हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और लगातार तेज होती गर्मी के बीच हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण अपने पूर्वजों की पारंपरिक काठ-कुणी (Kath-Kuni) वास्तुकला की ओर लौट रहे हैं। यह सदियों पुरानी शैली बिना किसी आधुनिक कूलिंग सिस्टम के घरों के भीतर का तापमान प्राकृतिक रूप से नियंत्रित रखती है। इसमें स्थानीय देवदार की लकड़ी और पत्थरों की क्षैतिज परतों को एक-दूसरे में फंसाकर दीवारें बनाई जाती हैं, जिसमें सीमेंट या कीलों का इस्तेमाल नहीं होता।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और लगातार तेज होती गर्मी के बीच हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण अपने पूर्वजों की पारंपरिक काठ-कुणी वास्तुकला की ओर लौट रहे हैं।
सदियों पुरानी यह निर्माण शैली बिना आधुनिक कूलिंग सिस्टम के घरों के भीतर तापमान को नियंत्रित रखने में मदद करती है। काठ-कुणी में स्थानीय देवदार की लकड़ी और पत्थरों की क्षैतिज परतों को एक-दूसरे में फंसाकर दीवारें बनाई जाती हैं।
इनमें आमतौर पर सीमेंट, गारे या कीलों का इस्तेमाल नहीं होता। दोहरी मोटी दीवारों के बीच बने खाली स्थान, लकड़ी की पट्टियां और स्लेट की छत मिलकर प्राकृतिक तापरोधक का काम करते हैं। इससे घर गर्मियों में अपेक्षाकृत ठंडे और सर्दियों में गर्म रहते हैं। कुल्लू में अपने पुश्तैनी घर का पुनर्निर्माण करा रहीं आशा ठाकुर का कहना है कि परिवार ने लकड़ी का घर इसलिए चुना क्योंकि यह मौसम के अनुसार अंदर का तापमान संतुलित रखता है।
इस पारंपरिक तकनीक में करीब 25 वर्षों का अनुभव रखने वाले कारीगर भगत राम के अनुसार, काठ-कुणी के घर में गर्मी के दिनों में पेड़ की छांव जैसी ठंडक महसूस होती है।
आईआईटी मंडी के प्रोफेसर थंश्विमोंग चौधरी काठ-कुणी संरचनाओं में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों और उनके ताप संचरण का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार, दीवारों के भीतर छोटे पत्थरों से भरे हवा के स्थान तापरोधक का काम करते हैं और पूरी संरचना गर्मी को प्रभावी ढंग से बाहर निकालने में मदद करती है। काठ-कुणी वास्तुकला का एक महत्वपूर्ण गुण इसकी भूकंपरोधी क्षमता भी है। लकड़ी और पत्थर का लचीला, इंटरलॉकिंग ढांचा भूकंपीय झटकों को सहन करने में मदद करता है।
हिमालय के भूकंप संभावित क्षेत्रों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कई पारंपरिक काठ-कुणी इमारतें सदियों से खड़ी हैं। हालांकि, आधुनिक कंक्रीट और ईंट के निर्माण के बढ़ते चलन, कुशल कारीगरों की कमी और देवदार की लकड़ी की सीमित उपलब्धता ने इस परंपरा को लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया था।
अब जलवायु परिवर्तन, टिकाऊ निर्माण और कम ऊर्जा खपत वाले घरों में बढ़ती रुचि से इसे नया जीवन मिल रहा है। हिमाचल के वास्तुकार राहुल भूषण के नेतृत्व में NORTH जैसी पहलें पुराने भवनों के संरक्षण, नए कारीगरों के प्रशिक्षण और काठ-कुणी तकनीक को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप ढालने पर काम कर रही हैं। होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन से जुड़े लोग भी इस शैली को तेजी से अपना रहे हैं।
हिमालय के गर्म होते मौसम में सदियों पुरानी काठ-कुणी तकनीक अब केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं रह गई है। यह कम ऊर्जा में घरों को आरामदायक रखने वाली एक पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण पद्धति के रूप में फिर प्रासंगिक होती दिखाई दे रही है।
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