इस मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों और नेपाल में आई भीषण आपदाओं के बाद पर्यावरण और नागरिक संगठनों ने हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों को हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए ‘नो-गो जोन’ घोषित करने की मांग की है। संगठनों का कहना है कि बड़े बांध, चौड़ी सड़कें और सुरंगें पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। उन्होंने नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले स्वतंत्र वैज्ञानिक मूल्यांकन, वहन क्षमता की जांच और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। इस साल मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़, भूस्खलन और अचानक बढ़े नदी प्रवाह के बाद पर्यावरण एवं नागरिक संगठनों ने हिमालय के बड़े हिस्से को उच्च जोखिम वाली मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए ‘नो-गो जोन’ घोषित करने की मांग की है।
संगठनों का कहना है कि संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े बांध, चौड़ी सड़कें और सुरंग जैसी परियोजनाएं आपदाओं के प्रभाव को और बढ़ा सकती हैं।
देहरादून में जारी संयुक्त बयान में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और नेपाल के कुछ हिस्सों के पर्यावरण समूहों, स्थानीय समुदाय संगठनों तथा स्वतंत्र विशेषज्ञों ने हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों की समीक्षा की मांग की।
संगठनों ने कहा कि भूगर्भीय रूप से संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में बिना समग्र आकलन के परियोजनाओं को मंजूरी देना स्थानीय समुदायों और पर्यावरण दोनों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।
संगठनों ने मांग की है कि चिन्हित संवेदनशील क्षेत्रों में हाई-रिस्क मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि नई परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले क्षेत्र की वहन क्षमता, जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम और परियोजनाओं के निचले इलाकों पर पड़ने वाले प्रभाव का स्वतंत्र और व्यापक वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए।
इस वर्ष मानसून के दौरान हिमालयी राज्यों के कई हिस्सों में भूस्खलन, अचानक आई बाढ़ और नदियों में तेज उफान से सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं।
बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित भी होना पड़ा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जंगलों की कटाई, पहाड़ी ढलानों की कटिंग और अव्यवस्थित निर्माण ने कई स्थानों पर आपदा के प्रभाव को बढ़ाया।
नागरिक संगठनों ने ऊपरी गंगा और यमुना घाटियों के कुछ हिस्सों, तीस्ता नदी क्षेत्र के चुनिंदा इलाकों और नेपाल के मध्य-पहाड़ी क्षेत्रों को प्राथमिकता वाले ‘नो-गो जोन’ के रूप में चिन्हित करने की बात कही है। इन क्षेत्रों में नए बड़े प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पर्यावरणीय और आपदा जोखिमों की विस्तृत समीक्षा की मांग की गई है।
संगठनों ने पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया को और सख्त बनाने तथा परियोजनाओं से प्रभावित स्थानीय समुदायों की सहमति को अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है। साथ ही बड़े और केंद्रीकृत प्रोजेक्ट्स के बजाय छोटी, विकेंद्रीकृत और जलवायु-लचीली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है। सरकार की ओर से इस मांग पर अभी कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
हालांकि, पिछले वर्षों में सरकारों का पक्ष रहा है कि दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क, ऊर्जा और संपर्क सुविधाओं के विकास के लिए बुनियादी ढांचा परियोजनाएं जरूरी हैं। अधिकारियों ने साथ ही आपदा से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता भी स्वीकार की है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय दुनिया के सबसे अधिक भूकंपीय गतिविधि वाले और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, बारिश के बदलते पैटर्न और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
नागरिक संगठनों ने कहा है कि वे आने वाले हफ्तों में राज्य और केंद्र सरकारों के समक्ष संवेदनशील क्षेत्रों के विस्तृत नक्शे और वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने मांग की है कि नई परियोजनाओं को पर्यावरणीय मंजूरी देने से पहले सार्वजनिक परामर्श और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। संगठनों का कहना है कि विकास और कनेक्टिविटी की जरूरतों के साथ हिमालय की प्राकृतिक सीमाओं और आपदा जोखिमों को भी समान महत्व देना जरूरी है।
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