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Environment Pulse > ईको सिस्टम > दुनिया में वन्यजीवों की आबादी में 53 वर्षों में 73% की गिरावट
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ईको सिस्टम

दुनिया में वन्यजीवों की आबादी में 53 वर्षों में 73% की गिरावट

Environment Pulse
Last updated: November 2, 2026 8:23 pm
Environment Pulse
Published: November 2, 2026
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वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) की ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026’ के मुताबिक, वर्ष 1970 से 2022 के बीच निगरानी में शामिल कशेरुकी वन्यजीवों की आबादी के औसत आकार में 73 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में 5,790 प्रजातियों की 35,803 आबादियों का विश्लेषण किया गया है। आवास के आधार पर सबसे बुरी स्थिति मीठे पानी की प्रजातियों की रही है, जिनकी आबादी में 85% की कमी आई है। वहीं भौगोलिक रूप से लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में सबसे अधिक 95% की गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट में प्राकृतिक आवासों का विनाश, अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को इसका मुख्य कारण बताया गया है। हालांकि, ‘द साइंस ऑफ होप’ (उम्मीद का विज्ञान) विषय पर आधारित इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि प्रभावी संरक्षण उपायों से बाघों और समुद्री कछुओं जैसी कुछ प्रजातियों की आबादी में सुधार हुआ है, जिसके लिए खाद्य, ऊर्जा और वित्तीय प्रणालियों में व्यापक बदलाव की आवश्यकता है। 

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : दुनिया भर में वन्यजीवों और जैव विविधता पर बढ़ते संकट के बीच वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) की ताजा लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2026 ने चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1970 से 2022 के बीच निगरानी में शामिल कशेरुकी वन्यजीवों की आबादी के औसत आकार में 73 प्रतिशत की गिरावट आई है।

हालांकि, रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू यह भी सामने आया है कि निगरानी की जा रही लगभग आधी वन्यजीव आबादियां स्थिर हैं या उनमें वृद्धि दर्ज की गई है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित यह रिपोर्ट जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन (ZSL) द्वारा तैयार किए गए लिविंग प्लैनेट इंडेक्स पर आधारित है।

इसमें स्तनधारियों, पक्षियों, सरीसृपों, उभयचरों और मछलियों की 5,790 प्रजातियों की कुल 35,803 आबादियों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1970 से 2022 के बीच निगरानी में शामिल वन्यजीव आबादियों के औसत आकार में लगभग 2.5 प्रतिशत सालाना की दर से गिरावट आई।

कुल आबादियों में से 50 प्रतिशत में कमी दर्ज की गई, जबकि 43 प्रतिशत आबादियों में वृद्धि हुई और 7 प्रतिशत स्थिर रहीं। आवास के आधार पर मीठे पानी में रहने वाली प्रजातियों की स्थिति सबसे चिंताजनक रही। इनकी आबादी के औसत आकार में 85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके मुकाबले स्थलीय प्रजातियों में 69 प्रतिशत और समुद्री प्रजातियों में 59 प्रतिशत की कमी आई।

रिपोर्ट में विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के बीच वन्यजीव आबादी में गिरावट का बड़ा अंतर सामने आया है। लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में औसतन 95 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि अफ्रीका में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत रहा। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में 49 प्रतिशत, उत्तरी अमेरिका में 28 प्रतिशत और यूरोप तथा मध्य एशिया में 23 प्रतिशत की औसत गिरावट दर्ज की गई।

रिपोर्ट में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का विनाश और उनका क्षरण जैव विविधता में गिरावट का सबसे प्रमुख कारण बताया गया है। इसके अलावा प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, बाहरी आक्रामक प्रजातियां और बीमारियां भी वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बनी हुई हैं। गंभीर आंकड़ों के बावजूद रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि प्रभावी संरक्षण उपायों से वन्यजीव आबादियों को फिर से बढ़ाया जा सकता है।

हरे समुद्री कछुओं, ब्लूफिन टूना मछलियों, बाघों और दक्षिणी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में हाथियों की आबादी में सुधार इसके उदाहरण हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 के बाद बाघों की आबादी में 70 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। ये उदाहरण बताते हैं कि लक्षित संरक्षण कार्यक्रम, प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और प्रभावी प्रबंधन से सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

WWF ने इस वर्ष की रिपोर्ट को ‘द साइंस ऑफ होप’ यानी उम्मीद का विज्ञान विषय के तहत प्रस्तुत किया है। संगठन का मानना है कि प्रकृति के लगातार हो रहे नुकसान को रोकने के लिए केवल अलग-अलग प्रजातियों के संरक्षण के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए खाद्य उत्पादन, ऊर्जा उपयोग और वित्तीय प्रणालियों में व्यापक बदलाव आवश्यक हैं। संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ प्रजातियों की आबादी में सुधार उत्साहजनक है, लेकिन कई अन्य प्रजातियों में लगातार हो रही गिरावट वैश्विक जैव विविधता के औसत को नीचे खींच रही है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि वन्यजीवों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और व्यापक स्तर पर कार्रवाई जरूरी है। प्राकृतिक आवासों को बचाने, प्रदूषण नियंत्रित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को प्राथमिकता देकर ही जैव विविधता में गिरावट की मौजूदा प्रवृत्ति को पलटा जा सकता है।

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