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Environment Pulse > कचरा-प्रबंधन > AI डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या से पैदा होगा ई-कचरे का ‘सुनामी’ संकट
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कचरा-प्रबंधन

AI डेटा सेंटरों की बढ़ती संख्या से पैदा होगा ई-कचरे का ‘सुनामी’ संकट

Environment Pulse
Last updated: October 14, 2026 4:16 pm
Environment Pulse
Published: October 14, 2026
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटरों के तीव्र विस्तार से वैश्विक स्तर पर ई-कचरे का भारी संकट पैदा होने की आशंका है। पर्यावरण संगठन बेसल एक्शन नेटवर्क (BAN) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 से 2050 के बीच ई-कचरा 39.5 करोड़ से 61.7 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुँच सकता है, जिससे रीसाइक्लिंग व्यवस्था और पर्यावरण पर गंभीर दबाव बढ़ेगा।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल और डेटा सेंटरों के विस्तार से दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक कचरे का संकट गंभीर हो सकता है। पर्यावरण संगठन बेसल एक्शन नेटवर्क (BAN) की नई रिपोर्ट द कमिंग AI वेस्ट वेव के अनुसार, वर्ष 2025 से 2050 के बीच AI से जुड़े उपकरणों के इस्तेमाल के बाद निकलने वाला ई-कचरा 39.5 करोड़ से 61.7 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच सकता है।

इससे पहले से दबाव झेल रही वैश्विक रीसाइक्लिंग व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होने की आशंका है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मात्रा में कचरे को 40 फुट लंबे 1.5 करोड़ से 2.3 करोड़ मानक शिपिंग कंटेनरों में भरा जा सकता है। इन कंटेनरों को एक सीध में रखा जाए तो उनकी कुल लंबाई पृथ्वी की परिधि को लगभग छह बार घेरने के बराबर हो सकती है।

BAN के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 तक AI से संबंधित ई-कचरे की वार्षिक मात्रा 86 लाख से 1.31 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच सकती है। संगठन का आकलन है कि डेटा सेंटर की प्रत्येक एक गीगावाट क्षमता के पीछे लगभग 70,000 मीट्रिक टन अनुपयोगी हार्डवेयर उत्पन्न हो सकता है। कंसल्टिंग कंपनी मैकिन्से सहित विभिन्न विश्लेषकों के पूर्वानुमानों में दशक के अंत तक वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता 219 गीगावाट तक पहुंचने की संभावना जताई गई है।

AI मॉडल चलाने और प्रशिक्षित करने के लिए बढ़ती कंप्यूटिंग जरूरतें इस विस्तार को गति दे रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पहले के कुछ आकलनों में मुख्य रूप से सर्वर और ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) को ध्यान में रखा गया था, जबकि डेटा सेंटरों में इस्तेमाल होने वाले दूसरे उपकरण भी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा कर सकते हैं।

BAN के व्यापक आकलन में बिजली वितरण प्रणाली का हिस्सा लगभग 34 प्रतिशत, कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का 35 प्रतिशत, बैकअप बिजली व्यवस्था का 15 प्रतिशत, सर्वर और GPU का करीब 13 प्रतिशत तथा नेटवर्किंग उपकरणों का लगभग तीन प्रतिशत बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, तकनीक में तेजी से बदलाव के कारण इन उपकरणों में से कई को दो से पांच वर्षों के भीतर बदलना पड़ सकता है।

इससे उपकरणों के उपयोगी जीवनकाल और उनके वास्तविक पुनः उपयोग पर सवाल उठते हैं। BAN ने ‘AI वेस्ट कंटेजन’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा है कि AI से जुड़ी बढ़ती तकनीकी जरूरतें डेटा सेंटरों के बाहर भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के तेजी से पुराने पड़ने की प्रक्रिया को बढ़ा सकती हैं। इसमें कंप्यूटर, मोबाइल फोन और दूरसंचार उपकरण शामिल हैं।

यदि कंपनियां और उपभोक्ता कम समय में नए उपकरण अपनाने लगते हैं, तो ई-कचरे की कुल मात्रा और बढ़ सकती है। हालांकि, इस अतिरिक्त कचरे की वास्तविक मात्रा का आकलन करने के लिए अलग से विस्तृत आंकड़ों की जरूरत होगी।

इलेक्ट्रॉनिक कचरे में सीसा, पारा, कैडमियम और कुछ स्थायी रासायनिक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। दूसरी ओर, इसमें तांबा और अन्य मूल्यवान धातुएं भी मौजूद होती हैं, जिन्हें सुरक्षित तरीके से निकालना तकनीकी रूप से जटिल और महंगा हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में उत्पन्न होने वाले ई-कचरे का केवल लगभग पांचवां हिस्सा ही उचित तरीके से पुनर्चक्रित या प्रबंधित किया जाता है।

शेष कचरे का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक प्रसंस्करण व्यवस्था में पहुंच सकता है, जहां अपर्याप्त सुरक्षा उपायों के कारण श्रमिकों और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा पैदा होता है। बच्चों के लिए यह जोखिम विशेष रूप से गंभीर हो सकता है।

बेसल एक्शन नेटवर्क के संस्थापक जिम पकेट ने चेतावनी दी कि यदि सरकारों और कंपनियों ने अभी से योजना नहीं बनाई, तो AI के विस्तार से पैदा होने वाला कचरा मौजूदा प्रदूषण संकट को और गंभीर बना सकता है। रिपोर्ट में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने, मरम्मत के अधिकार को मजबूत करने, लंबे समय तक चलने वाले उपकरण तैयार करने और मॉड्यूलर तकनीक को बढ़ावा देने की सिफारिश की गई है।

साथ ही, औपचारिक रीसाइक्लिंग, उपकरणों के पुनः उपयोग और सुरक्षित कचरा प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे का विस्तार करने पर जोर दिया गया है। AI डेटा सेंटरों के निर्माण में वैश्विक स्तर पर भारी निवेश किया जा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों के अनुसार, केवल तकनीकी क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उपकरणों के निर्माण से लेकर उनके इस्तेमाल, मरम्मत और अंतिम निपटान तक पूरे जीवनचक्र की पर्यावरणीय लागत को ध्यान में रखना आवश्यक है।

समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो AI आधारित तकनीकी विकास के साथ ई-कचरे और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी तेजी से बढ़ सकती हैं।

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