COP31 से पहले तुर्की ने विकासशील देशों के लिए ‘ब्रिज’ (तकनीकी सहायता मंच) और ‘सर्फ’ (सस्ती ऋण सुविधा) नामक दो नई वित्तीय व्यवस्थाओं की घोषणा की है। अज़रबैजान ने कृषि और सिंचाई के विकास के लिए 54 करोड़ यूरो की प्रतिबद्धता जताई है और छोटे किसानों के लिए एआई-आधारित स्कोरिंग प्रणाली शुरू की है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: अज़रबैजान की राजधानी बाकू में 7 से 11 सितंबर 2026 तक आयोजित हुए बाकू क्लाइमेट एक्शन वीक में देश ने यह साफ संकेत दिया कि वह 2024 में हुए COP29 सम्मेलन की मेज़बानी के बाद अब अपने जलवायु वादों को ठोस निवेश में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
यह सम्मेलन बाकू कन्वेंशन सेंटर में आयोजित किया गया और इसे संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज की पूर्वी यूरोप, काकेशस और मध्य एशिया क्षेत्रीय जलवायु सप्ताह के साथ मिलाकर आयोजित किया गया था।
इस सम्मेलन के दौरान अज़रबैजान के कृषि मंत्री मजनून मम्मादोव ने घोषणा की कि देश ने अपने 2026 से 2030 तक के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत जलवायु-अनुकूल सिंचाई ढांचे के विकास के लिए करीब एक अरब मानत, यानी लगभग 54 करोड़ यूरो की प्रतिबद्धता जताई है। यह राशि कृषि क्षेत्र के उस बजट का लगभग 40 प्रतिशत है जिसे जलवायु अनुकूलन के लिए अलग रखा गया है।
इस फंडिंग का इस्तेमाल दक्षिण काकेशस क्षेत्र में आधुनिक सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देने में किया जाएगा, जहां पानी की कमी, मौसम के बदलते चक्र और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएं लगातार गंभीर होती जा रही हैं।
इसके साथ ही सरकार ने इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन, यानी FAO के सहयोग से एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित किसान-स्कोरिंग प्रणाली भी शुरू की है। इस डिजिटल प्रणाली का पहला परीक्षण 2024 में किया गया था और 2025 में इसे और परखा गया। यह प्रणाली पांच से सौ हेक्टेयर तक की जमीन संभालने वाले छोटे किसानों को अग्रिम सब्सिडी भुगतान वितरित करती है। मंत्री मम्मादोव ने बताया कि इस योजना में पात्रता का आकलन तीन मुख्य आधारों पर किया जाता है, जिनमें आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाना, फसल की आर्थिक उपयोगिता और मुनाफा, तथा मिट्टी की सेहत और जल-संरक्षण या मिट्टी-सुधार तकनीकों के इस्तेमाल जैसे पारिस्थितिक प्रभाव शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यह स्कोरिंग व्यवस्था तीन बुनियादी स्तंभों पर आधारित है, जिनमें आधुनिक कृषि पद्धतियां, फसल का आर्थिक मूल्य और उसका पारिस्थितिक असर शामिल हैं। मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि काकेशस क्षेत्र में छोटे किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं, क्योंकि तापमान या जल उपलब्धता में मामूली बदलाव भी उनकी पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि स्थानीय कृषि ढांचे में निवेश करने वाले अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भी घरेलू किसानों जितनी ही सब्सिडी सुविधाएं दी जाएंगी।
अज़रबैजान में FAO की प्रतिनिधि नासर हयात ने इस मौके पर कहा कि कृषि क्षेत्र एक अनोखी स्थिति में है क्योंकि यह जहां जलवायु परिवर्तन का कारण बनता है, वहीं खुद भी इसके प्रभाव से प्रभावित होता है। सम्मेलन में एक अलग सत्र में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन, यानी UNIDO ने अज़रबैजान को सुझाव दिया कि वह यूरोप को हरित हाइड्रोजन निर्यात करने की महत्वाकांक्षाओं से पहले घरेलू औद्योगिक इस्तेमाल को प्राथमिकता दे। UNIDO की जलवायु एवं प्रौद्योगिकी साझेदारी प्रभाग की प्रमुख पेट्रा श्वागर ने कहा कि यूरोप तक पाइपलाइन के जरिए निर्यात में अभी कई साल लगेंगे क्योंकि इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा अभी मौजूद नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि निकट भविष्य में हरित अमोनिया जैसे हरित हाइड्रोजन उत्पादों का इस्तेमाल घरेलू उर्वरक निर्माण और शिपिंग ईंधन में किया जा सकता है। श्वागर ने यह भी कहा कि औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन की सफलता का असली पैमाना नीतिगत वादे या तकनीकी साझेदारियां नहीं, बल्कि सत्यापन योग्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी है।
वित्तीय मोर्चे पर, तुर्की ने आगामी COP31 सम्मेलन, जो अंताल्या में आयोजित होगा, से पहले दो नई वित्तीय व्यवस्थाओं की घोषणा की। इनमें पहली है ब्रिज नामक तकनीकी सहायता मंच, जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के साथ मिलकर विकासशील देशों को निवेश-योग्य परियोजनाएं तैयार करने में मदद देने के लिए बनाया गया है। दूसरी व्यवस्था है सर्फ, जो तुर्की के नगरपालिका ऋण मॉडल को अपनाकर विकासशील देशों के शहरों तक सस्ती ऋण सुविधाएं पहुंचाने का काम करेगी।
COP31 की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और तुर्की के पर्यावरण, शहरीकरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की उप मंत्री फातिमा वारांक ने बाकू से अंताल्या तक की साझा यात्रा में मेज़बान देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग को अवसर बताते हुए अनुभवों को साझा करने, साझेदारियों को गहरा करने और जलवायु वित्त को ठोस क्रियान्वयन की ओर मोड़ने की बात कही।
इसके अलावा अज़रबैजान के उप विदेश मंत्री याल्चिन रफीयेव ने पुष्टि की कि अज़रबैजान और मध्य एशिया से नवीकरणीय ऊर्जा को यूरोपीय बाजारों तक पहुंचाने वाली ब्लैक सी सबसी केबल परियोजना अब भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि मेज़बान देश की विरासत को बनाए रखने के लिए COP सम्मेलनों के बीच निरंतरता बेहद जरूरी है, और वैश्विक स्तर पर भी इसका महत्व उतना ही अधिक है।
उन्होंने यह भी बताया कि COP29 की विरासत ने कज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और किर्गिज़स्तान जैसे देशों को ठोस हरित ग्रिड प्रस्तावों के साथ आगे आने के लिए प्रेरित किया है। गौरतलब है कि 2024 में बाकू में हुए COP29 सम्मेलन में धनी देशों ने यह सहमति जताई थी कि वे 2035 तक विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और उत्सर्जन कम करने में मदद के लिए हर साल कम से कम 300 अरब डॉलर, यानी करीब 258 अरब यूरो देंगे।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने उस समय इस समझौते को आगे बढ़ने के लिए एक आधार बताया था, हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि यह संकट की गंभीरता के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। वर्ल्ड क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेन्स नीलसन के अनुसार, वैश्विक जलवायु कूटनीति अब एक बड़े संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जो जलवायु परिवर्तन की राजनीति से हटकर जलवायु परिवर्तन की अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि दुनिया केवल वादों और कार्रवाइयों से आगे बढ़कर सीधे बैंक-योग्य वित्तीय लेनदेन की दिशा में कदम बढ़ाए। कुल मिलाकर, बाकू में हुए इस सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि जलवायु कूटनीति अब राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस, निवेश-योग्य और क्रियान्वयन-केंद्रित दिशा की ओर बढ़ रही है।
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