देश के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों, विशेषकर अरावली पर्वतमाला और पूर्वोत्तर के नागालैंड जैसे पहाड़ी इलाकों में दी जा रही पर्यावरणीय मंजूरियों और भू-भाग की अस्थिरता को लेकर नागरिक समूहों और अदालतों की निगरानी काफी बढ़ गई है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अनियोजित विकास, खनन और वनों की कटाई के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं। अदालतों ने इन मामलों में कड़ी समीक्षा, स्वतंत्र आकलन और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों के पालन पर ज़ोर देते हुए अतिरिक्त डेटा की मांग की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अस्थिरता के पीछे बदलते वर्षा पैटर्न, भूगर्भीय स्थितियां और मानवीय कारक ज़िम्मेदार हैं, इसलिए किसी भी बड़े विकास से पहले वैज्ञानिक और व्यापक अध्ययन बेहद ज़रूरी हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: देश के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से दी जा रही पर्यावरणीय मंजूरियों और भू-भाग के अस्थिर होने की रिपोर्टों को लेकर नागरिक समूहों और अदालतों की निगरानी बढ़ गई है।
खासतौर पर अरावली पर्वतमाला और पूर्वोत्तर के नागालैंड समेत पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यावरणीय आकलन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामुदायिक संगठनों ने संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को मिली मंजूरियों के खिलाफ याचिकाएं और जनहित याचिकाएं दायर की हैं।
अदालतों ने कई मामलों में विस्तृत समीक्षा, स्वतंत्र आकलन और पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों के कड़ाई से पालन पर जोर दिया है। अरावली क्षेत्र में खनन, शहरी विस्तार और वनों की कटाई के बीच परियोजनाओं की मंजूरी को लेकर चिंता जताई गई है। वहीं, नागालैंड और आसपास के पहाड़ी इलाकों में जमीन धंसने और भू-स्थिरता संबंधी संकेतों ने भी चिंता बढ़ाई है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे भूगर्भीय परिस्थितियों, बदलते वर्षा पैटर्न और सड़क निर्माण, खनन व अनियोजित विकास जैसे मानवीय कारकों की भूमिका हो सकती है। अदालतों ने कुछ मामलों में मिट्टी की स्थिरता, जल विज्ञान और परियोजनाओं के संचयी पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ा अतिरिक्त डेटा मांगा है। नागरिक समूहों का कहना है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास से पहले वैज्ञानिक, पारदर्शी और व्यापक अध्ययन जरूरी हैं।
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