भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए ऑरोविल, गोवर्धन इकोविलेज, खोनोमा और मावलिन्नोंग जैसे इको-विलेज पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का बेहतरीन मेल पेश कर रहे हैं। इसके साथ ही हरित भवन, एग्री-फोटोवोल्टिक तकनीक और अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं वर्ष 2070 तक नेट-जीरो के लक्ष्य और ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत में तेजी से बदलते तकनीकी दौर के बीच विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करना एक बड़ी चुनौती है। देश में उभरते इको-विलेज, हरित भवन और अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं इस चुनौती का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कर रही हैं। इनमें पारंपरिक भारतीय ज्ञान को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर टिकाऊ और सामुदायिक जीवनशैली को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तमिलनाडु का ऑरोविल भारत के सबसे चर्चित इको-विलेज मॉडल में शामिल है। 1960 में स्थापित यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय पांच दशकों से अधिक समय से पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली के प्रयोग कर रहा है। इसी तरह महाराष्ट्र के सह्याद्रि क्षेत्र में स्थित गोवर्धन इकोविलेज 140 एकड़ में जैविक खेती, प्राकृतिक जीवनशैली, योग, हरित आवास और आयुर्वेदिक स्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत करता है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है।
नागालैंड का खोनोमा एशिया के शुरुआती हरित गांवों में माना जाता है। अंगामी समुदाय ने यहां पारंपरिक कृषि, जैव विविधता संरक्षण और सामुदायिक वन्यजीव संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाया है। वहीं आगरा का दयालबाग वर्ष 1915 से पर्यावरण-अनुकूल और सामुदायिक जीवन का उदाहरण रहा है।
यहां सौर ऊर्जा, बैटरी चालित इलेक्ट्रिक वाहन, सामुदायिक रसोई और सौर कुकिंग तकनीक के साथ कृषि भूमि में सौर ऊर्जा के उपयोग यानी एग्री-फोटोवोल्टिक तकनीक को भी अपनाया गया है। दयालबाग में औषधीय पौधों की खेती तथा मशरूम तकनीक के प्रशिक्षण के जरिए ग्रामीण किसानों को भी सशक्त किया जा रहा है।
मेघालय का मावलिन्नोंग स्वच्छता और सामुदायिक भागीदारी का उल्लेखनीय उदाहरण है। कचरा पृथक्करण, बांस से बने कूड़ेदान और प्लास्टिक पर नियंत्रण ने इसे स्वच्छता के लिए पहचान दिलाई है। राजस्थान का पिपलांत्री पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक सशक्तीकरण से जोड़ता है, जहां प्रत्येक बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की परंपरा ने गांव को हरित क्षेत्र में बदल दिया है। शहरी भारत में भी हरित भवनों का विस्तार हो रहा है।
LEED प्रमाणन के तहत ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, जल पुनर्चक्रण और कचरा प्रबंधन जैसे मानकों को अपनाया जा रहा है। पुणे का सुजलॉन वन अर्थ, हैदराबाद का CII-Sohrabji Godrej Green Business Centre और गुरुग्राम का ITC Green Centre इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
वहीं ANT Studio ने मिट्टी के पारंपरिक घड़ों से प्रेरित निष्क्रिय कूलिंग तकनीक विकसित कर भारतीय कारीगरी और आधुनिक विज्ञान के मेल की मिसाल पेश की है। अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में एग्री-फोटोवोल्टिक तकनीक किसानों की आजीविका और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को एक साथ आगे बढ़ाने की क्षमता रखती है।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में इस तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश के खंडवा स्थित ओंकारेश्वर में फ्लोटिंग सोलर परियोजना और तमिलनाडु के कायथार का पवन ऊर्जा क्षेत्र भी भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को दर्शाते हैं। भारत का हरित परिवर्तन केवल पर्यावरणीय नीतियों तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की ऐसी सोच को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें प्राचीन ज्ञान, सामुदायिक भागीदारी और आधुनिक तकनीक एक-दूसरे के पूरक हैं।
2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य और 2047 तक विकसित भारत की परिकल्पना हासिल करने की दिशा में इको-विलेज, हरित भवन और अक्षय ऊर्जा पहल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। भारत की हरित विरासत यह संदेश देती है कि सतत भविष्य कोई दूर का सपना नहीं, बल्कि आज से ही आकार लेती वास्तविकता है।
Also Read: भारत की हरित अर्थव्यवस्था में 2047 तक 4.1 ट्रिलियन डॉलर निवेश की संभावना, 4.8 करोड़ रोजगार के अनुमान

