जब हम भारत के भूगोल को देखते हैं, तो एक बात साफ़ समझ आती है कि हमारे पास प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। हर राज्य की अपनी एक भौगोलिक खूबी है। कहीं घने जंगल हैं, कहीं ऊँचे पहाड़ हैं, तो कहीं बारहमासी नदियाँ बह रही हैं। कुल मिलाकर कहें तो जीने के लिए जो कुछ भी ज़रूरी है, वह सब हमें प्रकृति ने मुफ़्त में दे रखा है। विकास होना आवश्यक है, परंतु केवल विकास के नाम पर यदि प्रकृति को अंधाधुंध नुकसान पहुँचाया जाएगा, तो इसके भारी दुष्प्रभाव भी झेलने पड़ेंगे। दुर्भाग्य से हमारे यहां यही हो रहा है। क्या हैं पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियां और क्या हैं इनके उपाय? विस्तार से बता रहे हैं नितिश शर्मा।

नितिश शर्मा
हमारे देश के कोने-कोने में प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है। लगभग प्रत्येक राज्य किसी न किसी प्राकृतिक संसाधन के कारण प्रसिद्ध है। देश में प्राणदायिनी प्राकृतिक औषधियों के वृक्ष, बड़ी-बड़ी नदियाँ, ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगल, विशाल पर्वत, हरे-भरे मैदान, खनिज, उपजाऊ जमीन, झीलें और नाना प्रकार के जीव-जंतु पाए जाते हैं। इसके अलावा हमें साँस लेने के लिए स्वच्छ हवा, पीने के लिए शुद्ध जल, खेती के लिए उपजाऊ मिट्टी, घर बनाने के लिए लकड़ी और पत्थर तथा उद्योगों के लिए प्राकृतिक खनिज मिलते हैं।
हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने की तरफ तेजी से अग्रसर है। देश में नए-नए राजमार्ग, राज्यमार्ग और सड़कें बन रही हैं। भव्य शहर बस रहे हैं। नए उद्योग बढ़ रहे हैं तथा सरकारी व निजी कार्यालयों का निर्माण हो रहा है। इस विकास के साथ-साथ लोगों की ज़रूरतें भी पहले के मुकाबले बहुत बढ़ गई हैं। विकास होना आवश्यक है, परंतु केवल विकास के नाम पर यदि प्रकृति को अंधाधुंध नुकसान पहुँचाया जाएगा, तो इसके भारी दुष्प्रभाव भी झेलने पड़ेंगे। दुर्भाग्य से हमारे यहां यही हो रहा है।
आज पूरे देश में प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित प्रयोग हो रहा है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति ने हमें जीवन निर्वाह के लिए जो उपहार दिए हैं, हम उसका सीमा से अधिक दोहन कर रहे हैं। प्रकृति की क्षमता से कई गुना अधिक हम उससे जबरन ले रहे हैं। नदियों से हमें रेत प्राप्त होती है, परंतु मनुष्य आवश्यकता से अधिक अवैध खनन कर रहा है। शहरीकरण और उद्योगों के विस्तार के लिए हरे-भरे जंगलों को काटा, पहाड़ों को तोड़ा जा रहा है। खेती योग्य उपजाऊ जमीन का उपयोग अन्य कामों में हो रहा है। फैक्ट्रियों के कचरे से नदियों का पानी दूषित हो चुका है और पानी की अनियंत्रित बर्बादी से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। इसके अलावा, प्रकृति में कुछ ऐसे भी संसाधन हैं, जो एक बार नष्ट हो जाने पर पुनः प्राप्त करना असंभव है या फिर उनके दोबारा बनने में लाखों-करोड़ों वर्ष का लंबा समय लग सकता है। जैसे: कोयला, पेट्रोलियम, खनिज और प्राकृतिक गैस।
यह समस्या कब से और क्यों पैदा हुई?
संसाधनों के इस अनियंत्रित उपभोग का यह चलन बमुश्किल पिछले 30-40 वर्षों में तेज़ी से शुरू हुआ है। पहले के लोग प्रकृति के साथ समझदारी और सूझ-बूझ से एक संतुलन बनाकर चलते थे। इससे न तो प्रकृति पर अतिरिक्त बोझ पड़ता था और न ही उसे कोई नुकसान पहुँचता था। उस समय जितनी आवश्यकता होती थी, केवल उतने ही संसाधनों का उपयोग किया जाता था लेकिन पिछले तीन-चार दशकों में स्थिति तेजी से बदली है, जिसका मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि है। जब आबादी बढ़ी, तो मानव की ज़रूरतें भी बढ़ती चली गईं। उन ज़रूरतों को पूरा करने और जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू हुआ। नए हाईवे और सड़कें बनाई गईं, शहरों का विस्तार हुआ और भारी उद्योग लगाए जाने लगे। मानव बस्तियों को बसाने के लिए भविष्य के परिणामों को सोचे बिना, पहाड़ों और जंगलों का बेतहाशा दोहन किया जाने लगा।
आज हर व्यक्ति बेहतर गाड़ी, आलीशान घर, अच्छी सड़कें, मोबाइल, चौबीसों घंटे बिजली और आरामदायक सुविधाएं चाहता है। परंतु उसे शायद इस बात का आभास नहीं है कि इन सभी आधुनिक सुविधाओं के निर्माण और उनके उपभोग के लिए प्राकृतिक संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है। इसीलिए विकास के नाम पर हज़ारों पेड़ काटे जा रहे हैं और हरे-भरे जंगलों को पूरी तरह नष्ट किया जा रहा है। नदियाँ और पहाड़ भी इससे अछूते नहीं हैं। विकास की आड़ में प्रकृति का बेरहमी से शोषण किया जा रहा है। कई जगह प्राकृतिक पहाड़ों को तोड़ा जा रहा है, तो कहीं नदियों में अवैध रेत खनन हो रहा है। भूमिगत जल का इतना अधिक दोहन किया जा रहा है कि कई स्थानों पर सूखे जैसी स्थिति बन गई है और हैंडपंप व कुएं सूखने लगे हैं।
लोगों की मानसिकता यह बन चुकी है कि वे जितनी अधिक चीजों का उपभोग और संसाधनों का दिखावा करेंगे, उनका जीवन उतना ही बेहतर माना जाएगा। इसी कारणवश अपनी आवश्यकता से ज़्यादा वस्तुएँ खरीदी और उपयोग की जाने लगी हैं। इन सभी वस्तुओं को बनाने में भारी मात्रा में लकड़ी, बिजली, पानी, खनिज, धातु और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की ज़रूरत पड़ती है। धीरे-धीरे उपभोग की यही आदत प्रकृति पर उसकी क्षमता से कहीं अधिक भार डालकर उसे विनाश की तरफ ले जा रही है। बहुत सी जगहों पर पर्यावरण के नियमों की अनदेखी समस्या को और भी गंभीर बना रही है।
वैश्विक तापमान बढ़ा, मौसम का चक्र भी बदला
जब जंगलों और शहरी क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई होती है, तो वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बहुत बढ़ जाता है। इससे वैश्विक तापमान बढ़ता है और मौसम का चक्र भी बदलने लगता है। नदियों से आवश्यकता से अधिक रेत निकालने के कारण उनका प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। इससे कई जगहों पर उनका बहाव प्रभावित होता है और बाढ़ का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
भूजल स्तर नीचे गिरने से देश में बहुत से ऐसे इलाके और गाँव हैं जो सूखाग्रस्त हैं; वहाँ लोगों को पानी के लिए मीलों दूर जाना पड़ता है। उनके पास पीने तक के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध नहीं है। पानी की कमी के कारण खेती करना भी अत्यंत मुश्किल होता जा रहा है। पर्याप्त सिंचाई न हो पाने से उपजाऊ भूमि बंजर में बदलती जा रही है, जिससे आम किसान सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है और उसका जीवनयापन करना मुश्किल हो गया है।
पहाड़ों पर हो रहे अवैध खनन से पहाड़ बहुत कमज़ोर हो गए हैं, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएँ बढ़ रही हैं। जंगलों की कटाई से वहाँ रहने वाले जीव-जंतु बहुत अधिक प्रभावित हुए हैं। प्राकृतिक आवास न होने के कारण वे शहरों की तरफ भाग रहे हैं और वन्यजीवों की कई प्रजातियाँ तो विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी हैं।
इन समस्याओं के लिए कौन ज़िम्मेदार?
प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग किसी एक व्यक्ति या विभाग द्वारा नहीं किया जा रहा है; इसके लिए समाज के लोग और विभिन्न संस्थान अलग-अलग स्तर पर ज़िम्मेदार हैं। सर्वप्रथम ज़िम्मेदारी सरकार की बनती है कि वह पर्यावरण संरक्षण के कड़े नियमों का बिना किसी लापरवाही के पालन सुनिश्चित करे। भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए सख्त कानूनों का निर्माण तो हुआ है, परंतु कई बार उन नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं कराया जा सका। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ नियम होने के बावजूद उनका खुलेआम उल्लंघन होता आया है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का मुख्य कार्य पर्यावरण से जुड़े नियम बनाना और उनकी सही ढंग से निगरानी करना है। इसी तरह, वन विभाग का दायित्व वन्यजीवों और जंगलों के पेड़ों की रक्षा करना है ताकि अवैध तस्करी रोकी जा सके। वन विभाग अच्छा प्रयास करता है, परंतु कई जगहों पर क्षेत्र के क्षेत्रफल के अनुसार पर्याप्त कर्मचारी न होने या संसाधनों की कमी के कारण कमियाँ रह जाना लाज़मी है। ऐसे में अत्यधिक काम के दबाव के कारण जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा पूरी तरह से नहीं हो पाती है।
स्थानीय प्रशासन, नगर निगम, जिला प्रशासन, नगरपालिका और ग्राम पंचायत—इन सभी की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि स्थानीय प्रशासन पूरी मुस्तैदी और बिना किसी लापरवाही के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ध्यान दे, तो काफी हद तक इस समस्या को कम किया जा सकता है।
उद्योगों और बड़ी कंपनियों की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत से उद्योग प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बड़ी मात्रा में करते हैं। कई उद्योग केवल अपने आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते हैं, परंतु कुछ गिने-चुने उद्योग ऐसे भी हैं जो पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान देते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करते।
इसमें सबसे बड़ी भूमिका आम जनमानस की है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक किसी संसाधन का उपयोग करता है, तो वह उसका दुरुपयोग कर रहा होता है तो वह इस गंभीर समस्या को बढ़ावा देने में भागीदार है। अतः आम जनमानस, सरकारी विभाग और उद्योग—ये सभी कहीं न कहीं इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार हैं।
कौन-कौन से उपाय किए जा रहे पर्यावरण संरक्षण के?
समाज में यदि कोई समस्या है, तो उसे रोकने के उपाय भी मौजूद हैं। इसके निवारण की ज़िम्मेदारी अनेक सामाजिक संस्थाओं, सरकार और आम जनता द्वारा निभाई जा रही है। वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए कई कानून बनाए गए हैं। सरकार और विभिन्न संस्थाओं द्वारा आम नागरिकों को जागरूक करने के लिए कई विज्ञापन और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियानों का आयोजन किया जाता रहा है; जैसे—’एक पेड़ माँ के नाम’ और ‘एक पेड़ देश के नाम’ आदि। सरकारी विभागों के परिसरों, स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों में वृक्षारोपण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
कचरे से दूषित हो चुकी नदियों और तालाबों को पुनर्जीवित करने के लिए अनेक सामाजिक संस्थाएँ अपना योगदान दे रही हैं। इसके तहत कई नदियों को साफ़ किया जा रहा है और जल संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। भूजल स्तर को ऊपर उठाने के लिए सरकारों द्वारा ‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ को बढ़ावा दिया जा रहा है। आम नागरिक भी अपने घरों में अंडरग्राउंड वॉटर टैंक का निर्माण करा रहे हैं, जिससे बारिश का पानी संचित कर भविष्य में उपयोग किया जा सके। अवैध खनन रोकने के लिए भी समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं। इसके लिए सख्त कानून बनाए गए हैं और दोषियों को पकड़कर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाती है।
पर्यावरण के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने के लिए विभिन्न जन-जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। साथ ही, नई पीढ़ी में इसके प्रति चेतना जगाने के उद्देश्य से इसे स्कूली और कॉलेज के पाठ्यक्रमों का हिस्सा भी बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों (जैसे कोयला और पेट्रोलियम) पर मानवीय निर्भरता को कम करने के लिए सौर व पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को निरंतर बढ़ावा दिया जा रहा है।
हालाँकि, इन तमाम प्रयासों के बावजूद पर्यावरण को बचाने की मुहिम में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण सख्त कानूनों का जमीनी स्तर पर ठीक से लागू न होना, प्रशासनिक स्तर पर व्याप्त सुस्ती व भ्रष्टाचार और आम जनता में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की कमी होना है। साथ ही, पर्यावरण की अनदेखी कर केवल अनियंत्रित बुनियादी ढाँचे और औद्योगिक विकास की होड़ ने भी इस समस्या को और अधिक गंभीर बना दिया है।”
फिर क्या हैं समाधान ?
पर्यावरण को बचाने के लिए केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है। इन कानूनों का बिना किसी लापरवाही के सख्ती से पालन कराना सबसे अनिवार्य कदम है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए और उन्हें धरातल पर लागू किया जाना चाहिए:
–जहाँ भी विकास कार्यों के लिए पेड़ काटे जाएँ, कानूनन वहाँ उससे दोगुनी संख्या में नए पौधे लगाए जाएँ। केवल पौधे लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि उनके बड़े होने तक उनकी सही ढंग से देखरेख भी सुनिश्चित की जाए।
–आम जनता और उद्योगों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग केवल आवश्यकतानुसार ही किया जाए। पानी, बिजली, लकड़ी और अन्य सीमित संसाधनों की बर्बादी को रोकने के लिए कड़े नियम और जागरूकता दोनों की आवश्यकता है।
–बारिश के पानी को संरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। सभी आवासीय और व्यावसायिक इमारतों में ‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए ताकि गिरते भूजल स्तर को पुनः ऊपर उठाया जा सके।
–अवैध खनन, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और नदियों से अवैध रेत खनन (निकासी) पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। इस तरह के अपराधों में लिप्त दोषियों और माफियाओं के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई कर उन्हें कठोर दंड दिया जाए।
–कारखानों और उद्योगों के लिए अपने कचरे का सही ढंग से वैज्ञानिक निस्तारण करना अनिवार्य होना चाहिए। इसके साथ ही, उद्योगों को ऐसी तकनीकें अपनानी चाहिए जिससे उत्पादन में प्राकृतिक संसाधनों की खपत कम से कम हो।
इन समाधानों को अमलीजामा कैसे पहनाया जाए?
पर्यावरण संरक्षण के इन समाधानों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए सरकार, प्रशासन, उद्योग, शिक्षण संस्थानों और आम नागरिकों-सभी को मिलकर सामूहिक रूप से अपनी भागीदारी निभानी होगी। सरकार को प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन को रोकने और पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना चाहिए। बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन का ध्यान रखना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इसके अलावा शहरों और गाँवों में पर्यावरण से संबंधित व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि समाज के हर वर्ग को पर्यावरण संरक्षण की व्यावहारिक शिक्षा मिल सके। स्कूलों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा को केवल किताबों तक सीमित न रखकर व्यावहारिक बनाया जाए।
यह कार्य आसान नहीं है। प्रत्येक नागरिक को इस बदलाव की शुरुआत अपने घर से करनी होगी। जैसे, आवश्यकता से अधिक पानी की बर्बादी न करना, बिजली बचाना, प्लास्टिक का उपयोग न्यूनतम करना और सौर ऊर्जा को अपनाना। इसके अलावा, निजी पेट्रोल-डीजल वाहनों के स्थान पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट या इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग करना, अधिक से अधिक पेड़ लगाना और प्रकृति मां का सम्मान करना इसमें शामिल है।
ऐसा करना असंभव नहीं है। यदि समाज के हर वर्ग के लोग इन छोटी-छोटी आदतों को ईमानदारी से अपने जीवन में उतार लें, तो देश के पर्यावरण में आमूल-चूल परिवर्तन देखने को मिलेंगे। समाज और सरकार मिलकर यदि अपना दायित्व निभाएँ, तो हमारे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण निश्चित रूप से संभव है। ऐसा करके ही हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को उपहार स्वरूप एक स्वच्छ, स्वस्थ और सुरक्षित जीवन सौंप सकते हैं।
(लेखक युवा पत्रकार हैं। वह पर्यावरण से जुड़े विषयों पर लिखते हैं।)

