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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जल > एआई-आधारित पूर्वानुमान प्रणाली का बड़ा संकेत, फरवरी 2027 तक बना रह सकता है अल नीनो
(फोटो सौजन्य-एआई)
जलसस्टेनिबिलिटीस्टोरीहवा

एआई-आधारित पूर्वानुमान प्रणाली का बड़ा संकेत, फरवरी 2027 तक बना रह सकता है अल नीनो

Environment Pulse
Last updated: August 6, 2026 9:32 pm
Environment Pulse
Published: August 6, 2026
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(फोटो सौजन्य-एआई)
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इनकॉइस (INCOIS) की AI और मशीन लर्निंग आधारित प्रणाली व ग्लोबल ओसियन डेटा अध्ययन पर आधारित है अनुमान

Contents
AI और मशीन लर्निंग आधारित गहरा अध्ययनक्या देश में कमजोर होगा मानसून?इनकॉइस का हाई-रिज़ॉल्यूशन नेटवर्क और एडवांस अलर्ट

अल नीनो से समुद्री हीटवेव, तापमान वृद्धि, मछलियों के वितरण और तटीय कारोबार पर असर पड़ने की आशंका

एनवायरमेंट पल्स डेस्क

देश में इस साल बारिश की चर्चा के साथ-साथ अल नीनो (El Niño) को लेकर भी व्यापक बहस जारी है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने संसद में भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) की ताज़ा रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि मई 2026 में जो अल नीनो की स्थिति मजबूत हुई थी, वह अगले साल फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है।

AI और मशीन लर्निंग आधारित गहरा अध्ययन

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट किया कि यह कोई सामान्य अंदेशा नहीं है, बल्कि इसके बने रहने की संभावना 70 से 90 प्रतिशत तक है। यह अनुमान इनकॉइस की अत्याधुनिक AI और मशीन लर्निंग (Machine Learning) आधारित पूर्वानुमान व्यवस्था तथा ग्लोबल ओसियन डेटा पर आधारित गहरे शोध के बाद जारी किया गया है।

क्या देश में कमजोर होगा मानसून?

मानसून पर इसके प्रभाव को लेकर डॉ. सिंह ने बताया कि यूँ तो अल नीनो का सीधा संबंध कमजोर बारिश से माना जाता रहा है, लेकिन भारतीय मानसून की तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। भारतीय मानसून का मिज़ाज कई अन्य कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD) और मैडेन-जूलियन दोलन (Madden-Julian Oscillation – MJO) शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि अल नीनो के बने रहने की बात के बावजूद असली असर इस बात से तय होगा कि सीज़न के समय समुद्र और वायुमंडल के बीच कैसा तालमेल रहता है।

समुद्री हीटवेव और इकोसिस्टम के लिए चेतावनी

डॉ. सिंह ने चेताया है कि अल नीनो अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में वायुमंडलीय उथल-पुथल बढ़ा सकता है, जिससे तापमान में बढ़ोतरी होगी और समुद्री हीटवेव (Marine Heatwaves)  का खतरा बढ़ेगा।

समुद्र में पोषक तत्वों की उपलब्धता, जैव उत्पादकता और मछलियों के वितरण पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

पूरा तटीय इकोसिस्टम प्रभावित होगा, साथ ही लहरों और ज्वार-भाटे में बदलाव से जहाजरानी (Shipping) और तटीय व्यापार की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

इनकॉइस का हाई-रिज़ॉल्यूशन नेटवर्क और एडवांस अलर्ट

तूफानों, ऊंची लहरों, समुद्री जलप्रपात और तेज धाराओं की सटीक भविष्यवाणी के लिए इनकॉइस हाई-रिज़ॉल्यूशन मॉडल का इस्तेमाल कर रहा है। इसके लिए समुद्री ग्लाइडर, बॉय (Buoys), फ्लोट और सैटेलाइट का एक पूरा नेटवर्क तैयार किया गया है, जो डेटा असिमिलेशन सिस्टम के ज़रिये सटीक अनुमान प्रदान करता है।

तटीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु) को अब इनकॉइस द्वारा 10 दिनों तक की हवा, लहर, ज्वार, समुद्री धाराओं और तापमान की एडवांस सूचना मिलने लगी है। राज्य सरकारों के साथ मिलकर ज्वार-भाटा मापने के स्टेशन, कोस्टल बॉय और सुनामी अलर्ट प्रोग्राम तैयार किए जा रहे हैं ताकि किसी भी संकट की स्थिति में समय रहते तैयारी की जा सके।

Also Read: LG Sinha pushes for nature-based solutions as Himalayas battle climate crisis

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