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Environment Pulse > ओपिनियन > स्टोरी > शोर में खो गई चहचहाहट: लखनऊ के बढ़ते शोर से पंछी पलायन को मजबूर
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शोर में खो गई चहचहाहट: लखनऊ के बढ़ते शोर से पंछी पलायन को मजबूर

Environment Pulse
Last updated: October 15, 2026 7:54 pm
Environment Pulse
Published: October 15, 2026
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लखनऊ में बढ़ता हुआ ध्वनि प्रदूषण (जो कई प्रमुख इलाकों में 78 से 92 डेसिबल तक पहुंच गया है) शहर के पक्षियों, विशेषकर गौरैया, मैना और तोते जैसी प्रजातियों के लिए गंभीर संकट बन गया है। अत्यधिक शोर के कारण पक्षियों का आपसी संचार टूट जाता है, प्रजनन में विफलता होती है और वे शहर छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं। विशेषज्ञ इसे एक पारिस्थितिक चेतावनी मान रहे हैं और इससे निपटने के लिए अनावश्यक हॉर्न न बजाने, लाउडस्पीकर की आवाज सीमित रखने और अधिक से अधिक देशी पेड़ लगाने की सलाह दे रहे हैं। 

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : गोमती नगर के 68 वर्षीय रमेश चंद्र हर सुबह गौरैया की चहचहाहट से उठते थे। आज वो हॉर्न की आवाज से उठते हैं। वो कहते हैं, “गौरैया चली गई, बस हॉर्न रह गया है।”ये सिर्फ एक बुजुर्ग की याद नहीं, बल्कि एक पारिस्थितिक चेतावनी है।

लखनऊ का बढ़ता ध्वनि प्रदूषण अब शहर के पक्षियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ताजा आंकड़ों के अनुसार, हजरतगंज, चारबाग और आलमबाग में पीक आवर्स में शोर का स्तर 78 से 92 डेसिबल तक पहुंच गया है, जबकि आवासीय क्षेत्रों में अनुमत सीमा सिर्फ 55 डेसिबल है।

इंसानों के लिए ये सिर्फ चिड़चिड़ापन है, लेकिन पंछियों के लिए ये जीवन-मरण का सवाल है।शोर कैसे मारता है, धीरे-धीरेपंछी अपने हर काम के लिए आवाज पर निर्भर होते हैं – साथी को ढूंढने के लिए, खतरे की चेतावनी देने के लिए, अपने बच्चों को खाना खिलाने के लिए।लखनऊ विश्वविद्यालय के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. अनिल कुमार बताते हैं, “एक गौरैया की आवाज 40 से 50 डेसिबल की होती है। जब ट्रैफिक का शोर 85 डेसिबल है, तो उसकी आवाज पूरी तरह दब जाती है।

वो बात नहीं कर पाते। नतीजा है – असफल प्रजनन, छोड़े हुए घोंसले और दिशाहीनता।”बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के 2025 के अध्ययन में तीन मेट्रो शहरों में पाया गया कि अधिक शोर वाले क्षेत्रों में पक्षियों के घोंसले बनाने की सफलता 38% तक घट गई और पांच सालों में गौरैया की आबादी 42% कम हो गई।

लखनऊ में इसका असर कुकरैल, नवाबगंज पक्षी विहार और रिहायशी कॉलोनियों में साफ दिख रहा है। गौरैया, मैना, तोता और रॉबिन जैसी आम प्रजातियां अब मध्य लखनऊ में शायद ही दिखती हैं।तीन बड़े असर:संचार टूटना: नर पंछी सुनाई देने के लिए और तेज और ऊंची आवाज में गाते हैं, जिसमें बहुत ऊर्जा खर्च होती है और वो शिकारियों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं।

प्रजनन में विफलता: मादा पंछी नर की पुकार नहीं सुन पातीं, जिससे प्रजनन में देरी या विफलता होती है। कई तो तनाव के कारण अंडे छोड़कर चली जाती हैं।जबरन पलायन: पंछी शांत बाहरी इलाकों में जा रहे हैं, जिससे बचे हुए हरे-भरे इलाकों में भीड़ और खाने की कमी हो रही है।सिर्फ ट्रैफिक नहीं है जिम्मेदार जहां वाहनों का हॉर्न शहरी शोर का 60% हिस्सा है, वहीं अन्य कारणों में त्योहारों पर लाउडस्पीकर, शादी समारोह, निर्माण कार्य और खुले में बजने वाले डीजे सिस्टम शामिल हैं।पिछले साल दिवाली पर लखनऊ में कई जगह शोर का स्तर 110 डेसिबल को पार कर गया था।

रेस्क्यू सेंटरों ने बताया कि दर्जनों पक्षी सदमे और दिशाहीनता के कारण घायल हो गए थे।क्या किया जा सकता है?प्रशासन ने स्कूलों और अस्पतालों के आसपास ‘नो हॉन्किंग जोन’ बनाए हैं, लेकिन सख्ती कम है।विशेषज्ञ नागरिक स्तर पर कुछ आसान उपाय सुझाते हैं:अनावश्यक हॉर्न बजाने से बचें, खासकर पार्कों और पेड़ों के पासलाउडस्पीकर की आवाज तय सीमा में रखें, खासकर सुबह-शाम जब पंछी सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैंनीम, पीपल और बरगद जैसे घने देशी पेड़ लगाएं जो प्राकृतिक साउंड बैरियर का काम करते हैंबालकनी में छोटे बगीचे और पानी के बर्तन रखें ताकि पंछियों को सुरक्षित जगह मिलेडॉ. कुमार कहते हैं, “समाधान शहर को खामोश करना नहीं, बल्कि आवाज को कम करना है। अगर हम शोर को 65 डेसिबल से नीचे ला सकें, तो पंछी एक ही प्रजनन सीजन में वापस आ सकते हैं।

“जैसे-जैसे लखनऊ स्मार्ट सिटी बनने की ओर बढ़ रहा है, सवाल सिर्फ ये नहीं है कि हम कितनी तेजी से आगे बढ़ सकते हैं, बल्कि ये भी है कि क्या हमारी गौरैया की आवाज अभी भी सुनी जा सकती है।अगर हॉर्न बजना बंद नहीं हुआ, तो अगली पीढ़ी पंछियों को आंगन में नहीं, बल्कि सिर्फ मोबाइल की रिंगटोन में सुनेगी।

Also Read: AI डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या से पैदा होगा ई-कचरे का ‘सुनामी’ संकट

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