ब्राजील द्वारा संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP30) से पहले जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने के लिए राष्ट्रीय संक्रमण योजनाएं तैयार करने का आह्वान किया गया है, जिसके तहत कोयला, तेल और गैस के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने पर जोर दिया गया है। वहीं दूसरी ओर, भारत ने यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन कर (CBAM) जैसी एकतरफा व्यापारिक व्यवस्थाओं का कड़ा विरोध करते हुए विकसित देशों से जलवायु वित्त में पर्याप्त वृद्धि की मांग दोहराई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : ब्राजील ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन COP30 से पहले जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए देशों से राष्ट्रीय संक्रमण योजनाएं तैयार करने का आह्वान किया है। दूसरी ओर, भारत ने कार्बन सीमा समायोजन कर (CBAM) जैसी एकतरफा व्यापारिक व्यवस्थाओं का विरोध करते हुए विकसित देशों से जलवायु वित्त में पर्याप्त वृद्धि की मांग दोहराई है।
ब्राजील की ओर से प्रस्तुत रोडमैप में कोयला, तेल और गैस के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिए पारदर्शी और देश आधारित योजनाएं बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के साथ जीवाश्म ईंधन उद्योगों पर निर्भर श्रमिकों तथा समुदायों के हितों की रक्षा करने की बात भी कही गई है। भारत का मानना है कि यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) जैसे उपाय विकासशील देशों के औद्योगिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। भारत का तर्क है कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों का ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन योगदान कम रहा है।
इसलिए जलवायु कार्रवाई में साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांत का सम्मान होना चाहिए। भारत ने विकसित देशों द्वारा प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर के जलवायु वित्त की प्रतिबद्धता पूरी नहीं किए जाने का मुद्दा भी उठाया है। उसका कहना है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने, अनुकूलन और आपदा से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता और आधुनिक तकनीक की जरूरत है।
भारत में सौर एवं पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास की जरूरतों को देखते हुए मध्यम अवधि में कोयले की भूमिका बने रहने की संभावना है। COP30 में राष्ट्रीय संक्रमण योजनाओं की जवाबदेही, वित्तीय सहायता, तकनीक हस्तांतरण और व्यापारिक प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। सम्मेलन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि विकसित और विकासशील देश जलवायु लक्ष्यों तथा आर्थिक जरूरतों के बीच किस तरह सहमति बना पाते हैं।

