अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े जलाशय ‘लेक पॉवेल’ का जलस्तर सितंबर में अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। सर्दियों में बेहद कम बर्फबारी और असामान्य गर्मी के कारण जलाशय में पानी की आवक घटकर औसत का केवल 18 प्रतिशत रह गई, जिसके परिणामस्वरूप अक्टूबर तक जलाशय की क्षमता केवल 22 से 23 प्रतिशत के करीब बची है और यह ग्लेन कैन्यन बांध के न्यूनतम जलविद्युत उत्पादन स्तर (3,490 फीट) से केवल 30 फीट ऊपर है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : सर्दियों में कम बर्फबारी और रिकॉर्ड गर्मी का असर; जलाशय की क्षमता घटकर 22-23 प्रतिशत के करीब पहुंची, जलविद्युत उत्पादन और जल आपूर्ति पर बढ़ा दबाव
अक्टूबर 2026। अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े जलाशयों में शामिल लेक पॉवेल का जलस्तर सितंबर में दर्ज इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। कोलोराडो नदी बेसिन में सर्दियों के दौरान बेहद कम वर्षा और असामान्य गर्मी के कारण जलाशय में पानी की आवक घट गई। सितंबर में जलाशय की सतह समुद्र तल से लगभग 3,516.6 फीट की ऊंचाई पर आ गई, जिसने वर्ष 2023 में दर्ज पिछले न्यूनतम स्तर का रिकॉर्ड तोड़ दिया। अक्टूबर में मामूली सुधार के बावजूद जलस्तर ऐतिहासिक निचले स्तर के करीब बना हुआ है।
लेक पॉवेल अमेरिका के पश्चिमी हिस्से में जल आपूर्ति, सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण है। इसके जलस्तर में गिरावट से कोलोराडो नदी पर निर्भर सात अमेरिकी राज्यों और मेक्सिको के बीच पानी के बंटवारे को लेकर दबाव बढ़ने की आशंका है।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के जलवर्ष में ऊपरी कोलोराडो नदी बेसिन में बर्फ का संचय रिकॉर्ड के सबसे कमजोर स्तरों में रहा। इसी अवधि में तापमान भी एक सदी से अधिक समय के अवलोकनों में सबसे अधिक रहा।
अप्रैल से जुलाई के बीच लेक पॉवेल में प्राकृतिक रूप से आने वाले पानी की मात्रा औसत का केवल 18 प्रतिशत रही। पूरे जलवर्ष में पानी की आवक भी अब तक दर्ज सबसे कम स्तरों में शामिल रही। इस दौरान जलाशय से पानी की निकासी और वाष्पीकरण की मात्रा, उसमें आने वाले पानी से अधिक रही। इसके परिणामस्वरूप जलाशय को संचालन संबंधी बड़ी कमी का सामना करना पड़ा।
विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में बर्फ कम जमा होने के साथ बढ़ते तापमान का दोहरा प्रभाव पड़ता है। इससे न केवल पानी की कुल उपलब्धता घटती है, बल्कि बर्फ पिघलने और नदी में पानी पहुंचने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।
अक्टूबर के मध्य तक लेक पॉवेल में पानी का स्तर उसकी कुल क्षमता के लगभग 22 से 23 प्रतिशत तक रह गया था। जलाशय का जलस्तर पूर्ण क्षमता के स्तर से 175 फीट से अधिक नीचे था।
जलाशय का स्तर ग्लेन कैन्यन बांध के न्यूनतम जलविद्युत उत्पादन स्तर से केवल लगभग 30 फीट ऊपर रह गया। यह सीमा समुद्र तल से 3,490 फीट है। इसके नीचे पानी पहुंचने पर बांध से जलविद्युत उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
डाउनस्ट्रीम स्थित लेक मीड में भी जलस्तर रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब पहुंच गया या कुछ आकलनों में उस स्तर तक दर्ज किया गया। इससे स्पष्ट है कि संकट केवल एक जलाशय तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे कोलोराडो नदी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है।
जलस्तर में गिरावट के कारण लेक पॉवेल के आसपास कई नौका रैंप बंद करने पड़े हैं या उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। पानी के नीचे रहने वाले भूभाग अब दिखाई देने लगे हैं, जबकि नौकायन और अन्य मनोरंजक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है।
इस स्थिति ने कोलोराडो नदी से जुड़े सात अमेरिकी राज्यों और मेक्सिको के बीच जल आवंटन को लेकर चुनौतियां बढ़ा दी हैं। नदी का पानी घरेलू जरूरतों, कृषि, उद्योग और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में लंबे समय तक कम जलस्तर बने रहने से विभिन्न क्षेत्रों के बीच पानी के इस्तेमाल को लेकर कठिन निर्णय लेने पड़ सकते हैं।
संघीय एजेंसियों के 24 महीने के पूर्वानुमानों के अनुसार, सबसे संभावित परिदृश्यों में लेक पॉवेल का जलस्तर वर्ष 2027 तक मौजूदा स्तर के आसपास या उससे नीचे रह सकता है। यदि अगली सर्दियों में भी बर्फबारी कम होती है, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
जलाशय का संचालन करने वाली एजेंसियां ऊपरी हिस्सों में स्थित जलाशयों से पानी छोड़ने और निकासी को नियंत्रित करने जैसे उपायों के जरिए महत्वपूर्ण जलस्तर बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि, इन उपायों की प्रभावशीलता उपलब्ध पानी और भविष्य की मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
लेक पॉवेल का संकट पिछले लगभग दो दशकों से जारी दीर्घकालिक शुष्कता, बढ़ते तापमान और पानी की लगातार बनी मांग के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण पश्चिमी अमेरिका के कई हिस्सों में जल उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
आने वाली सर्दियों में बर्फबारी की मात्रा जलाशय की स्थिति सुधारने में निर्णायक होगी। यदि पर्याप्त बर्फ नहीं जमी और नदी में पानी की आवक नहीं बढ़ी, तो कोलोराडो नदी तंत्र को जलविद्युत उत्पादन, पर्यटन और विभिन्न राज्यों की जल आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
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