संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के कारण महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को सोखने की क्षमता में लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है। COP31 जलवायु सम्मेलन से पहले जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि महासागर मानवजनित कार्बन उत्सर्जन का लगभग 30 प्रतिशत और अतिरिक्त ऊष्मा का 90 प्रतिशत हिस्सा अवशोषित करते हैं, लेकिन बढ़ते तापमान और समुद्री रसायन विज्ञान में बदलाव के चलते यह प्राकृतिक व्यवस्था दबाव में है। रिपोर्ट में दक्षिणी व हिंद महासागरों में निगरानी की कमी पर चिंता जताते हुए समुद्री निगरानी प्रणाली, मैंग्रोव और समुद्री घास जैसे ‘ब्लू कार्बन’ पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण तथा कार्बन हटाने की तकनीकों पर जोर दिया गया है। साथ ही, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) को वित्तीय सहायता देने और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को जलवायु नीतियों में शामिल करने की आवश्यकता बताई गई है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को सोखने और लंबे समय तक संग्रहित रखने की क्षमता कमजोर हो रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण महासागरों की कार्बन अवशोषण क्षमता में लगभग छह प्रतिशत की गिरावट आई है।
नवंबर में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन से पहले जारी इस रिपोर्ट ने वैश्विक तापमान वृद्धि से निपटने के प्रयासों के लिए चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सचिवालय (UNFCCC) के सहयोग से तैयार रिपोर्ट के मुताबिक, महासागर मानव गतिविधियों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का लगभग 30 प्रतिशत और ग्रीनहाउस गैसों के कारण धरती पर जमा अतिरिक्त ऊष्मा का करीब 90 प्रतिशत अवशोषित करते हैं।
हालांकि, बढ़ते तापमान और समुद्री रसायन विज्ञान, जल परिसंचरण तथा पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव के कारण यह प्राकृतिक व्यवस्था दबाव में है। इससे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में बनी रह सकती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज होने का खतरा बढ़ता है। रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका सारा ट्रेरप ने संयुक्त राष्ट्र समाचार से बातचीत में कहा कि महासागर लंबे समय से जलवायु संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन अब इस प्राकृतिक सेवा पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
उन्होंने चेतावनी दी कि निकट भविष्य में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महासागरों में कार्बन के अवशोषण और भंडारण की प्रक्रिया को समझने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। दक्षिणी और हिंद महासागर, आर्कटिक क्षेत्र तथा कई तटीय इलाकों में निगरानी की कमी एक बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों ने समुद्री कार्बन प्रणालियों को बेहतर ढंग से समझने और उनके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक, आंकड़ों तथा स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को एक साथ जोड़ने की जरूरत बताई है।
रिपोर्ट के अनुसार, महासागरों के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना उनके संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन और संरक्षण करना कठिन होगा। रिपोर्ट में महासागर आधारित जलवायु तकनीकों के तीन प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई है। इनमें समुद्री निगरानी प्रणाली, ब्लू कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र और समुद्र से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीकें शामिल हैं।
समुद्री निगरानी के तहत सेंसर, अवलोकन प्रणाली, आंकड़ों के विश्लेषण और कंप्यूटर आधारित मॉडलिंग का इस्तेमाल किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, ये तकनीकें अपेक्षाकृत विकसित हैं और समुद्री कार्बन चक्र को समझने के लिए तत्काल महत्वपूर्ण हैं। ब्लू कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र में मैंग्रोव वन, समुद्री घास के मैदान और ज्वारीय दलदल शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये पारिस्थितिकी तंत्र हर साल लगभग 40.7 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं। इनके संरक्षण और पुनर्स्थापन से कार्बन संग्रहण की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
ये प्राकृतिक क्षेत्र तटीय इलाकों को कटाव और अन्य समुद्री खतरों से बचाने, जैव विविधता को बनाए रखने तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका सुरक्षित करने में भी मदद करते हैं। तीसरी श्रेणी में समुद्र के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाकर लंबे समय तक संग्रहित करने वाली तकनीकें शामिल हैं। हालांकि, रिपोर्ट ने आगाह किया है कि इन तरीकों की प्रभावशीलता, पर्यावरणीय जोखिम और दीर्घकालिक परिणामों को लेकर अभी पर्याप्त स्पष्टता नहीं है।
इनके व्यापक इस्तेमाल से पहले अधिक शोध, निगरानी और नियमन की आवश्यकता है। ट्रेरप ने कहा कि महासागर आधारित तकनीकों को उत्सर्जन में कटौती का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। इनका इस्तेमाल ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने के पूरक के रूप में होना चाहिए।
रिपोर्ट में छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) की स्थिति पर भी विशेष चिंता जताई गई है। वैश्विक उत्सर्जन में एक प्रतिशत से भी कम योगदान देने वाले ये देश समुद्र के बढ़ते स्तर, तटीय कटाव और जलवायु परिवर्तन के अन्य प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों को समुद्री संरक्षण और जलवायु अनुकूलन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता, आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना जरूरी है।
सेशेल्स इसका एक उदाहरण है। वर्ष 2015 में देश ने ऋण पुनर्गठन के बदले समुद्री संरक्षण से जुड़ी प्रतिबद्धताओं वाली व्यवस्था अपनाई थी। इससे समुद्री संरक्षण, जलवायु अनुकूलन और टिकाऊ ब्लू इकोनॉमी के लिए वित्तपोषण करने वाला एक ट्रस्ट फंड स्थापित करने में मदद मिली। प्रशांत क्षेत्र में फिजी, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन द्वीप और वानुआतु में समुद्री घास के मैदानों तथा मैंग्रोव वनों का मानचित्रण करने और उनमें संग्रहित कार्बन का आकलन करने के प्रयास भी किए गए। इस पहल के तहत 100 से अधिक लोगों को ब्लू कार्बन आकलन का प्रशिक्षण दिया गया, जिससे संबंधित सरकारों को अपनी राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं के लिए उपयोगी आंकड़े मिले।
रिपोर्ट में स्थानीय और आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को जलवायु नीतियों में शामिल करने की आवश्यकता भी बताई गई है। इन समुदायों के पास तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा, मत्स्य संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन और प्राकृतिक आवासों के संरक्षण का लंबा अनुभव है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, वैज्ञानिक आंकड़ों और स्थानीय अनुभवों के समन्वय से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि महासागर अब असीमित मात्रा में कार्बन अवशोषित करने वाली व्यवस्था नहीं माने जा सकते। उनकी प्राकृतिक क्षमता को बनाए रखने के लिए उत्सर्जन में कटौती, समुद्री निगरानी को मजबूत करने और मैंग्रोव तथा समुद्री घास जैसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर एक साथ काम करना आवश्यक है।
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