नागरिक संगठनों और पर्यावरण समूहों ने अरावली पर्वतमाला के संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरणीय मूल्यांकन और उससे जुड़ी प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करने को लेकर चिंता जताई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क: नागरिक संगठनों और पर्यावरण समूहों ने अरावली पर्वतमाला के संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरणीय आकलन और उससे जुड़े मूल्यांकन की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरा करने को लेकर चिंता जताई है।
संगठनों का कहना है कि इतने व्यापक और जटिल पारिस्थितिक तंत्र का वैज्ञानिक मूल्यांकन पर्याप्त क्षेत्रीय अध्ययन, विशेषज्ञ समीक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना पूरा नहीं किया जाना चाहिए।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) के काम से जुड़ा है। समिति अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा, सीमा, पारिस्थितिक स्थिति तथा संरक्षण से जुड़े पहलुओं की समीक्षा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने समिति की छह महीने की अतिरिक्त समय मांग को स्वीकार नहीं किया और उसे 30 नवंबर 2026 तक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अरावली को केवल किसी एक ऊंचाई या भौगोलिक मानक से परिभाषित करना वैज्ञानिक रूप से पर्याप्त नहीं होगा।
उसने ‘अरावली इकोसिस्टम लैंडस्केप’ की अवधारणा पर काम करने की बात कही है, जिसमें जंगल, जल प्रणालियां, जैवविविधता, भूजल रिचार्ज क्षेत्र, वन्यजीव गलियारे, पारंपरिक चरागाह, आर्द्रभूमि और आजीविका से जुड़े क्षेत्र शामिल किए जा सकते हैं।
पर्यावरण समूहों का कहना है कि अरावली दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात सहित बड़े भूभाग में फैली एक परस्पर जुड़ी पारिस्थितिक प्रणाली है। उनके अनुसार केवल शहरी केंद्रों में सीमित बैठकें और क्षेत्रीय दौरे पर्याप्त नहीं हैं।
खनन प्रभावित गांवों, आदिवासी समुदायों, किसानों और पशुपालकों सहित प्रभावित लोगों से व्यापक स्तर पर प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता है। अगस्त में विभिन्न नागरिक समूहों, विशेषज्ञों और राजस्थान के जनप्रतिनिधियों ने भी समिति से अधिक समय और व्यापक परामर्श की मांग की थी। पर्यावरणविद् प्रदीप कृष्ण ने सभी संबंधित अरावली जिलों में स्वतंत्र और संचयी पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभाव अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया था।
अरावली क्षेत्र में खनन, पत्थर खनन और क्रशिंग, अनियंत्रित रेत खनन, शहरी विस्तार और कचरा निस्तारण जैसे मुद्दों को लेकर भी चिंताएं उठती रही हैं। नागरिक संगठनों का कहना है कि इन गतिविधियों के संचयी प्रभावों का आकलन किए बिना संरक्षण की सीमाओं या अनुमत गतिविधियों पर अंतिम निर्णय नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दिसंबर 2025 में अरावली की पूर्व प्रस्तावित परिभाषा से जुड़े फैसले को रोकते हुए विशेषज्ञों के व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता पर जोर दिया था। अदालत ने कहा था कि इतने व्यापक प्रभाव वाले निर्णय विशेषज्ञ मूल्यांकन के बिना नहीं लिए जाने चाहिए।
अब समिति की आगामी रिपोर्ट अरावली की वैज्ञानिक परिभाषा और संरक्षण-प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है। नागरिक संगठन चाहते हैं कि अंतिम प्रक्रिया में वैज्ञानिक आंकड़ों के सत्यापन, विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन और प्रभावित समुदायों की भागीदारी को पर्याप्त स्थान मिले, ताकि अरावली के पारिस्थितिक, जलवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व को ध्यान में रखते हुए आगे की व्यवस्था तय की जा सके।
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