भारत की दीर्घकालिक घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सौर और पवन ऊर्जा के तेज एकीकरण को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। भारत में गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की स्थापित बिजली क्षमता आधे से अधिक हो चुकी है। सरकार द्वारा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए पीएलआई (PLI) जैसी योजनाएं और प्रतिस्पर्धी नीतियां लागू की गई हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: हालिया उद्योग नीति समीक्षाओं और ऊर्जा क्षेत्र के विश्लेषणों में भारत की दीर्घकालिक घरेलू ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए सौर और पवन ऊर्जा के तेज एकीकरण को महत्वपूर्ण आधार बताया गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने और आयात पर निर्भरता घटाने में अहम भूमिका निभा सकता है। सरकारी एजेंसियों, थिंक टैंक और ऊर्जा विश्लेषकों के आकलन के मुताबिक आर्थिक विकास, शहरीकरण, परिवहन के विद्युतीकरण और उद्योगों में बढ़ती बिजली जरूरतों के बीच सौर फोटोवोल्टिक और पवन ऊर्जा की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है।
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है। गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों की स्थापित बिजली क्षमता में हिस्सेदारी आधे से अधिक हो चुकी है। पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा क्षमता में तेज वृद्धि हुई है, जबकि पवन ऊर्जा को भी नवीकरणीय खरीद दायित्वों, हाइब्रिड परियोजनाओं और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली नीतियों से समर्थन मिला है।
सरकार ने सौर मॉड्यूल और सेल सहित नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी व्यवस्थाएं तथा प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया से जुड़े दिशानिर्देश लागू किए हैं। इनका उद्देश्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ आपूर्ति श्रृंखला को अधिक आत्मनिर्भर बनाना है।
हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा के तेजी से विस्तार के साथ ट्रांसमिशन क्षमता से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। कुछ क्षेत्रों में ग्रिड अवसंरचना की क्षमता बड़े सौर और पवन संयंत्रों से होने वाले उत्पादन की तुलना में पीछे रह गई है। इसके कारण कुछ स्थानों पर बिजली की निकासी सीमित होने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में कटौती की स्थिति बन रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार उत्पादन क्षमता, ट्रांसमिशन नेटवर्क और ऊर्जा भंडारण की संयुक्त योजना बनाना जरूरी है। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) और पंप्ड-हाइड्रो स्टोरेज जैसे विकल्प सौर और पवन ऊर्जा की अनियमित उपलब्धता को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं। सौर, पवन और स्टोरेज को एक साथ जोड़ने वाली हाइब्रिड परियोजनाओं को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि मांग के अनुरूप अपेक्षाकृत स्थिर और उपलब्ध बिजली की आपूर्ति की जा सके।
उद्योग जगत के अनुसार सौर मॉड्यूल, सेल, पवन टर्बाइन और बैटरियों के घरेलू विनिर्माण में लगातार निवेश ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत कर सकता है। साथ ही मौजूदा ताप विद्युत संयंत्रों का लचीला संचालन, मांग प्रबंधन और बिजली बाजार में सुधार भी नवीकरणीय ऊर्जा की अधिक हिस्सेदारी के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
विश्लेषकों के मुताबिक कोयला निकट और मध्यम अवधि में बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता बनाए रखने में भूमिका निभाता रहेगा, लेकिन दीर्घकालिक ऊर्जा व्यवस्था में सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण की भूमिका लगातार बढ़ने की संभावना है।
नीति में निरंतरता और परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन से भारत अपनी नवीकरणीय क्षमता को अधिक सुरक्षित और कम-उत्सर्जन वाली ऊर्जा व्यवस्था में बदल सकता है।
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