समुद्र के बढ़ते जलस्तर और कटाव से जूझ रहे मालदीव में वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सैटेलाइट इमेजरी की मदद से कटावग्रस्त समुद्र तटों को फिर से विकसित करने की पहल कर रहे हैं। इसे MIT की सेल्फ-असेंबली लैब, इनवेना और कोस्टल असेंबली द्वारा विकसित किया गया है। इसमें समुद्र के भीतर विशेष संरचनाएं (जैसे जियोटेक्सटाइल ब्लैडर और कंक्रीट मॉड्यूल) स्थापित की जाती हैं, जो प्राकृतिक धाराओं की मदद से रेत जमा करती हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटीय कटाव से जूझ रहे मालदीव में वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सैटेलाइट इमेजरी की मदद से कटावग्रस्त समुद्र तटों को फिर से विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।
यह तकनीक पारंपरिक तटीय इंजीनियरिंग उपायों की तुलना में कम हस्तक्षेप वाला विकल्प उपलब्ध करा सकती है। यह पहल मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की सेल्फ-असेंबली लैब, प्रोफेसर स्काइलर टिबिट्स के नेतृत्व में, मालदीव की क्लाइमेट टेक्नोलॉजी कंपनी इनवेना और उसकी स्पिन-आउट कंपनी कोस्टल असेंबली के सहयोग से विकसित की जा रही है।
इस तकनीक में समुद्र के भीतर विशेष संरचनाएं स्थापित की जाती हैं, जो प्राकृतिक समुद्री धाराओं और लहरों की दिशा के साथ काम करते हुए निर्धारित स्थानों पर रेत जमा होने में मदद करती हैं। एआई प्रणाली वर्षों की सैटेलाइट तस्वीरों के साथ समुद्री धाराओं, ज्वार और तलछट की आवाजाही का विश्लेषण करती है।
इसके आधार पर यह पता लगाया जाता है कि किन क्षेत्रों में कटाव अधिक है और पानी के भीतर संरचनाएं कहां स्थापित करने से रेत के जमाव को बढ़ावा मिल सकता है। इन संरचनाओं में जियोटेक्सटाइल ब्लैडर और रेत तथा कुचले हुए सीपों से बने हेक्सागोनल समुद्री-कंक्रीट मॉड्यूल शामिल हैं। पानी के भीतर लगाए जाने के बाद ये संरचनाएं लहरों की ऊर्जा को कम करती हैं और स्थानीय जल प्रवाह को प्रभावित करती हैं, जिससे समुद्री धाराएं धीरे-धीरे तलछट को जमा करती हैं और समुद्र तट तथा सैंडबार का विस्तार होने लगता है।
काफू एटोल और माले के आसपास के लैगून क्षेत्रों में किए गए परीक्षणों में उल्लेखनीय परिणाम सामने आए हैं। एक पायलट परियोजना में करीब 91 मीटर लंबे तटीय हिस्से पर रेतीला किनारा लगभग 27 मीटर तक आगे बढ़ा। एक अन्य परियोजना में छह महीने के भीतर 849 घन मीटर से अधिक रेत जमा हुई और एक नया सैंडबार विकसित हुआ।
इन संरचनाओं पर कोरल का विकास भी देखा गया है और कई समुद्री जीव इनके आसपास आकर्षित हुए हैं। इससे कुछ परियोजनाएं कृत्रिम रीफ की तरह भी काम करने लगी हैं। टिबिट्स के अनुसार, इस तकनीक के जरिए अलग-अलग समुदायों की तटीय परिस्थितियों के अनुरूप हस्तक्षेप तैयार किया जा सकता है। इसके लिए यह विश्लेषण किया जाता है कि अतीत में किसी क्षेत्र की तटरेखा में किस तरह बदलाव आया और भविष्य में उसके अनुरूप क्या उपाय किए जा सकते हैं। करीब 1,200 द्वीपों से बना मालदीव समुद्र तल से औसतन लगभग 1.5 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसलिए समुद्र के बढ़ते जलस्तर तथा तटीय कटाव के प्रति बेहद संवेदनशील है।
पारंपरिक उपायों, जैसे ड्रेजिंग और कठोर समुद्री दीवारों पर भारी खर्च हो सकता है और इनके पर्यावरणीय प्रभाव भी पड़ सकते हैं। इसके विपरीत, एआई आधारित यह तरीका प्राकृतिक समुद्री प्रक्रियाओं का उपयोग करते हुए कमजोर तटरेखाओं को फिर से विकसित करने पर केंद्रित है। इसके प्रयोग 2019 में शुरू हुए थे और 2024 तथा 2025 के दौरान बड़े आकार की संरचनाओं का परीक्षण किया गया।
शोधकर्ता अब पूर्वानुमान मॉडल को बेहतर बनाने और इन संरचनाओं के पारिस्थितिक प्रभावों की निगरानी पर काम कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि तकनीक अभी विकास के चरण में है और तेजी से बढ़ते वैश्विक समुद्री जलस्तर की समस्या का अकेले समाधान नहीं कर सकती।
हालांकि, मालदीव में मिले शुरुआती परिणाम एआई, सैटेलाइट निगरानी और प्रकृति-आधारित इंजीनियरिंग को एक साथ इस्तेमाल कर संवेदनशील तटरेखाओं को मजबूत करने की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।
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