समुद्री जैव विविधता संरक्षण में एक बड़ी सफलता के तहत, इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में हरे कछुए (Chelonia mydas) को ‘संकटग्रस्त’ (Endangered) श्रेणी से हटाकर ‘कम चिंताजनक’ (Least Concern) श्रेणी में रख दिया गया है। अक्टूबर 2025 में अबू धाबी में आयोजित IUCN वर्ल्ड कंजर्वेशन कांग्रेस में घोषित यह बदलाव दशकों से चलाए जा रहे संरक्षण प्रयासों का परिणाम है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। समुद्री जैव विविधता संरक्षण के क्षेत्र में हरे कछुए (Chelonia mydas) की स्थिति में बड़ा सुधार दर्ज किया गया है।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की रेड लिस्ट में हरे कछुए को ‘संकटग्रस्त’ (Endangered) श्रेणी से हटाकर ‘कम चिंताजनक’ (Least Concern) श्रेणी में रखा गया है।
यह बदलाव दशकों से दुनिया भर में समुद्री कछुओं के घोंसले वाले तटों और अंडों की सुरक्षा के लिए किए गए समन्वित संरक्षण प्रयासों का परिणाम माना जा रहा है।
यह घोषणा अक्टूबर 2025 में अबू धाबी में आयोजित IUCN वर्ल्ड कंजर्वेशन कांग्रेस के दौरान की गई थी। हरे कछुए उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय महासागरों में व्यापक रूप से पाए जाते हैं और वर्ष 1982 से IUCN की ‘संकटग्रस्त’ सूची में शामिल थे।
बीते दशकों में मांस, अंडों और कवच के लिए बड़े पैमाने पर शिकार, मछली पकड़ने के दौरान अनजाने में जाल में फंसना, तटीय आवासों का नुकसान और अन्य मानवीय दबावों के कारण इनकी संख्या में भारी गिरावट आई थी।
हालांकि, लंबे समय से की जा रही निगरानी से पता चलता है कि प्रमुख निगरानी वाले समुद्र तटों पर इनके घोंसले बनाने की गतिविधियों में 1970 के दशक की तुलना में करीब 28 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
अनुमान के मुताबिक, जहां उस समय हर वर्ष करीब 4.19 लाख क्लच दर्ज किए जाते थे, वहीं हाल के आकलनों में यह संख्या लगभग 5.26 लाख से 5.38 लाख क्लच प्रति वर्ष तक पहुंच गई है।
हरे कछुओं की वापसी में कई संरक्षण उपायों की अहम भूमिका रही है। इनमें घोंसला बनाने वाली मादा कछुओं और उनके अंडों की सुरक्षा, स्थानीय समुदायों की भागीदारी से अवैध या अस्थायी शिकार को कम करना, कछुआ उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कानूनी रोक और मछली पकड़ने के उपकरणों में ऐसे उपाय लागू करना शामिल है, जिनसे कछुओं के अनजाने में पकड़े जाने की संभावना कम हो सके।
संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार, किसी लंबे समय तक जीवित रहने वाले समुद्री कशेरुकी जीव की वैश्विक संरक्षण स्थिति में यह सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। इसे पहली ऐसी घटना भी माना जा रहा है, जब संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल किसी समुद्री कछुए को वैश्विक स्तर पर गैर-संकटग्रस्त श्रेणी में स्थान मिला है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने इसे पूर्ण सफलता मानने से सावधान किया है। 2025 के आकलन में हरे कछुए की 11 क्षेत्रीय उप-आबादियों का भी मूल्यांकन किया गया और इनमें कई अब भी खतरे की श्रेणियों में हैं।
कुछ आबादियों को ‘असुरक्षित’ (Vulnerable) तो कुछ को ‘संकटग्रस्त’ (Endangered) माना गया है। इनके सामने मछली पकड़ने के दौरान अनजाने में फंसने, तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन तथा कुछ क्षेत्रों में शिकार और अंडों के संग्रह जैसे खतरे अभी भी मौजूद हैं। कई क्षेत्रों में हरे कछुओं की आबादी ऐतिहासिक स्तर की तुलना में अब भी काफी कम है।
वैज्ञानिकों और संरक्षण संगठनों का कहना है कि ‘कम चिंताजनक’ दर्जा बनाए रखने और कमजोर क्षेत्रीय आबादियों को फिर से मजबूत करने के लिए लगातार निगरानी और संरक्षण प्रयास जरूरी होंगे। हरे कछुए की वापसी इस बात का उदाहरण है कि लंबे समय तक लगातार और समन्वित संरक्षण उपायों के जरिए धीमी गति से प्रजनन करने वाली समुद्री प्रजातियों की संख्या में भी सुधार लाया जा सकता है।
यह उपलब्धि भविष्य में अन्य संकटग्रस्त समुद्री जीवों के संरक्षण के लिए भी उम्मीद की एक महत्वपूर्ण मिसाल पेश करती है।
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