क्या भारत की तेज़ आर्थिक प्रगति और विकास की कीमत हमारा पर्यावरण चुका रहा है? ‘पृथ्वी हमें पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली, बल्कि हमने इसे आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है’-यह कहावत आज देश में बढ़ती भीषण लू, अनियमित मानसून, अचानक आने वाली बाढ़ और सिकुड़ते ग्लेशियरों के रूप में एक कड़वी हकीकत बन चुकी है। पढ़िए, विकास और प्रकृति के इस असंतुलन और इससे जुड़ी समस्याओं और उनके समाधान पर जाह्नवी पांडेय का विश्लेषण ।

जाह्नवी पांडेय
‘पृथ्वी हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है।’ यह कथन आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। बीते कुछ वर्षों में भारत ने विकास, आधारभूत संरचना और आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन इसी विकास की कीमत पर्यावरण को भी चुकानी पड़ रही है। बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, अचानक आने वाली बाढ़, लंबे सूखे, जंगलों में आग, हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना और जैव विविधता का क्षरण अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों के विषय नहीं रह गए हैं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन की वास्तविकता बन चुके हैं।
भारत विश्व की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। औद्योगीकरण, शहरीकरण और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने विकास को गति दी है, किंतु इसके साथ ही जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और वनों की कटाई ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप चरम मौसमी घटनाओं—जैसे भीषण लू, अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और सूखे—की आवृत्ति तथा तीव्रता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
जलवायु परिवर्तन को केवल एक पर्यावरणीय समस्या मानना इसकी गंभीरता को कम करके आंकना होगा। यह कृषि, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल सुरक्षा, खाद्य उत्पादन और सामाजिक विकास से जुड़ा बहुआयामी संकट है। यदि समय रहते प्रभावी और वैज्ञानिक कदम नहीं उठाए गए, तो इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के जीवन स्तर, प्राकृतिक संसाधनों और देश की विकास यात्रा पर गहराई से पड़ेगा। इसलिए जलवायु परिवर्तन को केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि भारत के विकास मॉडल और पर्यावरणीय संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में समझना होगा।
महत्वपूर्ण तथ्य
- 1901 से 2018 के बीच भारत का औसत सतही तापमान लगभग 0.7°C बढ़ा है।
- हीटवेव, अत्यधिक वर्षा और जलवायु संबंधी चरम घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि दर्ज की गई है।
- हिमालय को ‘एशिया का वाटर टॉवर’ कहा जाता है, और यहाँ के ग्लेशियर करोड़ों लोगों की जल आवश्यकताओं से जुड़े हैं।
अचानक नहीं पैदा हुई यह समस्या
जलवायु परिवर्तन अचानक उत्पन्न हुई समस्या नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी शुरुआत वैश्विक स्तर पर अठारहवीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के बाद मानी जाती है। इसी काल में कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग प्रारंभ हुआ। इनके दहन से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा लगातार बढ़ती गई, जिसने पृथ्वी के औसत तापमान को प्रभावित किया।
भारत में इस परिवर्तन के स्पष्ट संकेत विशेष रूप से पिछले तीन से चार दशकों में दिखाई देने लगे हैं। तीव्र औद्योगीकरण, अनियोजित शहरीकरण, तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या, परिवहन क्षेत्र का विस्तार और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने प्राकृतिक संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव डाला है। विकास की इस दौड़ में अनेक क्षेत्रों में वनों की कटाई हुई, जिससे कार्बन अवशोषित करने की प्राकृतिक क्षमता कम होती गई। वहीं सीमेंट, इस्पात, ताप विद्युत संयंत्र और अन्य ऊर्जा-प्रधान उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन ने भी वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समस्या के कारण केवल उद्योग नहीं
हालाँकि केवल उद्योगों को ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, धान की खेती से मीथेन का उत्सर्जन, फसल अवशेषों को जलाने की प्रवृत्ति, ठोस कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन की कमी तथा तेजी से फैलते कंक्रीट आधारित शहर भी इस संकट को गहरा कर रहे हैं। अनेक शहरों में प्राकृतिक जलाशयों और हरित क्षेत्रों के सिकुड़ने से स्थानीय जलवायु पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
पर्यावऱणीय संकट भुगत रहा समूचा देश
आज भारत में इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। उत्तर भारत में गर्मियों के दौरान हीटवेव पहले की तुलना में अधिक लंबी और तीव्र हो रही हैं। असम, बिहार और केरल जैसे राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़ ने लाखों लोगों के जीवन और आजीविका को प्रभावित किया है, जबकि राजस्थान, बुंदेलखंड और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में सूखा और जल संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। हिमालयी ग्लेशियरों के सिकुड़ने से भविष्य में गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। वहीं समुद्र-स्तर में वृद्धि भारत के तटीय शहरों और द्वीपों के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही है।
इन परिस्थितियों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ने की समस्या नहीं है। यह प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता, कृषि उत्पादन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, जल सुरक्षा और आर्थिक विकास—सभी को प्रभावित करने वाला व्यापक संकट है। यदि विकास की वर्तमान दिशा में पर्यावरणीय संतुलन को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, तो भविष्य में इसकी सामाजिक और आर्थिक लागत कहीं अधिक गंभीर होगी। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि ऐसा विकास सुनिश्चित करना है जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
समस्या के लिए कौन-कौन जिम्मेदार?
जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इसका उत्तर सरल नहीं है, क्योंकि यह समस्या किसी एक संस्था या वर्ग की नहीं, बल्कि हमारी विकास-प्रक्रिया की सामूहिक परिणति है। इसलिए इसके कारणों और जिम्मेदार पक्षों का विश्लेषण भी व्यापक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।
सबसे पहले सरकारों की भूमिका पर विचार करना आवश्यक है। भारत सरकार और राज्य सरकारों ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक कानून बनाए हैं। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण कानून, जैव विविधता संरक्षण से जुड़े प्रावधान तथा प्रदूषण नियंत्रण संबंधी नियम इसके उदाहरण हैं। पिछले कुछ वर्षों में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने, इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग, हरित हाइड्रोजन मिशन तथा वृक्षारोपण अभियानों जैसी कई पहलें भी शुरू की गई हैं। इसके बावजूद अनेक परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) की गुणवत्ता, निगरानी और अनुपालन को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। कई बार आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के बजाय अल्पकालिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, जिसका प्रभाव प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष औद्योगिक क्षेत्र है। भारत की अर्थव्यवस्था में उद्योगों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु ऊर्जा उत्पादन, इस्पात, सीमेंट, रसायन तथा परिवहन जैसे क्षेत्रों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी उल्लेखनीय है। अनेक उद्योगों ने स्वच्छ तकनीकों को अपनाना प्रारंभ किया है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्योग प्रदूषण नियंत्रण मानकों का पूर्ण पालन नहीं कर पाते। औद्योगिक अपशिष्टों का अनुचित निस्तारण, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता तथा ऊर्जा दक्षता की कमी पर्यावरणीय दबाव को बढ़ाती है।
शहरी स्थानीय निकायों और नगर नियोजन एजेंसियों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत के अधिकांश शहर तेजी से फैल रहे हैं, लेकिन उनके विकास की गति के अनुरूप हरित क्षेत्रों, जल निकासी, सार्वजनिक परिवहन और ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है। परिणामस्वरूप शहरों में कंक्रीट का विस्तार बढ़ा, प्राकृतिक जलाशय समाप्त हुए और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ जैसी समस्याएँ सामने आईं, जिनके कारण शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहने लगा।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का दायित्व नहीं
इस समस्या में आम नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, घरेलू कचरे का पृथक्करण न करना, पानी और बिजली की अनावश्यक बर्बादी, निजी वाहनों पर अत्यधिक निर्भरता तथा खुले में कचरा जलाना जैसी आदतें पर्यावरणीय संकट को बढ़ाती हैं। यह सही है कि व्यक्तिगत स्तर पर होने वाला प्रदूषण उद्योगों की तुलना में कम दिखाई देता है, लेकिन करोड़ों लोगों की समान आदतें मिलकर बड़ा प्रभाव उत्पन्न करती हैं। नीचे कुछ उदाहरण देखिए-
दिल्ली-एनसीआर का वायु प्रदूषण : हर वर्ष सर्दियों के दौरान दिल्ली-एनसीआर गंभीर वायु प्रदूषण का सामना करता है। इसके लिए वाहनों से होने वाला प्रदूषण, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल तथा पराली जलाने जैसी कई वजहें जिम्मेदार मानी जाती हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) जैसी योजनाएँ लागू की हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और नियमों के प्रभावी अनुपालन की अभी भी आवश्यकता है।
हिमालयी ग्लेशियर : हिमालय के ग्लेशियर एशिया की कई बड़ी नदियों का प्रमुख स्रोत हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में इनके सिकुड़ने की प्रवृत्ति दर्ज की गई है। यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो भविष्य में जल उपलब्धता, कृषि और जलविद्युत उत्पादन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी साझा है, समान नहीं
इस चर्चा में वैश्विक परिप्रेक्ष्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार आज वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसों का बड़ा हिस्सा उन विकसित देशों के ऐतिहासिक औद्योगीकरण का परिणाम है, जिन्होंने पिछले डेढ़ से दो सौ वर्षों में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधनों का उपयोग किया। दूसरी ओर, भारत जैसे विकासशील देशों की प्रति व्यक्ति ऊर्जा आवश्यकता और विकास संबंधी चुनौतियाँ अलग हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी साझा है, लेकिन समान नहीं। विकसित देशों पर उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने और विकासशील देशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग देने की भी नैतिक और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है।
स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन किसी एक विभाग की विफलता नहीं, बल्कि शासन, उद्योग, स्थानीय निकायों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नागरिक व्यवहार से जुड़ा बहुआयामी प्रश्न है। जब तक सभी पक्ष अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का प्रभावी समाधान संभव नहीं होगा।
क्यों नहीं हो पा रहा उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन?
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनों और नीतियों की कमी नहीं है। चुनौती मुख्यतः उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। केंद्र और राज्य सरकारों ने वायु और जल प्रदूषण नियंत्रण, वन संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, अक्षय ऊर्जा, स्वच्छ भारत मिशन, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम, राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना तथा विभिन्न राज्य स्तरीय योजनाओं के माध्यम से कई पहलें की हैं। फिर भी अपेक्षित परिणाम अभी तक पूरी तरह प्राप्त नहीं हो सके हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) के तहत ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, सतत कृषि और हिमालयी पारिस्थितिकी जैसे क्षेत्रों पर आठ प्रमुख मिशन शुरू किए हैं।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का उद्देश्य कई शहरों में वायु प्रदूषण के स्तर को कम करना है।
- भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया है, जिसके लिए स्वच्छ ऊर्जा और हरित विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।
बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं, किंतु अनेक स्थानों पर पौधों के संरक्षण और दीर्घकालिक निगरानी की व्यवस्था कमजोर रहती है। परिणामस्वरूप लगाए गए पौधों का बड़ा हिस्सा कुछ वर्षों के भीतर नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार वर्षा जल संचयन को भवन निर्माण नियमों में शामिल किया गया है, लेकिन अनेक शहरों में इसका पालन सीमित स्तर पर ही होता है। ठोस कचरे के पृथक्करण का नियम लगभग सभी नगर निकायों में लागू है, फिर भी अधिकांश घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में गीले और सूखे कचरे को अलग करने की आदत अभी व्यापक नहीं बन सकी है।
कई राज्यों में हर वर्ष लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन स्वतंत्र अध्ययनों और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की कुछ रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि अनेक स्थानों पर पौधों की जीवित रहने की दर अपेक्षा से कम रही। इसका प्रमुख कारण नियमित सिंचाई, रखरखाव और निगरानी की कमी है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका दीर्घकालिक संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है।
सार्वजनिक परिवहन को निजी वाहनों का विकल्प बनाने के प्रयास भी अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। महानगरों में मेट्रो रेल जैसी सुविधाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन छोटे और मध्यम शहरों में गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक परिवहन अभी भी सीमित है। परिणामस्वरूप निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे ईंधन की खपत और प्रदूषण दोनों बढ़ते हैं।
दिल्ली मेट्रो ने सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और प्रतिदिन लाखों यात्रियों को सुविधा प्रदान करती है। इसके बावजूद दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में निजी वाहनों की संख्या लगातार बढ़ी है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है; अंतिम मील (Last-mile) कनेक्टिविटी, पैदल और साइकिल-अनुकूल सड़कें तथा निजी वाहनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।
योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न मिलने के कारण
इन योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न मिलने के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण विभिन्न विभागों के बीच समन्वय का अभाव है। पर्यावरण, वन, शहरी विकास, उद्योग, ऊर्जा और परिवहन विभाग अक्सर अलग-अलग प्राथमिकताओं के आधार पर कार्य करते हैं। यदि विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्यावरणीय पहलुओं को प्रारंभ से ही समाहित न किया जाए, तो बाद में सुधार करना कठिन हो जाता है।
दूसरा, निगरानी और अनुपालन की कमजोरी है। अनेक नियम मौजूद होने के बावजूद उनके उल्लंघन पर कार्रवाई हमेशा समान रूप से नहीं होती। कई बार संसाधनों की कमी, तकनीकी क्षमता का अभाव या प्रशासनिक विलंब प्रभावी निगरानी में बाधा बनते हैं। तीसरा कारण जन-जागरूकता और जनभागीदारी की कमी है। पर्यावरण संरक्षण को अभी भी बड़ी संख्या में लोग केवल सरकार की जिम्मेदारी मानते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि जल संरक्षण, ऊर्जा बचत, कचरा पृथक्करण, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और वृक्षों की देखभाल जैसे कार्य नागरिकों की सक्रिय भागीदारी के बिना सफल नहीं हो सकते।
हाल के वर्षों में बेंगलुरु, गुरुग्राम और हैदराबाद जैसे शहरों में अपेक्षाकृत कम समय की भारी वर्षा के दौरान भी व्यापक जलभराव देखने को मिला। विशेषज्ञों के अनुसार इसका एक कारण प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और विभिन्न विभागों के बीच समन्वित शहरी योजना का अभाव भी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अव्यवस्थित शहरी नियोजन भी संकट को बढ़ा सकता है।
इंदौर जैसे शहरों ने घर-घर कचरा पृथक्करण और प्रभावी ठोस कचरा प्रबंधन के माध्यम से उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। यह दर्शाता है कि जब स्थानीय प्रशासन और नागरिक मिलकर कार्य करते हैं, तो पर्यावरण संरक्षण की नीतियाँ केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वास्तविक परिणाम भी देती हैं।
इसके अलावा अल्पकालिक आर्थिक लाभ, प्रशासनिक चुनौतियाँ, संसाधनों की सीमाएँ और जन-जागरूकता की कमी-ये सभी कारण पर्यावरणीय नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनते हैं। फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रयास नहीं हो रहे हैं। वास्तविक चुनौती यह है कि अच्छी नीतियों को स्थानीय स्तर पर निरंतर, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए। जब तक नीति-निर्माण, प्रशासन, उद्योग और नागरिक समाज मिलकर जवाबदेही के साथ कार्य नहीं करेंगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य अधूरे रहेंगे।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही भविष्य का मार्ग
जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौती का समाधान किसी एक संस्था या व्यक्ति के प्रयासों से संभव नहीं है। सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान, स्थानीय निकाय और नागरिक—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सबसे आवश्यक यह है कि पर्यावरण संरक्षण को विकास का विरोधी नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास की आधारशिला माना जाए। प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर किया गया विकास लंबे समय तक समाज और अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए लाभकारी नहीं हो सकता।
महत्वपूर्ण तथ्य
- भारत ने 2030 तक अपनी कुल विद्युत क्षमता का बड़ा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है।
- सौर ऊर्जा क्षमता में भारत विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है।
- ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) को जलवायु परिवर्तन से निपटने की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतियों में माना जा रहा है।
- सबसे पहला कदम नीति निर्माण और उसके प्रभावी क्रियान्वयन का होना चाहिए। भारत में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अनेक कानून पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उनका पालन कितनी गंभीरता से कराया जाता है। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) को केवल औपचारिक प्रक्रिया न मानकर वैज्ञानिक आधार पर निष्पक्ष रूप से लागू किया जाना चाहिए। जिन परियोजनाओं से पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचने की आशंका हो, उनके लिए स्पष्ट शर्तें और नियमित निगरानी अनिवार्य होनी चाहिए।
- भारत ने सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब आवश्यकता कोयले पर निर्भरता घटाने, ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और स्वच्छ तकनीकों को अपनाने की है।
इस मामले में कई उल्लेखनीय उदाहरण हैं। जैसे कि राजस्थान का भड़ला सोलर पार्क यह दर्शाता है कि प्रभावी नीति और निवेश के साथ स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ाया जा सकता है।
मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management) के तहत स्थानीय समुदायों की भागीदारी से कई क्षेत्रों में वन संरक्षण और पुनर्जीवन के सकारात्मक परिणाम देखने को मिले।
बेंगलुरु में अनियोजित शहरीकरण और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण के कारण भारी वर्षा के दौरान बार-बार जलभराव की स्थिति उत्पन्न हुई, जो बेहतर शहरी नियोजन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
जलवायु परिवर्तन केवल बढ़ते तापमान का मुद्दा नहीं
कुल मिलाकर भारत के पर्यावरण के सामने जलवायु परिवर्तन केवल बढ़ते तापमान का मुद्दा नहीं, बल्कि विकास, संसाधन प्रबंधन और सुशासन की भी परीक्षा है। उत्तर भारत की भीषण गर्मी, पूर्वोत्तर की बाढ़, दक्षिण भारत का जल संकट, हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना और तटीय क्षेत्रों पर बढ़ता समुद्री खतरा इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि पर्यावरणीय संकट भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है।
सरकार ने अपनाए हैं कई महत्वपूर्ण समाधान
सकारात्मक पक्ष यह है कि समाधान हमारे पास उपलब्ध हैं। भारत ने अक्षय ऊर्जा, जल संरक्षण, स्वच्छ परिवहन और हरित विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। अब आवश्यकता इन नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने, स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाने और प्रत्येक विकास परियोजना में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देने की है। मेरी नजर में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल जलवायु परिवर्तन नहीं, बल्कि ऐसा विकास मॉडल अपनाना है जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करे। यदि जंगल, नदियाँ, जल स्रोत और स्वच्छ वायु सुरक्षित रहेंगे, तभी विकास वास्तव में टिकाऊ होगा। प्रकृति केवल हमारी धरोहर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि भारत के सुरक्षित, समृद्ध और सतत भविष्य की अनिवार्य शर्त है।
(लेखिका युवा पत्रकार हैं। वह पर्यावरण से जुड़े विषयों पर लिखती हैं।)

