 से 2.26 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है। बढ़ते तापमान के कारण हीट वेव, बाढ़, सूखा, जंगल की आग और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने जैसी चरम मौसमी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। वर्ष 1980 से 2024 के बीच इन आपदाओं से करीब 4.41 लाख लोगों की मौत हुई, जबकि 822 अरब यूरो से अधिक का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया। यूरोप में हीट वेव सबसे गंभीर चुनौती बनकर उभरी है।
वर्ष 2003, 2022 और 2025-26 की भीषण गर्मी के दौरान हजारों लोगों की जान गई। स्पेन, इटली, फ्रांस और ग्रीस जैसे देशों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान सामान्य होता जा रहा है। इससे हृदय रोग, श्वास संबंधी बीमारियां, डिहाइड्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। वृद्ध, बच्चे और श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यदि हालात नहीं बदले तो वर्ष 2050 तक गर्मी से हर साल लगभग 1.20 लाख मौतें हो सकती हैं। बढ़ते तापमान के साथ बाढ़ और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में भी तेजी आई है। वर्ष 2024 में पोलैंड, चेक गणराज्य और ऑस्ट्रिया सहित मध्य यूरोप के कई हिस्सों में विनाशकारी बाढ़ ने व्यापक तबाही मचाई। वहीं दक्षिणी यूरोप में सूखा और जंगल की आग लगातार गंभीर होती जा रही है। स्पेन, पुर्तगाल और ग्रीस में जल संकट गहराने से कृषि प्रभावित हुई है और जैतून, अंगूर समेत कई फसलों का उत्पादन घटा है। आल्प्स क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर वर्ष 2015 के बाद लगभग एक-चौथाई तक पिघल चुके हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और नीदरलैंड, वेनिस सहित कई तटीय क्षेत्रों पर खतरा मंडरा रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर कृषि, पर्यटन, ऊर्जा और बीमा क्षेत्रों पर भी साफ दिखाई दे रहा है।
वर्ष 2023 में अकेले चरम मौसमी घटनाओं से 45 अरब यूरो का आर्थिक नुकसान हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल कमी नहीं लाई गई और जलवायु अनुकूलन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। यूरोप का मौजूदा संकट पूरी दुनिया के लिए स्पष्ट चेतावनी है कि अनियंत्रित विकास और पर्यावरण की अनदेखी का परिणाम मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी पड़ रहा है।
(लेखक उत्तर प्रदेश राज्य सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और पर्यावरण मामलों के गहरे जानकार हैं।)


