जियोस्पेशियल रिस्क एनालिटिक्स फर्म AlphaGeo के वैश्विक आकलन के अनुसार, अहमदाबाद, कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई को दुनिया के सबसे कम जलवायु-लचीले महानगरों में शामिल किया गया है। अहमदाबाद का अवशिष्ट जोखिम स्कोर 41 रहा, जिससे वह दुनिया के सबसे अधिक जोखिम वाले शहरों में है, जहाँ अत्यधिक गर्मी और सीमित अनुकूलन क्षमता प्रमुख चुनौतियां हैं। इसके अलावा कोलकाता दुनिया के छह सबसे कम लचीلي शहरों में शामिल है, जबकि बेंगलुरु 12वें और चेन्नई 15वें स्थान पर रहे। रिपोर्ट में बताया गया है कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’, हरित क्षेत्रों की कमी और अपर्याप्त जल निकासी के कारण इन शहरों पर जलवायु संकट का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच भारत के चार प्रमुख शहरों को दुनिया के सबसे कम जलवायु-लचीले महानगरों में शामिल किया गया है। जियोस्पेशियल रिस्क एनालिटिक्स फर्म AlphaGeo के हालिया वैश्विक आकलन में अहमदाबाद को सबसे अधिक जोखिम वाले शहरों में रखा गया है, जबकि कोलकाता, बेंगलुरु और चेन्नई भी कम जलवायु-लचीले शहरों की सूची में शामिल हैं।
AlphaGeo ने दुनिया के 72 बड़े शहरों का मूल्यांकन करते हुए बाढ़, तटीय और आंतरिक जलभराव, अत्यधिक गर्मी, सूखा, जंगल की आग और तेज हवाओं जैसे खतरों के साथ-साथ शहरों में उपलब्ध अनुकूलन उपायों का भी आकलन किया। इसमें बुनियादी ढांचे, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और प्रशासनिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए बचा हुआ जलवायु जोखिम यानी Residual Risk निर्धारित किया गया। आकलन के अनुसार अहमदाबाद का अवशिष्ट जोखिम स्कोर करीब 41 रहा, जिससे यह दुनिया के सबसे अधिक जोखिम वाले महानगरों में शामिल हो गया। शहर के सामने अत्यधिक गर्मी, मानसूनी बारिश से होने वाली बाढ़ और तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र के मुकाबले सीमित अनुकूलन क्षमता प्रमुख चुनौतियां हैं। कोलकाता करीब 35 के स्कोर के साथ दुनिया के छह सबसे कम लचीले बड़े शहरों में शामिल रहा।
बेंगलुरु लगभग 12वें और चेन्नई करीब 15वें स्थान पर रहे। दिल्ली और मुंबई की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर रही, लेकिन दोनों महानगर भी गर्मी, जलभराव और अन्य जलवायु जोखिमों से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट में दक्षिण एशियाई शहरों का निचली रैंकिंग में विशेष रूप से अधिक प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। सबसे अधिक जोखिम वाले प्रमुख शहरों में से छह दक्षिण एशिया में हैं, जिनमें भारत और पाकिस्तान के कई शहर शामिल हैं।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच जलवायु जोखिमों की तीव्रता बढ़ना और उसके अनुरूप अनुकूलन उपायों का विकसित न हो पाना इस स्थिति का एक प्रमुख कारण माना गया है। घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट तापमान को आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में और अधिक बढ़ा देता है।
हरित क्षेत्रों की कमी के कारण दिन और रात दोनों समय गर्मी का असर बढ़ सकता है। इससे स्वास्थ्य संबंधी खतरे बढ़ने के साथ एयर कंडीशनिंग की मांग, बिजली की खपत और जल संसाधनों पर दबाव भी बढ़ता है। दूसरी ओर, तीव्र मानसूनी बारिश और अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था कई शहरों में अचानक बाढ़ और जलभराव की स्थिति पैदा करती है। निचले इलाकों तथा तेजी से विकसित हो रहे शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है।
गर्मी और बाढ़ का यह संयुक्त दबाव कमजोर और कम आय वाले समुदायों को disproportionately प्रभावित करता है तथा नगर निकायों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। आकलन ने संकेत दिया है कि कुछ अनुकूलन उपाय मौजूद होने के बावजूद कई शहरों में अवशिष्ट जलवायु जोखिम अभी भी काफी ऊंचा है। इसका कारण यह है कि जलवायु परिवर्तन के साथ मूलभूत खतरे लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों ने हीट-रेजिलिएंट अर्बन डिजाइन, अधिक हरित और जल-आधारित बुनियादी ढांचे, बेहतर स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज, प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाली आबादी के लिए लक्षित सुरक्षा उपायों में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
रिपोर्ट में शिकागो को जलवायु लचीलेपन की रैंकिंग में शीर्ष शहर बताया गया है। बाढ़ नियंत्रण और अनुकूलन आधारित शहरी नियोजन में किए गए निवेश से यह संकेत मिलता है कि प्रभावी नीतियों और बुनियादी ढांचे के माध्यम से अवशिष्ट जलवायु जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। भारत के शहरों का तेजी से विस्तार जारी है। ऐसे में यह आकलन स्पष्ट चेतावनी देता है कि यदि शहरी जलवायु अनुकूलन की गति नहीं बढ़ाई गई, तो अत्यधिक गर्मी, अचानक बाढ़ और जलवायु संबंधी अन्य घटनाओं से होने वाली मानवीय और आर्थिक क्षति आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है।
Also Read: वायरल 1980s फोटो ट्रेंड ने बढ़ाई AI के पर्यावरणीय असर पर चिंता

