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Reading: मानसून ने मचाई तबाही: असम से यूपी तक बाढ़ का कहर
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मानसून ने मचाई तबाही: असम से यूपी तक बाढ़ का कहर

Environment Pulse
Last updated: August 20, 2026 9:05 pm
Environment Pulse
Published: August 20, 2026
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मानसून 2026 के अंतिम दौर में भी असम, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में मूसलाधार बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से भारी तबाही हुई है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क।  भारत में मानसून अगस्त के मध्य से अंतिम दौर में पहुंचते हुए भी बाढ़ और बारिश से राहत नहीं दे रहा है। देश के कई राज्यों में नदियों के उफान, मूसलाधार बारिश, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। असम, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में हजारों गांव जलमग्न हुए हैं, बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है और फसलों तथा बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है। कई इलाकों में पानी घटने लगा है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में नए सिरे से बाढ़ का खतरा बना हुआ है।

असम इस मानसून में सबसे गंभीर रूप से प्रभावित राज्यों में रहा है। अगस्त के मध्य तक राज्य में बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं में मृतकों की संख्या 105 तक पहुंच गई थी। 25 जिलों और हजारों गांवों में अलग-अलग समय पर 12 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए। अगस्त के अंतिम सप्ताह में भी हजारों लोग बाढ़ की चपेट में रहे और बड़ी संख्या में लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी।

बाढ़ ने खेतों, पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया है। पहाड़ी इलाकों से आए मलबे और गाद ने कई स्थानों पर तबाही को और बढ़ा दिया। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में जलस्तर बढ़ने से निचले इलाकों में स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण बनी रही। ओडिशा में अगस्त के दौरान बाढ़ की दूसरी बड़ी लहर ने उत्तरी जिलों को प्रभावित किया। बालासोर, भद्रक, जाजपुर, मयूरभंज, क्योंझर और केंद्रापड़ा सहित कई जिलों में लाखों लोग प्रभावित हुए। बड़ी संख्या में लोगों को निकालकर राहत शिविरों में पहुंचाया गया।

धान सहित हजारों हेक्टेयर फसलें पानी में डूब गईं, जबकि सड़क, पुल, बिजली और पेयजल जैसी जरूरी सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचा। पशुधन और पोल्ट्री को भी भारी क्षति हुई। राज्य सरकार ने प्रभावित लोगों की सहायता के लिए 1,000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की है। उत्तर प्रदेश में भी गंगा, यमुना, घाघरा और शारदा जैसी नदियों के जलस्तर ने चिंता बढ़ाई। राज्य के 13 जिलों के 173 गांव बाढ़ से प्रभावित बताए गए, जिससे करीब 84 हजार लोग और 13 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि प्रभावित हुई। कई स्थानों से लोगों को सुरक्षित निकाला गया। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें, सैकड़ों नावें और एक हजार से अधिक राहत शिविर राहत एवं बचाव कार्यों में लगाए गए हैं। राज्य में स्थिति फिलहाल नियंत्रण में बताई जा रही है, लेकिन प्रशासन नदियों के जलस्तर और संवेदनशील इलाकों पर लगातार निगरानी रख रहा है।

पश्चिम बंगाल में भी बाढ़ से जुड़ी मौतों का आंकड़ा करीब 100 तक पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। राज्य के कई ब्लॉक, नगर निकाय क्षेत्र और हजारों गांव बाढ़ की चपेट में आए। बड़े कृषि क्षेत्रों में पानी भरने से किसानों को भारी नुकसान हुआ और कई इलाकों में राहत शिविरों में बड़ी संख्या में लोगों को ठहराना पड़ा। कुछ स्थानों पर तटबंध टूटने से हालात और बिगड़े, हालांकि कई क्षेत्रों में पानी धीरे-धीरे कम भी होने लगा है।

गुजरात, केरल, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में भी मानसून के दौरान अचानक आई बाढ़, भूस्खलन और शहरी जलभराव ने परेशानी बढ़ाई। कई स्थानों पर लोगों को सुरक्षित निकाला गया और जान-माल का नुकसान हुआ। केंद्र सरकार ने मानसून के दौरान कई राज्यों को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत 2,100 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता भी जारी की है। इस साल की बाढ़ की गंभीरता केवल भारी बारिश तक सीमित नहीं है। ब्रह्मपुत्र और गंगा जैसी बड़ी नदी प्रणालियों में जलस्तर बढ़ने के साथ कई इलाकों में कम समय में अत्यधिक बारिश हुई है।

असम में पहाड़ी क्षेत्रों, खासकर नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से आने वाले तेज बहाव ने सहायक नदियों में अचानक पानी बढ़ाया। कई जगह तटबंधों के टूटने, नदियों में गाद जमा होने और लगातार सक्रिय मौसम प्रणालियों ने बाढ़ की अवधि को लंबा किया है। कुछ क्षेत्रों में बांधों से पानी छोड़े जाने का असर भी जलस्तर पर पड़ा। मानवीय गतिविधियों ने भी बाढ़ के प्रभाव को बढ़ाया है। वनों की कटाई, खनन और पत्थर खनन, आर्द्रभूमियों का नुकसान, अनियोजित शहरीकरण, बाढ़ के मैदानों में अतिक्रमण और पुराने या कमजोर तटबंधों ने पानी के प्राकृतिक बहाव और जल अवशोषण की क्षमता को प्रभावित किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार, हर घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना उचित नहीं है, लेकिन गर्म होती जलवायु के बीच कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में बदलाव व्यापक बाढ़ जोखिम को बढ़ा सकता है। बाढ़ का असर केवल तत्काल जनहानि और विस्थापन तक सीमित नहीं रहेगा। खेतों में जमा गाद, नष्ट फसलें, क्षतिग्रस्त सड़कें और पुल, बिजली तथा जलापूर्ति व्यवस्था को नुकसान ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर लंबे समय तक असर डाल सकता है। दूषित पानी से जलजनित बीमारियों और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

केंद्रीय जल आयोग, मौसम विभाग और राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियां चौबीसों घंटे स्थिति पर नजर रख रही हैं। राहत और बचाव अभियान जारी हैं, लेकिन मानसून के आगे बढ़ने के साथ स्थिति लगातार बदल रही है।

इस संकट ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि भारत को केवल आपदा आने के बाद राहत देने की व्यवस्था से आगे बढ़कर बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, मजबूत तटबंध, बेहतर जल निकासी, नदी और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन तथा संवेदनशील इलाकों में अनियोजित निर्माण पर नियंत्रण जैसी दीर्घकालिक रणनीतियों पर जोर देना होगा। 2026 की बाढ़ ने यह संकेत दे दिया है कि बदलते मौसम और बढ़ते मानवीय दबाव के बीच बाढ़ का जोखिम अब केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि देश की आपदा-प्रबंधन क्षमता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।

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