सुप्रीम कोर्ट ने ताप विद्युत संयंत्रों में फ्ल्यू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली की समयबद्ध स्थापना की मांग वाली याचिका पर याचिकाकर्ता को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) जाने का निर्देश दिया है। अदालत ने NGT से इस मामले और अंतरिम राहत की मांग पर प्राथमिकता के आधार पर विचार करने को कहा है। याचिका में 2015 के नियमों के तहत श्रेणी ‘A’ संयंत्रों में बार-बार बढ़ाई जा रही समयसीमा और SO₂ प्रदूषण पर चिंता जताई गई थी।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: देश के ताप विद्युत संयंत्रों में पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का रुख करने का निर्देश दिया है।
याचिका में देशभर के सभी श्रेणी ‘A’ के ताप विद्युत संयंत्रों में फ्ल्यू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) प्रणाली की समयबद्ध स्थापना और संचालन सुनिश्चित करने की मांग की गई थी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे, ने कहा कि उठाए गए मुद्दे पर्यावरण संबंधी मामलों के विशेषज्ञ मंच NGT के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
पीठ ने अधिकरण से विशेष रूप से याचिका में मांगी गई अंतरिम राहत के मुद्दे पर प्राथमिकता के आधार पर विचार करने और उचित आदेश पारित करने का अनुरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने याचिका के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और न ही मामले का मेरिट के आधार पर फैसला किया है।
2015 के नियमों का हवाला याचिकाकर्ता ने केंद्र और संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की थी कि सभी श्रेणी ‘A’ ताप विद्युत संयंत्रों में FGD प्रणाली की स्थापना और उसे चालू करने की प्रक्रिया निश्चित समयसीमा में पूरी की जाए।
इसके अलावा FGD स्थापना की प्रगति की निगरानी और उत्सर्जन मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग भी की गई थी। याचिका में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की दिसंबर 2015 की अधिसूचना का हवाला दिया गया, जिसमें कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन को कम करने के लिए FGD प्रणाली लगाने के प्रावधान किए गए थे।
श्रेणी ‘A’ में ऐसे ताप विद्युत संयंत्र शामिल हैं जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की 10 किलोमीटर की परिधि में स्थित हैं या ऐसे शहरों में हैं जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है। समयसीमा बढ़ाए जाने पर सवाल याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि FGD प्रणालियां लगाने की समयसीमा पिछले कई वर्षों में बार-बार बढ़ाई गई है।
मौजूदा विस्तारित समयसीमा 2027 में समाप्त होने वाली है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि लगातार अनुपालन न होने से पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाले प्रदूषण के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। NGT में प्राथमिकता से सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि याचिका में उठाई गई मांगों को NGT के समक्ष प्रभावी तरीके से रखा और तय किया जा सकता है।
अदालत ने NGT से याचिकाकर्ता की अंतरिम राहत की मांग पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई करने को कहा। FGD एक प्रदूषण नियंत्रण तकनीक है जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को कम करने के लिए किया जाता है।
SO₂ वायु प्रदूषण, अम्लीय वर्षा और श्वसन संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं में योगदान कर सकता है। ताप विद्युत संयंत्रों पर बढ़ता दबाव 2015 में उत्सर्जन संबंधी मानक लागू किए जाने और बाद में कई बार समयसीमा बढ़ाए जाने के बावजूद FGD अनुपालन लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञ विशेष रूप से घनी आबादी वाले क्षेत्रों और NCR के आसपास स्थित संयंत्रों से होने वाले उत्सर्जन को लेकर चिंता जताते रहे हैं।
कुछ संयंत्रों में FGD प्रणाली आंशिक या पूरी तरह स्थापित हो चुकी है, जबकि कई श्रेणी ‘A’ संयंत्रों में इसका पूर्ण संचालन अब भी लंबित बताया जाता है। खासकर उत्तर भारत में वायु गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए इन प्रणालियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले को NGT के समक्ष भेजना पर्यावरणीय विवादों में अधिकरण की विशेषज्ञ भूमिका को भी रेखांकित करता है। अब याचिकाकर्ता NGT में FGD स्थापना में तेजी लाने, अनुपालन की निगरानी और समयबद्ध कार्रवाई के लिए आवश्यक निर्देशों की मांग कर सकता है। मामले के परिणाम का असर ताप विद्युत संयंत्र संचालकों की अनुपालन समयसीमा और गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता सुधार के प्रयासों पर पड़ सकता है।
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