वैश्विक जलवायु रणनीति में एक बड़ा बदलाव आया है क्योंकि 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पूरी तरह रोकना अब असंभव सा हो गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की ‘एमिशन गैप रिपोर्ट 2026’ (शीर्षक: ‘द पॉइंट ऑफ रिटर्न’) के मुताबिक, आने वाले वर्षों में तापमान का इस सीमा से ऊपर जाना तय है, जो कि जलवायु संघर्ष में हार नहीं बल्कि रणनीति में बदलाव का संकेत है। इस सदी के अंत तक तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने के लिए, वैश्विक तापमान को मध्य सदी तक अधिकतम 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक ही सीमित रखना होगा। इसके लिए 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 18%, 2035 तक 45% और 2040 तक 69% की भारी कटौती करनी होगी। इसके अतिरिक्त, केवल उत्सर्जन कम करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इस सदी के दौरान वातावरण से लगभग 320 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड को हटाकर स्थायी रूप से भंडारित करना होगा। हालांकि वर्तमान नीतियां इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं, फिर भी नवीकरणीय ऊर्जा के प्रसार, जीवाश्म ईंधन से दूरी और मीथेन नियंत्रण जैसे सकारात्मक प्रयासों को बड़े पैमाने पर लागू करके तापमान वृद्धि को न्यूनतम और कम अवधि का रखा जा सकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक रणनीति में अब एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया के सामने 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पूरी तरह रोकने की चुनौती लगभग असंभव होती जा रही है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय जलवायु नीतियों का जोर अब तापमान वृद्धि को यथासंभव सीमित रखने, इसके प्रभाव की अवधि कम करने और वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने पर केंद्रित हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की 21 अक्टूबर को जारी एमिशन गैप रिपोर्ट 2026 का शीर्षक ‘द पॉइंट ऑफ रिटर्न’ इसी रणनीतिक बदलाव को रेखांकित करता है। रिपोर्ट के अनुसार, दशकों तक पर्याप्त जलवायु कार्रवाई नहीं होने के कारण 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को बिना या बहुत सीमित तापमान वृद्धि के साथ बनाए रखने का अवसर अब समाप्त हो चुका है।
आने वाले वर्षों में वैश्विक तापमान का पेरिस जलवायु समझौते के सबसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य से ऊपर जाना लगभग तय माना जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने रिपोर्ट के साथ जारी अपने संदेश में कहा कि तापमान का 1.5 डिग्री से ऊपर जाना जलवायु संघर्ष में हार मान लेने जैसा नहीं है।
दुनिया अब भी इस बढ़ोतरी को न्यूनतम और कम अवधि का रख सकती है तथा सदी के अंत तक तापमान को फिर 1.5 डिग्री से नीचे ला सकती है। रिपोर्ट में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि को न्यूनतम रखने के लिए एक संभावित परिदृश्य प्रस्तुत किया गया है। इसके तहत वैश्विक तापमान मध्य सदी के आसपास अधिकतम 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इस रणनीति के प्रभावी क्रियान्वयन से वर्ष 2100 तक वैश्विक औसत तापमान को फिर 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने की लगभग 50 प्रतिशत संभावना जताई गई है।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वर्ष 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत की कटौती आवश्यक होगी। इसका अर्थ है कि 2025 से 2035 के बीच उत्सर्जन में हर वर्ष औसतन लगभग 5.7 प्रतिशत की कमी करनी होगी। यह कटौती दर पहले आईपीसीसी के जलवायु मार्गों में बताई गई दरों से भी अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि देश अपने मौजूदा राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) को पूरी तरह लागू भी कर दें, तब भी वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में केवल 5 से 8 प्रतिशत और 2035 तक 11 से 15 प्रतिशत की कमी होने का अनुमान है। ऐसी स्थिति में इस सदी के दौरान वैश्विक तापमान लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। वहीं, वर्तमान में लागू नीतियों के आधार पर तापमान वृद्धि लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि मौजूदा स्तर पर उत्सर्जन जारी रहने के प्रत्येक पांच वर्ष से तापमान में अधिकतम वृद्धि का स्तर लगभग 0.1 डिग्री सेल्सियस और बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, केवल उत्सर्जन में कटौती से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान वापस लाना संभव नहीं होगा। इसके लिए इस सदी के दौरान वातावरण से लगभग 320 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड हटाकर उसका स्थायी भंडारण करना होगा। यह मात्रा वर्ष 2024 में दुनिया के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लगभग आठ वर्षों के बराबर है। हालांकि, इतनी बड़ी मात्रा में कार्बन हटाने की तकनीक और उसके आर्थिक एवं सामाजिक प्रभावों को लेकर कई चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीक को जीवाश्म ईंधन के उपयोग में तेजी से कमी लाने और उत्सर्जन नियंत्रण के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके पूरक के रूप में अपनाया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में चुनौतियों के साथ जलवायु नीतियों के सकारात्मक परिणामों का भी उल्लेख किया गया है। बिजली उत्पादन सहित विभिन्न क्षेत्रों में लागू नीतियों से उत्सर्जन में कमी के प्रमाण मिले हैं। इसके अलावा नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापना और उपयोग में तेजी आई है। रिपोर्ट के अनुसार, इन सफल प्रयासों को बड़े स्तर पर लागू करने, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने और मीथेन उत्सर्जन पर नियंत्रण करने की जरूरत है।
कुल मिलाकर, वैश्विक जलवायु नीति अब केवल 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने से रोकने तक सीमित नहीं रह गई है। इसके बजाय लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि तापमान इस सीमा से जितना कम ऊपर जाए और जितनी कम अवधि तक रहे, उतना बेहतर होगा, ताकि सदी के अंत तक पृथ्वी को फिर इस सुरक्षित तापमान सीमा के करीब लाया जा सके। यही यूएनईपी की रिपोर्ट का केंद्रीय संदेश है कि जलवायु कार्रवाई के लिए वापसी का निर्णायक समय अब है।
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