
-अखिलेश मयंक,
क्लाइमेट जस्टिस के मामले में जहां तक भारत की बात है, तो वह अपनी जिम्मेवारियों से कभी नहीं भागा, न ही भाग रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में जब भी यह मामला यूएन में उठे तो वहां बहस के दौरान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन उत्सर्जन कम करने के भारत के प्रयासों को जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए। भारत हमेशा क्लाइमेट जस्टिस का पक्षधर रहा है। जो देश निर्दोष हैं और बड़े उत्सर्जक देशों के बीच में नाहक पिस रहे हैं, उनकी आवाज को भारत ने हमेशा बुलंद किया है। इस मामले में पीड़ित देशों की मदद के लिए जो लॉस एंड डैमेज फंड बना है, उस बनवाने में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खास योगदान रहा है।
नेपाल की भोटीकोशी नदी घाटी में आई भीषण बाढ़ के बाद क्लाइमेट जस्टिस का मुद्दा एक बार फिर जेरे बहस है। नेपाल के विदेशमंत्री ने इस प्रलंयकारी आपदा के लिए तीन बड़े देशों अमेरिका, चीन और भारत को उत्तरदायी ठहराया है। उनके अनुसार ये तीनों देश वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए सबसे अधिक उत्तरदायी है, ऐसे में तीनों देशों की यह कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वे नेपाल को हुए भारी नुकसान की भरपाई करें। नेपाल के विदेश मंत्री ने आगे कहा कि अमेरिका, चीन और भारत द्वारा कार्बन उत्सर्जन से नेपाल के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। उनका कहना है कि ग्लेशियरों के पिघलने की यह स्थिति अगर बरकरार रही तो नेपाल ही नहीं, संपूर्ण दक्षिण एशिया की समूची सभ्यता भारी खबरे में पड़ जाएगी। इसी के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में उपस्थित होकर इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने वाले हैं। वह नेपाल के लिए लॉस एंड डैमेज फंड के तहत मिलने वाले मुआवजे की भी मांग करेंगे। इस भयंकर आपदा से नेपाल को लगभग पांच अरब अमेरिकी डालर का नुकसान हुआ है, जो वहां की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत है।
नेपाली विदेशमंत्री की बात में दम है। प्रदूषण फैलाने वाले देशों में अमेरिका, चीन और यूरोपीय देशों का बड़ा योगदान है। चीन अकेले दुनिया का 33.1 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है। अमेरिका का हिस्सा 11.7 और भारत का हिस्सा 8.0 प्रतिशत है। तीनों देश समूची दुनिया का आधे से अधिक (53 फीसदी) कार्बन उत्सर्जन करते हैं। नेपाल भारत को भी इसमें शामिल कर रहा है लेकिन भारत का एक नागरिक जितना कार्बन उत्सर्जन करता है, अमेरिका का नागरिक उससे सात गुना उत्सर्जन करता है।
इस मामले में अमेरिका की क्या ही बात करें, जहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शपथ लेने वाले दिन ही यह ऐलान कर दिया था कि अमेरिका पेरिस समझौते से हट रहा है (पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन से होने वाली चुनौतियों से निबटने के लिए किया गया है)। ट्रंप किसी भी किस्म की सामाजिक, कानूनी जिम्मेवारी नहीं लेना चाहते, नैतिक जिम्मेवारी की बात करना तो बेमानी ही है। जहां तक चीन की बात है तो वह भी इसकी जिम्मेवारी पश्चिमी देशों, खास करके अमेरिका पर डालकर अपनी जिम्मेवारी से मुक्त होना चाहता है। चीन का कहना है कि पहले अमेरिका मुआवजा दे, तो वह भी देगा।
इस मामले में जहां तक भारत की बात है, तो वह अपनी जिम्मेवारियों से कभी नहीं भागा, न ही भाग रहा है। ऐसे में आने वाले दिनों में जब भी यह मामला यूएन में उठे तो वहां बहस के दौरान वैश्विक कार्बन उत्सर्जन उत्सर्जन कम करने के भारत के प्रयासों को जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए। भारत हमेशा क्लाइमेट जस्टिस का पक्षधर रहा है। जो देश निर्दोष हैं और बड़े उत्सर्जक देशों के बीच में नाहक पिस रहे हैं, उनकी आवाज को भारत ने हमेशा बुलंद किया है। इस मामले में पीड़ित देशों की मदद के लिए जो लॉस एंड डैमेज फंड बना है, उस बनवाने में भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खास योगदान रहा है। कॉप सम्मेलनों में यह मसला कई बार उठा लेकिन मिस्र में हुए कॉप-27 सम्मेलन में जब इस फंड का गठन हुआ था, तो उसके लिए भारत और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय सराहना मिली थी। सभी छोटे देशों ने भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को महत्वपूर्ण माना था। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह यूएन में यह मामला उठाने के साथ-साथ इसी लॉस एंड डैमेज फंड से नेपाल को मुआवजा देने की मांग करने वाले हैं।
भारत हमेशा क्लाइमेट जस्टिस का पक्षधर रहा है। कॉप सम्मेलनों में उसने छोटे और गरीब देशों के प्रति हो रहे अन्याय की हमेशा आलोचना की है। वह गरीब देशों को मदद का हमेशा पक्षधर भी रहा है। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री को फोन करके न केवल हरसंभव सहायता देने का ऐलान किया बल्कि वहां फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने में नेपाली सेना के साथ-साथ भारतीय सेना के जवानों की इस समय पूरी दुनिया में प्रशंसा हो रही है।
नेपाल में आई आपदा के बहाने अब जब यह मुद्दा एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठा है तो सभी अमीर देशों को सोचना होगा कि वे इस महत्वपूर्ण मसले से पल्ला नहीं झाड़ें। बल्कि अपनी जिम्मेवारी को समझें। उन्हें प्रदूषण रोकने के प्रभावी उपायों को बढ़ाने/अपनाने के अलावा गरीब देशों को इसकी भरपाई भी करनी चाहिए, जो नाहक में नुकसान उठा रहे हैं। जहां तक भारत की बात तो वर्ष 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य सामने रखकर चल रहा भारत, नेपाल के साथ खड़ा है।
अब इस आपदा से जो सीखने वाली बात है वह यह कि हमें प्रदूषण को हर छोटे-बड़े संस्थागत/व्यक्तिगत प्रयासों से हर कीमत पर नियंत्रित करना होगा। यह समय की पुकार है। वैसे भी प्रदूषण रोकना केवल सरकार का काम नहीं है।
दरअसल, हिमालय को तीसरा ध्रुव कहा जाता है, क्योंकि दोनों ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ यहीं पर जमी है। यहां से नेपाल की त्रिशूली, गंडक, कोशी जैसी नदियां निकलती हैं और भारत में गंगा नदी में मिलती हैं। यहां से दुनिया का सबसे बड़ा नदी तंत्र निकलता है, जिससे कई देशों की लगभग दो अरब की आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी है। अगर यह तंत्र डिस्टर्ब हुआ तो निश्चित तौर पर समूचे दक्षिण एशिया की सभ्यता खतरे में पड़ जाएगी। और यह डिस्टर्बेंस तभी रुकेगा, जब जलवायु परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभावों से हिमालय को बचाया जाए। अगर हम ऐसे ही प्रदूषण बढ़ाते रहे और परिणामस्वरूप धरती ऐसे ही गर्म होती रही, तो आने वाले दिनों में जो तबाही आएगी, वह अभूतपूर्व होगी। उसकी हम अभी कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसे में इस आपदा से सीख लेनी होगी। (AI image)
(लेखक पत्रकार, उपन्यासकार हैं। वह पर्यावरण से जुड़े मामलों पर लिखते हैं।)

