यूरोप की प्रमुख नदियों (राइन, डेन्यूब, पो, लॉयर) में जलस्तर गिरने से महाद्वीप में जल, ऊर्जा और खाद्यान्न संकट गहरा गया है। जलमार्ग बाधित होने से फ्रांस में पेट्रोल पंपों पर ईंधन खत्म हो गया है और हंगरी व फ्रांस के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का शीतलन (Cooling) बाधित हुआ है। फसलों (मक्का, सूरजमुखी) की भारी तबाही और श्रम उत्पादकता में गिरावट से यूरोपीय संघ को 180 अरब यूरो (1% GDP) के आर्थिक नुकसान का अनुमान है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। यूरोप में लगातार गहराता सूखा अब परिवहन, कृषि और ऊर्जा उत्पादन तीनों क्षेत्रों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। नदियों का जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे जाने से माल ढुलाई पर असर पड़ रहा है, वहीं लगातार बनी रही गर्मी ने महाद्वीप के बड़े हिस्से में मिट्टी की नमी को सोख लिया है।
यूरोपीय आयोग के जॉइंट रिसर्च सेंटर (JRC) के हालिया शोध के मुताबिक, जुलाई महीने में यूरोप के अधिकांश हिस्सों में सूखे की स्थिति “स्थिर लेकिन गंभीर” बनी रही, वहीं फ्रांस, दक्षिणी जर्मनी, हंगरी, ऑस्ट्रिया, चेक गणराज्य और स्लोवाकिया समेत मध्य-पश्चिमी क्षेत्रों में हालात और बिगड़ गए हैं।
राइन और लॉयर नदी से लेकर पो, डेन्यूब और तिज़ा तक — लंबे समय से जारी बारिश की कमी और लगातार पड़ रही लू ने नदियों के जलस्तर को गंभीर रूप से नीचे धकेल दिया है, जिससे ईंधन आपूर्ति, औद्योगिक परिवहन, सिंचाई और बिजली उत्पादन, सभी प्रभावित हो रहे हैं।
जर्मनी में राइन नदी का जलस्तर इतना गिर चुका है कि देश के प्रमुख औद्योगिक जलमार्ग पर माल ढुलाई गंभीर रूप से बाधित हो गई है। संघीय जलमार्ग एवं शिपिंग प्रशासन के अनुसार, यूरोप के सबसे व्यस्त अंतर्देशीय जलमार्ग राइन के जरिए जर्मनी की करीब 80 प्रतिशत अंतर्देशीय जलमार्ग माल ढुलाई होती है।
रेनलैंड-पैलेटिनेट के काउब के पास अब अधिकांश जहाज अपनी सामान्य क्षमता के साथ नहीं गुजर पा रहे, जिसके चलते माल ढुलाई कंपनियों के लिए नदी को प्रभावी रूप से उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में बांटना पड़ गया है। इस बाधा का असर पूर्वी फ्रांस पर भी पड़ा है, जहां जहाज अपनी सामान्य क्षमता के साथ स्ट्रासबर्ग बंदरगाह तक नहीं पहुंच पा रहे।
स्ट्रासबर्ग स्थित फ्रेंच वाटरवेज़ अथॉरिटी के विकास निदेशक जीन-लॉरेंट किस्लर ने फ्रांसीसी अखबार ले फिगारो को बताया कि सामान्य परिस्थितियों में जहां तेल टैंकर 1,500 टन से अधिक ईंधन ले जाते थे, अब वे केवल करीब 350 टन ही ढो पा रहे हैं। शुक्रवार तक फ्रांस के ग्रैंड एस्ट क्षेत्र में 14 प्रतिशत पेट्रोल पंपों पर कम से कम एक प्रकार का ईंधन खत्म हो चुका था, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा महज 3 प्रतिशत था।
ओ-रिन और पड़ोसी टेरिटोयर डे बेलफोर के कुछ हिस्सों में तो 25 से 50 प्रतिशत तक पंप प्रभावित हुए। इसके अलावा फ्रांस के लॉयर क्षेत्र में हाल की बारिश के बावजूद हालात में खास सुधार न होने पर प्रशासन को आठवीं बार सूखे की चेतावनी जारी करनी पड़ी, और कुछ इलाके तो सबसे गंभीर “संकट” श्रेणी में पहुंच गए, जहां पानी का इस्तेमाल केवल स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों तक सीमित कर दिया गया है।
उत्तरी इटली की पो नदी बेसिन को सबसे गंभीर “उच्च” जल संकट श्रेणी में रखा गया है। यहां लगभग सभी निगरानी केंद्रों ने गंभीर सूखे की स्थिति दर्ज की है, जबकि क्रेमोना और बोर्गोफोर्ते में हालात “अत्यधिक गंभीर” श्रेणी में आंके गए हैं। इतालवी मीडिया के मुताबिक, सैटेलाइट तस्वीरों में पिछले साल की तुलना में नदी तल का बड़ा हिस्सा खुला दिख रहा है, रेत के टीले बड़े हो गए हैं और आसपास की खेती वाली जमीन काफी ज्यादा सूखी नजर आ रही है।
इटली के प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्रों में शुमार लोमेलीना में सिंचाई का पानी अब बारी-बारी से बांटा जा रहा है, और अनुमान है कि इससे कृषि क्षेत्र को 10 करोड़ यूरो से अधिक का नुकसान हो सकता है। पो डेल्टा में मीठे पानी का बहाव घटने से एड्रियाटिक सागर का खारा पानी नदी में ऊपर की ओर बढ़ने लगा है, जिससे नदी का पानी सिंचाई लायक न रह जाने का खतरा पैदा हो गया है।
यूरोपीय संघ की सबसे लंबी नदी डेन्यूब, जो 10 देशों से होकर गुजरती है और वहां परिवहन, सिंचाई, ऊर्जा तथा पेयजल का अहम स्रोत है, वह भी गंभीर जल-सूखे की चपेट में है। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, बुडापेस्ट में 4 अगस्त को नदी का जलस्तर रिकॉर्ड निचले स्तर 14-19 सेंटीमीटर तक पहुंच गया, जिससे नदी तल का बड़ा हिस्सा, पुराने जलपोतों के मलबे और तथाकथित “भूख की चट्टान” तक उजागर हो गई — यह चट्टान ऐतिहासिक रूप से फसल बर्बादी और अकाल की चेतावनी मानी जाती रही है।
सेंटेंड्रे के पास कुछ हिस्सों में नदी इतनी उथली हो गई कि लोग पैदल ही उसे पार करने लगे, वहीं 4,000 से 5,000 घरों में अस्थायी रूप से पेयजल आपूर्ति ठप हो गई।
इस गिरावट ने हंगरी के पाक्स परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है, जो शीतलन के लिए डेन्यूब नदी पर निर्भर है और देश की करीब आधी बिजली आपूर्ति करता है। संयंत्र के पास जलस्तर बढ़ाने के लिए अधिकारियों ने 80 मीटर लंबी दो बजरों को डुबोना शुरू कर दिया है, क्योंकि आशंका है कि जलस्तर और गिरने पर बिजली उत्पादन में और कटौती करनी पड़ सकती है।
रोमानिया में, जहां डेन्यूब नदी देश में प्रवेश करती है, उस बाज़ियास स्थान पर अगस्त में नदी का प्रवाह घटकर 1,400 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड रह गया है और इसके 1,300 तक और गिरने की आशंका है — यह अगस्त के दीर्घकालिक औसत 3,900 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड का लगभग एक-तिहाई ही है।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन की एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, यह सूखा दरअसल दो आपस में जुड़े कारकों से पैदा हुआ एक संयुक्त संकट है — लंबे समय से जारी बारिश की कमी, और भीषण गर्मी जिसने मिट्टी, नदियों और वनस्पति से पानी के नुकसान की रफ्तार को और तेज कर दिया। सर्दियों और शुरुआती वसंत के दौरान उत्तरी और मध्य यूरोप में लगातार बने उच्च दबाव तंत्र ने अटलांटिक से आने वाली मौसम प्रणालियों को जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य, स्लोवाकिया और बाल्टिक क्षेत्र तक पर्याप्त बारिश पहुंचाने से रोक दिया।
अप्रैल से यह उच्च दबाव तंत्र पश्चिम की ओर फैल गया, जिससे बारिश लाने वाली प्रणालियां इबेरियन प्रायद्वीप, फ्रांस और उत्तरी इटली तक नहीं पहुंच पाईं। जून में स्थिति और बिगड़ गई, जब दक्षिणी यूरोप से गर्म हवाएं उत्तर की ओर बढ़ीं, जिससे लंबे समय तक साफ आसमान और रिकॉर्ड तोड़ तापमान की स्थिति बनी रही। गर्मी के चलते वाष्पोत्सर्जन (मिट्टी और वनस्पति से नमी के वायुमंडल में जाने की प्रक्रिया) बढ़ गया।
पहले से सूखी मिट्टी ने ज्यादा गर्मी सोखी, जिससे तापमान और पानी की कमी, दोनों में और तेजी आई। नतीजतन, कम बारिश से शुरू हुआ मौसम संबंधी सूखा धीरे-धीरे कृषि सूखे में बदल गया, क्योंकि मिट्टी सूखती चली गई, और फिर यह जल-सूखे की स्थिति में तब्दील हो गया, जब नदियों, झीलों और भूजल का स्तर लगातार गिरता चला गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि 2026 में दर्ज की गई मिट्टी की नमी की कमी जैसी स्थितियां अब पश्चिमी यूरोप में करीब पांच गुना और पूर्वी यूरोप में 11 गुना अधिक संभावित हो गई हैं, उस स्थिति की तुलना में जब जलवायु 1.4 डिग्री सेल्सियस ठंडी हुआ करती थी।
कृषि क्षेत्र इस संकट से सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में शामिल है। JRC ने पिछले महीने की तुलना में सर्दियों की फसल की उपज के अनुमान में करीब 1 से 4 प्रतिशत की कटौती की है, जबकि अनाज मक्का और सूरजमुखी के उत्पादन अनुमान में 6 से 7 प्रतिशत तक की कमी की गई है।
फ्रांस में मक्के की फसल पिछले कई दशकों में सबसे कम रहने की आशंका है, वहीं रोमानिया में रिपोर्टों के मुताबिक 10 लाख हेक्टेयर से अधिक मक्के की खेती बर्बाद हो चुकी है। मध्य-पश्चिमी फ्रांस, दक्षिणी चेक गणराज्य, पश्चिमी स्लोवाकिया, हंगरी और पश्चिमी रोमानिया इस संकट के प्रमुख केंद्रों में शामिल हैं।
इसके अलावा जर्मनी, स्पेन और इटली में भी फसल उत्पादन के अनुमान घटाए गए हैं। नदियों का घटता जलस्तर एक साथ परिवहन लागत बढ़ा रहा है और बिजली उत्पादन के लिए भी खतरा बन गया है। परमाणु और थर्मल ऊर्जा संयंत्रों को शीतलन के लिए नदी के पानी की जरूरत होती है, जबकि जलविद्युत उत्पादन नदियों और जलाशयों के पर्याप्त जलस्तर पर निर्भर करता है।
JRC के अनुसार, फ्रांस में जून के अंत में पड़ी भीषण गर्मी के दौरान तीन परमाणु रिएक्टरों को बंद करना पड़ा, क्योंकि नदी का पानी या तो बहुत गर्म था या उसका प्रवाह बहुत कम था, वहीं आठ अन्य रिएक्टर घटी हुई क्षमता पर चलाए गए। ट्रायोडोस बैंक के अनुमान के मुताबिक, सूखा और भीषण गर्मी 2026 में यूरोपीय संघ के आर्थिक उत्पादन में करीब 1 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं, जो लगभग 180 अरब यूरो के बराबर है।
यह अनुमानित नुकसान यूरोपीय आयोग द्वारा इस साल के लिए अनुमानित 1.1 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि के एक बड़े हिस्से को खत्म कर सकता है, जिसमें अकेले गर्मी के चलते श्रम उत्पादकता में गिरावट से ही यूरोपीय संघ की जीडीपी को करीब 0.6 प्रतिशत का नुकसान होने का अनुमान है।
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