संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट ‘Limiting Overshoot: Navigating Exceedance of 1.5°C and Pathways Towards Return’ में कहा गया है कि वैश्विक तापमान आने वाले कुछ वर्षों में औद्योगिक क्रांति से पूर्व स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा को पार कर सकता है। इस चिंताजनक रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि देश अपनी मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू करते हैं, तो भी वैश्विक तापमान लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचकर चरम पर जा सकता है। यह एक घातक स्थिति है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया के सामने एक गंभीर चेतावनी रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक तापमान आने वाले कुछ वर्षों में औद्योगिक क्रांति से पूर्व स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा को पार कर सकता है। हालांकि यह सीमा पार होना मौजूदा परिस्थितियों में लगभग अपरिहार्य दिखाई दे रहा है, लेकिन UNEP का कहना है कि तापमान में होने वाली इस बढ़ोतरी को सीमित किया जा सकता है और भविष्य में वैश्विक तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने की संभावना अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
UNEP की रिपोर्ट ‘Limiting Overshoot: Navigating Exceedance of 1.5°C and Pathways Towards Return’ में कहा गया है कि मौजूदा नीतियों और उत्सर्जन की गति के साथ दुनिया लंबे समय तक बढ़ते तापमान का सामना कर सकती है। यदि देश अपनी मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू करते हैं, तो भी वैश्विक तापमान लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचकर चरम पर जा सकता है। वहीं मौजूदा नीतियों के आधार पर वर्ष 2100 तक तापमान लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है और कुछ परिस्थितियों में यह इससे भी अधिक हो सकता है।
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बने रहने की स्थिति में दुनिया के सामने कोई अच्छा परिणाम नहीं होगा। उन्होंने कहा कि दुनियाभर में पड़ रही भीषण गर्मी इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अपेक्षा से अधिक तेजी से सामने आ रहे हैं, अधिक गंभीर हो रहे हैं और लंबे समय तक बने रह रहे हैं।
इससे जनहानि के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक व्यवधान भी बढ़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस गर्मी में देखी गई भीषण गर्मी, जंगलों में लगी आग और जानलेवा बाढ़ भविष्य के खतरों की चेतावनी हैं। उनके अनुसार, 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान जितना कम और जितने कम समय तक रहे, उतना बेहतर होगा। इसके लिए जलवायु कार्रवाई के स्तर और महत्वाकांक्षा दोनों को तेजी से बढ़ाना होगा।
रिपोर्ट में दुनिया के लिए ‘ओवरशूट, पीक और डिक्लाइन’ यानी सीमा पार करने, तापमान को चरम पर रोकने और फिर उसे घटाने की रणनीति को सबसे बेहतर उपलब्ध विकल्प बताया गया है। इसके लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तत्काल और लगातार गहरी कटौती आवश्यक होगी। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड के साथ-साथ मीथेन जैसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी को भी प्राथमिकता देने की जरूरत है। UNEP के मुताबिक, देशों को नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने के बाद धीरे-धीरे नेट-नेगेटिव उत्सर्जन की दिशा में बढ़ना होगा। इसके साथ कार्बन डाइऑक्साइड हटाने वाली तकनीकों और प्रकृति आधारित उपायों, जैसे बड़े पैमाने पर वनीकरण, का जिम्मेदारीपूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है।
हालांकि रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि कार्बन हटाने की तकनीकें उत्सर्जन में वास्तविक कटौती का विकल्प नहीं, बल्कि उसका पूरक होनी चाहिए। तापमान बढ़ने के साथ जलवायु जोखिम भी हर अतिरिक्त अंश के साथ बढ़ते जाएंगे। 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने पर अत्यधिक गर्मी, बाढ़, सूखा, जंगलों में आग और अन्य चरम मौसम की घटनाएं अधिक तीव्र हो सकती हैं।
इसके अलावा पारिस्थितिक तंत्रों के नुकसान, खाद्य एवं जल सुरक्षा पर दबाव, मानव स्वास्थ्य के लिए खतरे तथा बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान बढ़ सकता है। छोटे द्वीपीय देशों और समुद्र के निचले तटीय इलाकों के लिए खतरा विशेष रूप से गंभीर हो सकता है। समुद्र का बढ़ता स्तर कई समुदायों को विस्थापन के लिए मजबूर कर सकता है। तापमान बढ़ने के साथ हिम चादरों के अस्थिर होने, अमेजन वर्षावन के क्षरण और प्रमुख समुद्री धाराओं में बदलाव जैसे संभावित ‘टिपिंग पॉइंट’ का जोखिम भी बढ़ता है।
UNEP ने चेताया है कि यदि भविष्य में वैश्विक तापमान फिर नीचे भी आता है, तब भी जलवायु परिवर्तन से होने वाले कुछ नुकसान स्थायी हो सकते हैं। कई समुदायों को अपने पारंपरिक रोजगार और जीवनशैली में बदलाव करना पड़ सकता है तथा कुछ क्षेत्रों से स्थायी रूप से स्थानांतरित होना पड़ सकता है। इससे जलवायु न्याय, पुनर्वास और शासन के लिए नई चुनौतियां पैदा होंगी।
रिपोर्ट में मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, बहुपक्षीय सहयोग, प्रभावी नीतियों, समावेशी शासन और बड़े पैमाने पर जलवायु वित्त उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई है। UNEP का कहना है कि जिन देशों की ऐतिहासिक रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अधिक जिम्मेदारी रही है, उन्हें जलवायु कार्रवाई में अधिक महत्वाकांक्षी नेतृत्व करना चाहिए। रिपोर्ट mitigation यानी उत्सर्जन में कमी और adaptation यानी जलवायु प्रभावों के अनुरूप तैयारी—दोनों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की वकालत करती है। जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज बदलाव से न केवल उत्सर्जन घटाया जा सकता है, बल्कि वायु गुणवत्ता में सुधार, सार्वजनिक स्वास्थ्य को लाभ और लंबे समय में ऊर्जा लागत में कमी जैसे अतिरिक्त फायदे भी हासिल किए जा सकते हैं।
UNEP के अनुसार, वर्षों की अपर्याप्त जलवायु कार्रवाई ने दुनिया के लिए 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को बिना किसी अस्थायी ‘ओवरशूट’ के रोक पाना लगभग असंभव बना दिया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पेरिस समझौते का 1.5 डिग्री लक्ष्य अप्रासंगिक हो गया है। अब चुनौती यह है कि दुनिया तापमान को 1.5 डिग्री से ऊपर जाने की स्थिति को जितना संभव हो उतना सीमित रखे, उसे कम से कम समय तक बनाए रखे और अंततः तापमान को फिर नीचे लाने की दिशा में काम करे।
UNEP ने देशों से रिपोर्ट को निराशा का कारण मानने के बजाय तत्काल और तेज जलवायु कार्रवाई का आह्वान समझने की अपील की है। एजेंसी के अनुसार, आने वाले वर्षों में लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि दुनिया 1.5 डिग्री सेल्सियस से कितनी ऊपर जाएगी और कितने समय तक वहां रहेगी।
(फोटो-एआई)

