जैसलमेर के ऊंटपालक सुमेर सिंह भाटी, जिन्होंने चरागाहों (ओरान) और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए 700 किमी लंबी पदयात्रा की। चरागाह संरक्षण और सामुदायिक संघर्ष के लिए वर्ष 2026 का ‘रेंजलैंड अवॉर्ड’ प्रदान किया गया। देगराई माता ओरान की 3,800 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराया और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के आवास की सुरक्षा सुनिश्चित की।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। राजस्थान के थार में चरागाह भूमि का सिकुड़ना केवल घास के मैदानों का खत्म होना नहीं है, बल्कि यह पशुपालकों, ऊंटों और वन्यजीवों के अस्तित्व से जुड़ा सवाल है।
जैसलमेर के पारंपरिक ऊंटपालक सुमेर सिंह भाटी ने इसी चुनौती के खिलाफ वर्षों से आवाज उठाई है। उनकी कोशिशों को 2026 के रेंजलैंड अवॉर्ड्स में वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है।
भाटी का संघर्ष जैसलमेर की करीब 10 हजार हेक्टेयर में फैली देगराई माता ओरान भूमि को बचाने के लिए है। इस क्षेत्र पर करीब 5 हजार पशुपालक परिवार और 50 हजार से अधिक पशुधन निर्भर हैं।
यही इलाका गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड समेत कई वन्यजीवों का भी आश्रय है। भाटी के लिए इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की शुरुआत घास से होती है।
देगराई में उगने वाली देशी सेवन और धामन घास ऊंटों और दूसरे पशुओं के लिए महत्वपूर्ण चारा हैं। सेवन घास पश्चिमी राजस्थान के अत्यंत शुष्क रेतीले इलाकों के अनुरूप विकसित हुई है और इसकी गहरी जड़ें लंबे समय तक बारिश न होने पर भी इसे टिकाए रखती हैं।
धामन घास भी राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पशुओं के लिए महत्वपूर्ण चारा उपलब्ध कराती है। ओरान राजस्थान की पारंपरिक सामुदायिक संरक्षित भूमि होती है, जो स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़ी होती है। इनमें चरागाह, देशी वनस्पति, वन्यजीव और जलस्रोत एक साथ जुड़े रहते हैं।
जोहड़, तालाब, नाड़ी, बेरी और खुले कुएं जैसे पारंपरिक जलस्रोत इस कठिन भू-दृश्य में इंसानों और पशुओं के लिए जीवनरेखा का काम करते हैं।
समस्या यह है कि जमीन का वास्तविक पारिस्थितिक और सामुदायिक महत्व हमेशा सरकारी रिकॉर्ड में दिखाई नहीं देता। 2022 में भाटी ने बताया था कि करीब 10 हजार हेक्टेयर में फैली देगराई ओरान भूमि में से केवल लगभग 4 हजार हेक्टेयर को राजस्व रिकॉर्ड में ओरान के रूप में दर्ज किया गया था, जबकि बाकी जमीन को बंजर भूमि की श्रेणी में रखा गया था।
इससे उसके दूसरे उपयोगों के लिए आवंटित होने का खतरा बना रहा। भाटी ने संरक्षण की मुहिम गांव-गांव जाकर शुरू की। उन्होंने लोगों को चरागाहों में बदलाव के बारे में बताया और प्राकृतिक तथा देशी तरीकों को अपनाने की अपील की।
करीब 20 गांव इस अभियान से जुड़े। इस आंदोलन का सबसे बड़ा अभियान रहा ‘ओरान बचाओ पदयात्रा’। 21 जनवरी 2026 से शुरू हुई करीब 700 किलोमीटर लंबी यह 85 दिन की पदयात्रा जैसलमेर जिले के तनोट माता मंदिर से जयपुर तक चली और 16 अप्रैल को राजधानी पहुंची। इसमें 100 से अधिक किसान और पशुपालक शामिल हुए।
भाटी ने इस आंदोलन को गांधीवादी तरीके से आगे बढ़ाया। उनका संदेश था—‘गांव बचेगा तो शहर बचेगा।’ आंदोलन का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को निशाना बनाना नहीं, बल्कि थार के चरागाहों, पशुधन और उनसे जुड़े समुदायों की समस्याओं को सामने लाना था।
इस अभियान के बाद करीब 3,800 हेक्टेयर भूमि को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। भाटी की चिंता केवल चरागाहों तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि ऊंट, घास, पानी, पशुपालक और वन्यजीव एक ही पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं।
चरागाह कम होते हैं तो ऊंटों के लिए चारा घटता है, पशुपालकों की आजीविका प्रभावित होती है और वन्यजीवों का आवास भी सिकुड़ता है। देगराई का यही भू-दृश्य ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए भी महत्वपूर्ण है। भाटी ने बिजली की ऊंची लाइनों से पक्षियों की मौत के खिलाफ आवाज उठाई है और 2020 में देगराई माता ओरान के पास हाई-टेंशन बिजली लाइनों से टकराकर एक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की मौत का मामला भी सामने रखा था।
भाटी की कहानी बताती है कि किसी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए हमेशा बड़े संस्थानों से शुरुआत जरूरी नहीं होती। कभी-कभी उस भूमि को सबसे अच्छी तरह समझने वाला व्यक्ति ही बदलाव की शुरुआत करता है। ऊंटपालक के रूप में थार की घास, पानी और पशुओं के बीच संबंधों को करीब से देखने वाले भाटी ने स्थानीय समुदायों को साथ जोड़ा और चरागाह संरक्षण को व्यापक सार्वजनिक मुद्दा बनाया।
2026 में रेंजलैंड अवॉर्ड्स से मिली पहचान इसी लंबी सामुदायिक लड़ाई की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति है।
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