केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 में किसी विशिष्ट परियोजना की स्टेज-II वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति का कोई प्रावधान नहीं है और ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। इस स्पष्टीकरण को लेकर कांग्रेस और आदिवासी अधिकार संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है, उनका आरोप है कि यह रुख सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक नियामगिरि फैसले और पूर्व के दिशा-निर्देशों के विपरीत है तथा इससे वन-निवासी समुदायों के अधिकार कमजोर होंगे।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 यानी वन अधिकार अधिनियम (FRA) में किसी विशिष्ट परियोजना की वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है। मंत्रालय के इस स्पष्टीकरण के बाद वन प्रशासन, आदिवासी अधिकारों और संरक्षण व्यवस्था को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
31 अगस्त को बिजली मंत्रालय के राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) डेस्क को भेजे गए आधिकारिक पत्र में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने कहा कि FRA और उसके तहत बनाए गए नियमों में स्टेज-II वन मंजूरी के लिए ग्राम सभा की सहमति प्राप्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।
मंत्रालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामले उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। यह स्पष्टीकरण सरकारी परियोजनाओं, खासकर जलविद्युत परियोजनाओं में देरी को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आया है। परियोजनाओं के लिए 100 प्रतिशत ग्राम सभा सहमति की आवश्यकता को एक महत्वपूर्ण बाधा बताया जाता रहा है। सार्वजनिक उपक्रमों संबंधी संसदीय समिति ने इससे पहले राष्ट्रीय महत्व की बड़ी परियोजनाओं के लिए सहमति की सीमा को 70-75 प्रतिशत तक करने की संभावना तलाशने का सुझाव दिया था।
हालांकि FRA में वन भूमि को गैर-वानिकी इस्तेमाल के लिए हस्तांतरित करने के संबंध में ग्राम सभा की सहमति को स्पष्ट रूप से अनिवार्य नहीं किया गया है, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत जारी दिशा-निर्देशों में वन भूमि के औपचारिक हस्तांतरण से पहले FRA की प्रक्रियाएं पूरी करना जरूरी है। इनमें वन अधिकार धारकों की पहचान, अधिकारों की मान्यता और उनका निहित होना तथा संबंधित ग्राम सभा से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) लेना शामिल है।
व्यवहार में इस NOC प्रक्रिया को लंबे समय से ग्राम सभा की सहमति के महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में देखा जाता रहा है। FRA के क्रियान्वयन के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय नोडल मंत्रालय है। कांग्रेस और आदिवासी तथा वन निवासी संगठनों के नेटवर्क कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी समेत आलोचकों ने मंत्रालय पर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने और सामुदायिक सुरक्षा उपायों को कमजोर करने का आरोप लगाया है।
उनका कहना है कि मंत्रालय का मौजूदा रुख पहले जारी सरकारी परिपत्रों, संसद में दिए गए जवाबों और सुप्रीम कोर्ट के 2013 के नियामगिरि फैसले से विरोधाभासी है। नियामगिरि मामले में अदालत ने आदिवासी और सामुदायिक अधिकारों से जुड़े मामलों में ग्राम सभा की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था। अधिकार समूहों ने मंत्रालय से इस स्पष्टीकरण को वापस लेने की मांग की है।
उनका कहना है कि सहमति संबंधी सुरक्षा उपायों को कमजोर करने से वन भूमि के हस्तांतरण में तेजी आ सकती है और सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा में ग्राम सभाओं की लोकतांत्रिक भूमिका प्रभावित हो सकती है। इस घटनाक्रम ने विकास परियोजनाओं और वन-निर्भर समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस को और तेज कर दिया है।
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