By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
Environment PulseEnvironment PulseEnvironment Pulse
Notification Show More
Font ResizerAa
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Reading: हिमालयी इलाकों में हाई-रिस्क मेगा प्रोजेक्ट्स पर रोक की मांग
Share
Font ResizerAa
Environment PulseEnvironment Pulse
  • ईको सिस्टम
  • कचरा-प्रबंधन
  • फ्यूचर ग्रीन
  • ओपिनियन
  • मल्टीमीडिया
Search
  • ईको सिस्टम
    • जल
    • जंगल
    • जमीन
    • हवा
    • खनिज
    • जैव-विविधता
    • गतिविधियां
  • कचरा-प्रबंधन
    • ग्रीन बिजनेस
    • रीसाइकलिंग
    • इन्नोवेशन
    • इनिशिएटिव्स
  • फ्यूचर ग्रीन
    • ऊर्जा
    • सस्टेनिबिलिटी
    • इलेक्ट्रिक व्हीकल
    • कृषि एवं खाद्य
  • ओपिनियन
    • विचार
    • इम्पैक्ट फीचर
    • स्टोरी
  • मल्टीमीडिया
    • वीडियो
Have an existing account? Sign In
Follow US
Environment Pulse > ईको सिस्टम > जल > हिमालयी इलाकों में हाई-रिस्क मेगा प्रोजेक्ट्स पर रोक की मांग
AI Image
जल

हिमालयी इलाकों में हाई-रिस्क मेगा प्रोजेक्ट्स पर रोक की मांग

Environment Pulse
Last updated: September 10, 2026 2:48 pm
Environment Pulse
Published: September 10, 2026
Share
AI Image
SHARE

इस मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों और नेपाल में आई भीषण आपदाओं के बाद पर्यावरण और नागरिक संगठनों ने हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों को हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए ‘नो-गो जोन’ घोषित करने की मांग की है। संगठनों का कहना है कि बड़े बांध, चौड़ी सड़कें और सुरंगें पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। उन्होंने नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन, वहन क्षमता की जांच और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क।  इस साल मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़, भूस्खलन और अचानक बढ़े नदी प्रवाह के बाद पर्यावरण एवं नागरिक संगठनों ने हिमालय के बड़े हिस्से को उच्च जोखिम वाली मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए ‘नो-गो जोन’ घोषित करने की मांग की है।

संगठनों का कहना है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े बांध, चौड़ी सड़कें और सुरंग जैसी परियोजनाएं आपदाओं के प्रभाव को और बढ़ा सकती हैं।

देहरादून में जारी संयुक्त बयान में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और नेपाल के कुछ हिस्सों के पर्यावरण समूहों, स्थानीय समुदाय संगठनों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों की समीक्षा की मांग की।

संगठनों ने कहा कि भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में बिना समग्र आकलन के परियोजनाओं को मंजूरी देना स्थानीय समुदायों और पर्यावरण दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।

संगठनों ने मांग की है कि चिन्हित संवेदनशील क्षेत्रों में हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले क्षेत्र की वहन क्षमता, जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम और परियोजनाओं के निचले इलाकों पर पड़ने वाले प्रभाव का स्वतंत्र और व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए।

इस वर्ष मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों के कई हिस्सों में भूस्खलन, अचानक आई बाढ़ और नदियों में तेज उफान से सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं।

बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित भी होना पड़ा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जंगलों की कटाई, पहाड़ी ढलानों की कटिंग और अव्यवस्थित निर्माण ने कई स्थानों पर आपदा के प्रभाव को बढ़ाया।

नागरिक संगठनों ने ऊपरी गंगा और यमुना घाटियों के कुछ हिस्सों, तीस्ता नदी क्षेत्र के चुनिंदा इलाकों और नेपाल के मध्य-पहाड़ी क्षेत्रों को प्राथमिकता वाले ‘नो-गो जोन’ के रूप में चिन्हित करने की बात कही है। इन क्षेत्रों में नए बड़े प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पर्यावरणीय और आपदा जोखिमों की विस्तृत समीक्षा की मांग की गई है।

संगठनों ने पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को और सख्त बनाने तथा परियोजनाओं से प्रभावित स्थानीय समुदायों की सहमति को अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है। साथ ही बड़े और केंद्रीकृत प्रोजेक्ट्स के बजाय छोटी, विकेंद्रीकृत और जलवायु-लचीली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। सरकार की ओर से इस मांग पर अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

हालांकि, पिछले वर्षों में सरकारों का पक्ष रहा है कि दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, ऊर्जा और संपर्क सुविधाओं के विकास के लिए बुनियादी ढांचा परियोजनाएं जरूरी हैं। अधिकारियों ने साथ ही आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता भी स्वीकार की है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय दुनिया के सबसे अधिक भूकंपीय गतिविधि वाले और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, बारिश के बदलते पैटर्न और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।

नागरिक संगठनों ने कहा है कि वे आने वाले हफ्तों में राज्य और केंद्र सरकारों के समक्ष संवेदनशील क्षेत्रों के विस्तृत नक्शे और वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने मांग की है कि नई परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी देने से पहले सार्वजनिक परामर्श और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। संगठनों का कहना है कि विकास और कनेक्टिविटी की जरूरतों के साथ हिमालय की प्राकृतिक सीमाओं और आपदा जोखिमों को भी समान महत्व देना जरूरी है।

Also Read: स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में लखनऊ देश में नंबर-1, वार्ड-70 को भी मिला सर्वश्रेष्ठ वार्ड का सम्मान

You Might Also Like

Assam Flood Governance Overhaul: Experts Call for New Frameworks to Manage Chronic Regional Flooding
बढ़ते तापमान ने नेपाल की घातक बाढ़ का खतरा बढ़ाया
एनजीटी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का पीएम मोदी ने किया उद्घाटन, जलवायु न्याय और पर्यावरण संरक्षण पर दिया जोर
गुजरात में मैंग्रोव संरक्षण के लिए Mangrove GIS पोर्टल लॉन्च, वैज्ञानिक निगरानी को मिलेगा बढ़ावा
जब चरागाह खतरे में पड़ा तो 700 किमी चल पड़ा थार का ऊंटपालक
TAGGED:Climate ResilienceEcological SensitivityEnvironmental ImpactHimalayan RegionLandslides and FloodsMega Infrastructure ProjectsNo-Go Zone
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp LinkedIn Email Copy Link Print
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe
LinkedInFollow
Popular News
AI Image
जंगल

सिंगापुर का क्लाइमेट मिशन सवालों में, विकास के बीच कट रहे जंगल

Environment Pulse
Environment Pulse
September 16, 2026
भारत ने पार किया 300 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का आंकड़ा: जलवायु लक्ष्यों के लिए अहम
क्या चीन एशिया में ग्रीन फार्मिंग क्रांति का इंजन बन सकता है? पाम ऑयल और सस्टेनेबल एग्री-फाइनेंस से बदलती क्षेत्रीय खेती की तस्वीर
‘वाइल्ड विज्डम ग्लोबल चैलेंज-2026’ से जोड़ा जाएगा नई पीढ़ी को
विश्व बैंक के जलवायु लक्ष्यों से पीछे हटने की कीमत चुका सकते हैं भारत के सबसे संवेदनशील समुदाय

Categories

  • जल
  • जमीन
  • जंगल
  • जैव-विविधता
  • हवा
  • खनिज
  • ऊर्जा
  • ग्रीन जॉब
  • स्टोरी
  • इम्पैक्ट फीचर
  • वीडियो

About US

Environmentpulse.com is a bilingual (Hindi-English) news platform that presents high-quality news, views, and videos related to the environment.
Quick Link
  • ऊर्जा
  • खनिज
  • जैव-विविधता
  • जंगल
Top Categories
  • My Bookmark
  • Contact
  • Privacy Policy
Environment PulseEnvironment Pulse
© Pratham Publisher and Informatics Private Limited. All Rights Reserved. | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?