भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित उन विदेशी कार्बन मूल्य निर्धारण योजनाओं की संकेतात्मक सूची में शामिल किया गया है, जो Carbon Border Adjustment Mechanism (Calculation of CBAM Rate and Determination of Carbon Price Relief) Regulations 2026 के तहत निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा करती हैं। भारत को यह मान्यता ब्रिटेन के साथ लंबे समय से चल रही तकनीकी स्तर की बातचीत के बाद मिली है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
भारत और ब्रिटेन के बीच जलवायु एवं व्यापार सहयोग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तहत ब्रिटेन ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को अपने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत पात्र कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्था के रूप में आधिकारिक मान्यता दे दी है।
इस फैसले से कार्बन-गहन उत्पादों का ब्रिटेन को निर्यात करने वाले भारतीय कारोबारियों पर कार्बन से जुड़ी अतिरिक्त लागत कम होने की उम्मीद है। ब्रिटेन के HM Treasury ने भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के तहत आने वाले ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) को भेजे एक संचार में इस निर्णय की पुष्टि की है।
भारत की CCTS को ब्रिटेन द्वारा प्रकाशित उन विदेशी कार्बन मूल्य निर्धारण योजनाओं की संकेतात्मक सूची में शामिल किया गया है, जो Carbon Border Adjustment Mechanism (Calculation of CBAM Rate and Determination of Carbon Price Relief) Regulations 2026 के तहत निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा करती हैं।
ब्रिटेन के CBAM नियमों के तहत पात्र भारतीय वस्तुओं के आयातक उन उत्पादों पर भारत में CCTS के तहत पहले से चुकाई गई प्रभावी कार्बन कीमत के अनुरूप राहत का दावा कर सकेंगे। इसका उद्देश्य एक ही उत्सर्जन पर दो बार कर या कार्बन लागत लगने की स्थिति को रोकना है—पहली बार भारत में और दूसरी बार ब्रिटेन की सीमा पर। अधिकारियों के अनुसार, इस मान्यता से ब्रिटेन को निर्यात किए जाने वाले भारतीय उत्पादों की प्रभावी CBAM देनदारी कम हो सकती है और इसका सीधा लाभ भारतीय निर्यातकों को मिल सकता है।
हालांकि, यह राहत स्वतः लागू नहीं होगी। ब्रिटेन के आयातकों को निर्धारित दस्तावेज और प्रमाण उपलब्ध कराने के साथ-साथ ब्रिटेन के कानून के तहत जरूरी सत्यापन प्रक्रियाओं को पूरा करना होगा। राहत की वास्तविक राशि भारत में संबंधित उत्पाद पर चुकाई गई प्रभावी कार्बन कीमत पर निर्भर करेगी।
ब्रिटेन का CBAM 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाला है। इसके तहत निर्धारित उच्च-कार्बन उत्पादों में निहित उत्सर्जन पर कार्बन मूल्य लगाया जाएगा। शुरुआती तौर पर इसमें लौह एवं इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
भारत की CCTS एक बाजार-आधारित व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, हटाना या टालना है। इसके तहत उत्सर्जन में कमी से जुड़े कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट के माध्यम से कार्बन की कीमत तय करने और उनका कारोबार करने की व्यवस्था विकसित की जा रही है। इस योजना का प्रशासन ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी करता है।
भारत को यह मान्यता ब्रिटेन के साथ लंबे समय से चल रही तकनीकी स्तर की बातचीत के बाद मिली है। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच CCTS के डिजाइन, संचालन और कार्यान्वयन को लेकर लगातार चर्चा हुई है। यह निर्णय ब्रिटेन के CBAM के उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसके तहत मूल देश में पहले ही पात्र कार्बन कीमत चुका चुके उत्पादों पर सीमा पर दोबारा समान कार्बन लागत लगाने से बचने का प्रयास किया जाता है।
भारत की CCTS अब उन अंतरराष्ट्रीय कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्थाओं की सूची में शामिल हो गई है जिन्हें ब्रिटेन ने मान्यता दी है। इस सूची में यूरोपीय संघ की EU Emissions Trading System, चीन की राष्ट्रीय ETS, जापान की GX-ETS, दक्षिण कोरिया की K-ETS और ऑस्ट्रेलिया का Safeguard Mechanism जैसी योजनाएं भी शामिल हैं। इस फैसले का महत्व भारत-ब्रिटेन व्यापार संबंधों के संदर्भ में और बढ़ जाता है, क्योंकि भारत-ब्रिटेन व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (Comprehensive Economic and Trade Agreement) जुलाई 2026 में लागू हुआ है।
अधिकारियों का मानना है कि CCTS की मान्यता इस समझौते से मिलने वाले शुल्क संबंधी लाभों को बनाए रखने में मदद कर सकती है, क्योंकि इससे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर संभावित कार्बन लागत में वृद्धि का प्रभाव कम किया जा सकेगा। विशेष रूप से इस्पात, एल्युमीनियम, सीमेंट और अन्य कार्बन-गहन क्षेत्रों के लिए यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वैश्विक व्यापार में कार्बन मूल्य निर्धारण और सीमा-समायोजन व्यवस्था का महत्व लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में भारत की घरेलू कार्बन बाजार व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलना भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति के लिए अहम हो सकता है। भारत और ब्रिटेन के बीच कार्बन बाजारों के डिजाइन और क्रियान्वयन को लेकर सहयोग आगे भी जारी रहने की उम्मीद है। यह सहयोग UK-India Energy Memorandum of Understanding और इससे जुड़े अन्य साझेदारी कार्यक्रमों के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सकता है। इस घटनाक्रम को भारत-ब्रिटेन के बीच जलवायु सहयोग की दिशा में सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, इससे भारत को अन्य व्यापारिक साझेदारों के समक्ष भी अपनी कार्बन क्रेडिट व्यवस्था की अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए प्रयास तेज करने का आधार मिल सकता है।
यूरोपीय संघ समेत अन्य बाजारों में भारतीय कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्था की संभावित मान्यता आने वाले समय में भारतीय निर्यातकों के लिए और महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
(इन्फोग्राफिक्स-एआई)

