नेपाल और तिब्बत के सीमावर्ती क्षेत्रों में आई विनाशकारी बाढ़ और बड़े भूस्खलन के कारण 1,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 4,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। वैश्विक तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने तथा पर्माफ्रॉस्ट के कमजोर होने से ऐसे चरम घटनाक्रमों का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। नदी घाटियों में अनियंत्रित बुनियादी ढांचे के विकास और बढ़ती आबादी के कारण इस आपदा का पैमाना और अधिक व्यापक हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय समुदायों की सुरक्षा के लिए मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, जलवायु-संवेदनशील विकास योजनाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को तत्काल प्रभाव से मजबूत करने की आवश्यकता है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। नेपाल और तिब्बत में हाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों और पर्वतीय आबादी की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ से भारी तबाही हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, इस आपदा में मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो गई है, जबकि 4,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
नेपाल के जलवायु परिवर्तन मामलों के प्रमुख महेश्वर ढकाल ने इस आपदा के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन की भूमिका को रेखांकित किया है। वहीं नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सामूहिक प्रयास तेज करने की अपील की है।
उन्होंने कहा कि नेपाल और उसके नागरिकों के सामने जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौतियों में से एक है और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए वैश्विक स्तर पर मिलकर काम करना आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विशेष आपदा में जलवायु परिवर्तन की सटीक भूमिका का आकलन करने में अभी समय लगेगा, लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान और हिमालयी क्षेत्र में बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों ने ऐसे चरम घटनाक्रमों का जोखिम बढ़ा दिया है।
नेपाल पहले भी बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता रहा है। वर्ष 2012 और 2017 में भी विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने कई इलाकों को प्रभावित किया था। वर्ष 2015 में आए 7.8 तीव्रता के भूकंप ने करीब 9,000 लोगों की जान ले ली थी और मध्य तथा पश्चिमी नेपाल के 14 जिलों में 20,000 से अधिक भूस्खलनों को जन्म दिया था। हालिया घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी देशों को आपदाओं से निपटने की अपनी तैयारियों को किस तरह मजबूत करना होगा। विशेषज्ञों के मुताबिक हालिया बाढ़ की शुरुआत एक बड़े भूस्खलन से हुई।
इसके बाद ग्लेशियर का एक हिस्सा नीचे की ओर खिसका और चट्टानों तथा पिघले हुए पानी का विशाल प्रवाह नदी घाटियों और आसपास के गांवों की ओर बढ़ गया। कोलंबिया विश्वविद्यालय के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर गोरान एकस्ट्रॉम के अनुसार, ऊंचे हिमालय की भौगोलिक संरचना बेहद गतिशील है।
इन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से भी लगातार कटाव और भूस्खलन होते रहे हैं, लेकिन बढ़ते वैश्विक तापमान ने इन प्रक्रियाओं की गति को प्रभावित किया है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पीछे हटने, बर्फ के पिघलने और पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी भूमि के पिघलने जैसी प्रक्रियाएं पर्वतीय ढलानों की स्थिरता पर असर डाल सकती हैं। इससे कुछ इलाकों में भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
हिमालयी आपदाओं का प्रभाव इसलिए भी गंभीर हो रहा है क्योंकि पिछले कई दशकों में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार नदी घाटियों और नदी किनारे बसे क्षेत्रों में हुआ है। पर्यटन के विस्तार के साथ पर्वतीय कस्बों और गांवों में आबादी बढ़ी है। इसके अलावा जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण भी तेजी से हुआ है।
नतीजतन, जिन संकरी और खड़ी घाटियों में पहले अपेक्षाकृत कम लोग रहते थे, वहां अब बड़ी संख्या में लोग और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा मौजूद है। विशेषज्ञों के अनुसार बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं हिमालय में नई नहीं हैं, लेकिन अब इनके संभावित नुकसान का पैमाना काफी बढ़ गया है। आबादी, सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और पर्यटन सुविधाएं जब संवेदनशील नदी घाटियों में मौजूद हों, तो किसी भी अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदा का असर कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की आवश्यकता को भी सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संवेदनशील क्षेत्रों में भूस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ की बेहतर निगरानी तथा समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था हो, तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बानी के वायुमंडलीय एवं पर्यावरणीय विज्ञान के प्रोफेसर मैथियास वुइले के अनुसार, पर्वतीय आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
इसके लिए मजबूत चेतावनी प्रणालियों, प्रभावी निकासी योजनाओं और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की तैयारी जरूरी है। यूरोप के पर्वतीय क्षेत्रों के अनुभव भी दिखाते हैं कि आधुनिक निगरानी और चेतावनी तंत्र कई बार बड़े भूस्खलन या ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के बावजूद जनहानि को काफी कम कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने हिमालय में भविष्य के बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर भी सावधानी बरतने की आवश्यकता जताई है।
पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र बेहद संवेदनशील है और सड़क, पुल, जलविद्युत परियोजना तथा पर्यटन ढांचे के निर्माण में भौगोलिक एवं जलवायु जोखिमों को प्राथमिकता से ध्यान में रखना होगा। पर्यावरण विशेषज्ञ राजीव घिमिरे का कहना है कि हिमालय में विकास कार्यों की योजना बनाते समय संभावित जलवायु जोखिमों का अनुमान लगाना जरूरी है। उनका मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में भविष्य की परियोजनाओं को केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं, बल्कि भूस्खलन, बाढ़, ग्लेशियरों के पीछे हटने और बदलते मौसम के जोखिमों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए।
नेपाल की स्थिति जलवायु न्याय के सवाल को भी सामने लाती है। नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन इसके बावजूद देश दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देशों में शामिल है। हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में तेज गति से गर्म हो रहा है। तापमान में वृद्धि का असर ग्लेशियरों, बर्फ की स्थिरता और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर पड़ रहा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से कुछ पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियर केवल पानी के भंडार नहीं हैं, बल्कि वे कई स्थानों पर पर्वतीय भू-दृश्य को स्थिर रखने में भी भूमिका निभाते हैं। जब ग्लेशियर तेजी से पीछे हटते हैं, तो चट्टानी ढलानों और आसपास की भूमि की स्थिरता में बदलाव आ सकता है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। नेपाल में आई यह त्रासदी केवल एक देश की आपदा नहीं है। यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है। भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान सहित हिमालय से जुड़े देशों में लाखों लोग पर्वतीय नदियों, ग्लेशियरों और ढलानों से जुड़े जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव, ग्लेशियरों के पिघलने तथा चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती संभावना भविष्य में इन क्षेत्रों के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। नेपाल सरकार की ओर से वैश्विक समुदाय से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयास की अपील इसी व्यापक चिंता को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्सर्जन में कमी लाने के साथ-साथ पर्वतीय देशों को अनुकूलन, प्रारंभिक चेतावनी, सुरक्षित निर्माण और स्थानीय आपदा-प्रबंधन क्षमता में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।
हालिया बाढ़ ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—हिमालय में जलवायु परिवर्तन का खतरा केवल भविष्य की चिंता नहीं है। बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच पर्वतीय समुदायों की सुरक्षा के लिए आज ही वैज्ञानिक तैयारी, बेहतर नियोजन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना होगा।
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