हिमाचल प्रदेश की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी और जैव विविधता को बचाने के लिए 44 सामाजिक एवं पर्यावरण संगठनों, वैज्ञानिकों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर ग्लाइफोसेट आधारित खरपतवारनाशकों की बिक्री, भंडारण और छिड़काव पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। हिमाचल प्रदेश की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी को रासायनिक खरपतवारनाशकों से होने वाले नुकसान को लेकर पर्यावरण संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार से कड़ा कदम उठाने की मांग की है।
44 सामाजिक एवं पर्यावरण संगठनों, सेवानिवृत्त वन अधिकारियों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को पत्र लिखकर ग्लाइफोसेट आधारित खरपतवारनाशकों की बिक्री, भंडारण और छिड़काव पर पूरे राज्य में तत्काल और पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
20 अगस्त 2026 को भेजे गए इस पत्र में आरोप लगाया गया है कि ग्लाइफोसेट जैसे रसायनों का इस्तेमाल प्राकृतिक वनस्पति को नष्ट कर वन भूमि को अवैध खेती के लिए तैयार करने में किया जा रहा है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में कुछ स्थानों पर ऑफ-सीजन मटर की व्यावसायिक खेती के लिए जंगलों और प्राकृतिक वनस्पतियों को रासायनिक तरीके से साफ किया जा रहा है।
कुछ क्षेत्रों में भांग की अवैध खेती के लिए भी ऐसी गतिविधियों के आरोप सामने आए हैं। उनका कहना है कि जंगलों को काटने या झाड़ियों को हटाने की पारंपरिक प्रक्रिया की जगह अब खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, जिससे कम समय में बड़े क्षेत्र की वनस्पति नष्ट की जा सकती है। यह प्रवृत्ति हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है।
हिमालय नीति अभियान के समन्वयक गुमान सिंह के नेतृत्व में तैयार किए गए इस अभियान में पर्यावरणविद् कुलभूषण उपमन्यु, कई सेवानिवृत्त वन अधिकारी, पूर्व शिक्षाविद और पद्मश्री से सम्मानित नेक राम सहित कई प्रमुख लोग शामिल हैं। संगठनों ने ग्लाइफोसेट 41 प्रतिशत एसएल के साथ-साथ इसके विभिन्न व्यावसायिक नामों से बाजार में उपलब्ध उत्पादों पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
इनमें राउंडअप, ग्लाइसेल, गरुड़, हाइजैक, ग्लाइफोस और डस्टर जैसे उत्पाद शामिल हैं। कार्यकर्ताओं ने केरल में लागू व्यापक प्रतिबंध का उदाहरण देते हुए हिमाचल में भी इसी तरह की नीति अपनाने की मांग की है।
ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल को लेकर यह मांग ऐसे समय में उठी है जब मंडी जिले के नाचन वन मंडल की थाची वन रेंज में वन भूमि पर अवैध रूप से उगाई गई मटर की फसल को वन विभाग ने हाल ही में हटाया है।
अधिकारियों ने इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की तैयारी के संकेत दिए हैं। हालांकि पर्यावरण संगठनों का कहना है कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। पिछले कई वर्षों में कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जिलों के ऊंचाई वाले इलाकों में प्राकृतिक वनस्पति को रसायनों की मदद से साफ कर कृषि भूमि में बदलने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की गतिविधियों में ग्लाइफोसेट का छिड़काव करके घास, झाड़ियों और छोटी वनस्पतियों को कुछ ही समय में नष्ट किया जाता है। इसके बाद साफ किए गए क्षेत्र में मटर या अन्य फसलों की बुवाई की जाती है।
इससे प्राकृतिक वन आवरण खत्म होने के साथ-साथ उस क्षेत्र में मौजूद स्थानीय पौधों, कीटों, पक्षियों और छोटे जीवों के आवास भी प्रभावित होते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में वनस्पति मिट्टी को पकड़कर रखने और पहाड़ी ढलानों को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इसलिए वनस्पति हटने से मिट्टी के कटाव और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। ग्लाइफोसेट को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी लंबे समय से चर्चा में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने वर्ष 2015 में ग्लाइफोसेट को मनुष्यों के लिए “संभावित रूप से कैंसरकारी” श्रेणी में रखा था।
हालांकि इस रसायन के स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक और नियामक स्तर पर बहस जारी रही है, पर्यावरण संगठनों का कहना है कि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में इसके अनियंत्रित इस्तेमाल को किसी भी स्थिति में प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। संगठनों ने चेतावनी दी है कि ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल केवल पौधों को नष्ट करने तक सीमित नुकसान नहीं पैदा करता।
इसके लगातार इस्तेमाल से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और जल स्रोतों में रसायनों के पहुंचने का जोखिम बढ़ सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक वनस्पति का तेजी से हटना भारी बारिश और बादल फटने जैसी घटनाओं के दौरान ढलानों को अधिक असुरक्षित बना सकता है। ऐसे समय में जब हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण अधिक तीव्र मौसम संबंधी घटनाओं का सामना कर रहा है, प्राकृतिक वनस्पति का संरक्षण आपदा जोखिम कम करने की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
पर्यावरण समूहों ने यह भी कहा है कि वन भूमि पर अतिक्रमण और वहां रासायनिक तरीके से प्राकृतिक वनस्पति को बदलना कई कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन हो सकता है। उन्होंने वन संरक्षण कानून, भारतीय वन अधिनियम और जैव विविधता से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई की मांग की है। संगठनों का दावा है कि भारत में ग्लाइफोसेट का पंजीकरण प्रतिबंधित उपयोग के लिए किया गया है और चाय बागानों में इसके इस्तेमाल की अनुमति से जुड़ी व्यवस्था है, लेकिन राज्य के कई हिस्सों में यह रसायन निर्धारित उपयोग से बाहर भी उपलब्ध और इस्तेमाल हो रहा है। पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया सहित कई पर्यावरण संगठन लंबे समय से ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर कड़े प्रतिबंध की मांग करते रहे हैं।
उनका तर्क है कि कृषि और बागवानी में रासायनिक इनपुट को नियंत्रित किए बिना मिट्टी, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों को कम करना मुश्किल होगा।
हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में यह चिंता और गंभीर हो जाती है क्योंकि यहां की नदियां, झरने और जलस्रोत सीधे जंगलों और पहाड़ी पारिस्थितिकी से जुड़े हुए हैं। पर्यावरण संगठनों ने मुख्यमंत्री से केवल प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं की है, बल्कि वन क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करने के लिए कई कदम उठाने का आग्रह भी किया है।
उन्होंने जिला स्तर पर व्यापक जांच अभियान चलाने और ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने को कहा है जहां अवैध खेती या वन भूमि में भूमि उपयोग परिवर्तन का खतरा अधिक है। इसके लिए ड्रोन, उपग्रह तस्वीरों और जीआईएस मैपिंग का इस्तेमाल करके राज्यव्यापी सर्वेक्षण कराने की मांग की गई है।
इससे उन इलाकों की पहचान करने में मदद मिल सकती है जहां प्राकृतिक वनस्पति तेजी से खत्म हो रही है। संगठनों ने सोशल मीडिया पर खरपतवारनाशकों को वन क्षेत्र साफ करने के लिए बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि डिजिटल माध्यमों से ऐसे रसायनों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करना अवैध वन गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है। इसके साथ ही विकासखंड स्तर पर वन संरक्षण और जागरूकता समितियां गठित करने का सुझाव दिया गया है ताकि स्थानीय समुदायों को जंगलों की निगरानी और संरक्षण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जोड़ा जा सके।
यह मांग हिमाचल प्रदेश में कृषि और बागवानी में रासायनिक पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर जारी व्यापक चिंता के बीच सामने आई है। राज्य में सेब और अन्य बागवानी फसलों के साथ-साथ सब्जियों की खेती में भी विभिन्न कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का उपयोग होता है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि अत्यधिक रासायनिक इस्तेमाल के कारण मिट्टी और जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी पहले रासायनिक इनपुट के अत्यधिक इस्तेमाल और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बीच संबंध पर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। राज्य सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी कई योजनाएं चला रही है।
प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के माध्यम से किसानों को रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। ऐसे में पर्यावरण समूहों का कहना है कि एक ओर सरकार प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक जोखिम वाले खरपतवारनाशकों की उपलब्धता इन प्रयासों को कमजोर कर सकती है। ग्लाइफोसेट पर पूर्ण प्रतिबंध लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि सरकार को कृषि क्षेत्र, नियामक व्यवस्था, किसानों की जरूरतों और अवैध उपयोग के बीच संतुलन बनाना होगा। लेकिन हिमालयी वन क्षेत्रों में इसके कथित दुरुपयोग के मामलों ने इस बहस को एक नया आयाम दिया है।
यदि प्राकृतिक जंगलों को केवल कुछ महीनों की व्यावसायिक खेती के लिए रासायनिक तरीके से साफ किया जाता है, तो इससे होने वाली पर्यावरणीय क्षति लंबे समय तक बनी रह सकती है।
हिमाचल प्रदेश के सामने आज विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती पहले से कहीं अधिक गंभीर है। राज्य के जंगल केवल जैव विविधता के संरक्षण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे जल स्रोतों को सुरक्षित रखने, मिट्टी को बांधे रखने, स्थानीय जलवायु को संतुलित करने और भूस्खलन जैसे प्राकृतिक खतरों को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में प्राकृतिक वनस्पति को बचाना सीधे तौर पर राज्य की जल और आपदा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। 44 संगठनों की यह मांग अब राज्य सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण नीति चुनौती के रूप में है। यदि सरकार ग्लाइफोसेट के उपयोग पर व्यापक प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेती है, तो यह हिमाचल में रासायनिक खरपतवारनाशकों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की दिशा में बड़ा कदम होगा। साथ ही ड्रोन और उपग्रह निगरानी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और अवैध खेती पर सख्त कार्रवाई को प्रभावी तरीके से लागू करना भी जरूरी होगा। हिमालय पर बढ़ते जलवायु दबाव के बीच सवाल केवल एक खरपतवारनाशक पर प्रतिबंध का नहीं है, बल्कि यह तय करने का भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमाचल के जंगल, जलस्रोत और पहाड़ी पारिस्थितिकी कितनी सुरक्षित रह पाएगी।
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