ब्रिक्स देशों (BRICS) के पर्यावरण मंत्रियों ने नई दिल्ली में हुई 12वीं बैठक के बाद यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को ‘दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी’ करार दिया है। भारत की 2026 अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। विस्तारित ब्रिक्स समूह के पर्यावरण मंत्रियों ने यूरोपीय संघ (EU) के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) की कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘एकतरफा, दंडात्मक, भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी’ करार दिया है।
नई दिल्ली में भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत आयोजित 12वीं ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक के समापन पर मंगलवार को संयुक्त मंत्रिस्तरीय बयान जारी किया गया।
बैठक में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के मंत्रियों या वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
संयुक्त बयान में ब्रिक्स देशों ने कहा कि वे ऐसे एकतरफा और दंडात्मक उपायों का विरोध करते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने विशेष रूप से CBAM पर चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह के उपाय विकासशील देशों के जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से निपटने, अनुकूलन क्षमता बढ़ाने और लचीलेपन को मजबूत करने के प्रयासों को कमजोर कर सकते हैं।
यूरोपीय संघ का CBAM एक जनवरी 2026 से अपने निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। इसके तहत आयरन और स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसे कार्बन-गहन उत्पादों के आयातकों को ऐसे प्रमाणपत्र खरीदने होते हैं, जो यूरोपीय उत्पादकों द्वारा EU Emissions Trading System के तहत चुकाई जाने वाली कार्बन कीमत को दर्शाते हैं।
मूल देश में पहले से चुकाई गई कार्बन कीमत का समायोजन भी इसमें किया जाता है। ब्रिक्स देशों का तर्क है कि यह व्यवस्था विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर डीकार्बोनाइजेशन का अतिरिक्त बोझ डालती है। उनका कहना है कि इन देशों का ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम रहा है और उनके पास जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों की तुलना में सीमित संसाधन हैं।
भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका पहले भी चिंता जता चुके हैं कि CBAM से उनके स्टील, एल्युमिनियम और अन्य निर्यात उद्योगों की लागत बढ़ सकती है तथा यह गैर-टैरिफ व्यापार बाधा के रूप में काम कर सकता है। बैठक में विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त में उल्लेखनीय वृद्धि की भी मांग की गई। ब्रिक्स मंत्रियों ने कहा कि वित्तीय सहायता नई, अतिरिक्त, पूर्वानुमेय, पर्याप्त और आसानी से सुलभ होनी चाहिए। उन्होंने अनुदान और रियायती वित्तपोषण को प्राथमिकता देने की वकालत की, ताकि विकासशील देशों पर कर्ज का अतिरिक्त बोझ न पड़े।
मंत्रियों ने आगामी संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलनों से पहले विकसित देशों से अनुकूलन वित्त बढ़ाने का भी आग्रह किया। बैठक की अध्यक्षता केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान, प्रदूषण और आपदा जोखिमों से उत्पन्न बढ़ती चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने वनाग्नि प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन सहित विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग मजबूत करने पर जोर दिया।
यूरोपीय संघ का कहना है कि CBAM का उद्देश्य ‘कार्बन लीकेज’ को रोकना है, यानी ऐसी स्थिति जिसमें अधिक उत्सर्जन करने वाले उद्योग अपेक्षाकृत कमजोर पर्यावरणीय नियमों वाले देशों में स्थानांतरित हो जाएं। EU का यह भी तर्क है कि यह व्यवस्था समान प्रतिस्पर्धी माहौल तैयार करती है और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप है। ब्रिक्स का यह संयुक्त बयान समूह की ओर से CBAM के खिलाफ अब तक के सबसे स्पष्ट और एकजुट विरोधों में से एक माना जा रहा है।
यह ऐसे समय आया है जब भारत और ब्राजील समेत कुछ सदस्य देश यूरोपीय संघ के साथ अलग-अलग व्यापारिक बातचीत भी जारी रखे हुए हैं। बैठक में टिकाऊ जीवनशैली, पारिस्थितिकी तंत्र बहाली, जंगल की आग से निपटने की तैयारी और लोगों को केंद्र में रखकर जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देने के लिए सहयोगात्मक ढांचों को भी मंजूरी दी गई।
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