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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जंगल > प्रदूषण के जुर्माने से बनेगा राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण कोष, केंद्र ने 2026 के नियम किए अधिसूचित
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जंगलहवा

प्रदूषण के जुर्माने से बनेगा राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण कोष, केंद्र ने 2026 के नियम किए अधिसूचित

Environment Pulse
Last updated: August 29, 2026 9:18 pm
Environment Pulse
Published: August 29, 2026
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केंद्र सरकार ने जनवरी 2026 में ‘पर्यावरण (संरक्षण) कोष नियम, 2026’ अधिसूचित किए हैं, जिसके तहत भारत के लोक खाते में एक नॉन-लैप्सेबल (गैर-समाप्ति योग्य) राष्ट्रीय पर्यावरण संरक्षण कोष बनाया गया है। वायु, जल और पर्यावरण संरक्षण अधिनियमों के तहत प्रदूषण फैलाने वालों पर लगने वाले आर्थिक दंड (₹10,000 से ₹15 लाख तक) को इस कोष में जमा किया जाएगा, जिससे ‘प्रदूषक भुगतान करे’ सिद्धांत को बढ़ावा मिलेगा।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाते हुए पर्यावरण (संरक्षण) कोष नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। इन नियमों के जरिए प्रदूषण संबंधी उल्लंघनों पर लगाए जाने वाले आर्थिक दंड से एक समर्पित राष्ट्रीय कोष को औपचारिक रूप से संचालित किया गया है।

इस राशि का इस्तेमाल पर्यावरण बहाली, निगरानी व्यवस्था, स्वच्छ तकनीक और संस्थागत क्षमता मजबूत करने जैसे कार्यों में किया जाएगा। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जनवरी 2026 में राजपत्र में प्रकाशित नियमों के तहत यह कोष भारत के लोक खाते (Public Account of India) में एक गैर-समाप्ति योग्य यानी नॉन-लैप्सेबल फंड के रूप में बनाया गया है।

इसका उद्देश्य पर्यावरणीय उल्लंघनों से मिलने वाले जुर्माने को सामान्य सरकारी राजस्व में शामिल करने के बजाय सीधे पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों में लगाना है। इससे ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (Polluter Pays) सिद्धांत को संस्थागत आधार मिलने की उम्मीद है। नए नियमों के तहत वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत लगाए गए सभी आर्थिक दंड को इस कोष में जमा किया जाएगा।

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत स्वीकृत अन्य आय को भी निर्धारित प्रावधानों के अनुसार कोष में शामिल किया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण कोष की अवधारणा को जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2023 के तहत किए गए कानूनी बदलावों के बाद आधार मिला।

इन संशोधनों के जरिए कई पर्यावरण संबंधी अपराधों को आपराधिक श्रेणी से हटाकर आर्थिक दंड की व्यवस्था की गई, लेकिन उल्लंघनों के लिए वित्तीय जवाबदेही बरकरार रखी गई। उल्लंघन की प्रकृति और गंभीरता के आधार पर इन कानूनों के तहत जुर्माने की राशि आम तौर पर ₹10,000 से ₹15 लाख तक हो सकती है।

नए नियम पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की संबंधित धाराओं के तहत कोष में राशि जमा करने, उसके आवंटन, उपयोग और प्रशासन की विस्तृत व्यवस्था तय करते हैं। जुर्माने का भुगतान ऑनलाइन भारतकोष पोर्टल के माध्यम से किया जाएगा।

राशि पहले भारत की संचित निधि में जमा होगी और इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत पर्यावरण संरक्षण कोष में स्थानांतरित की जाएगी। केंद्र और राज्यों के बीच जुर्माने की राशि के बंटवारे के लिए 75:25 का अनुपात निर्धारित किया गया है।

इसके तहत वसूले गए जुर्माने का 75 प्रतिशत संबंधित राज्य या केंद्रशासित प्रदेश की संचित निधि में जाएगा, जबकि 25 प्रतिशत केंद्र सरकार के पास रहेगा। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपने हिस्से की राशि लोक खाते में बनाए गए एक समर्पित रिजर्व फंड में जमा करनी होगी, जिसका इस्तेमाल केवल नियमों में निर्धारित गतिविधियों के लिए किया जा सकेगा।

कोष से पर्यावरण निगरानी के लिए वायु, जल और ध्वनि गुणवत्ता निगरानी उपकरणों की स्थापना, संचालन और रखरखाव किया जा सकेगा। इसके अलावा पर्यावरण प्रयोगशालाओं और अनुसंधान ढांचे के विकास, स्वच्छ तकनीकों से जुड़े अनुसंधान एवं विकास तथा प्रदूषित स्थलों की पहचान और पर्यावरणीय क्षति के आकलन एवं बहाली पर भी धन खर्च किया जा सकेगा।

नियमों में केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग और शहरी स्थानीय निकायों जैसी संस्थाओं की क्षमता निर्माण और संस्थागत मजबूती को भी अनुमत उपयोग में शामिल किया गया है। पर्यावरण अनुपालन और निगरानी के लिए आईटी आधारित प्रणालियों का विकास, अदालतों या अधिकरणों के निर्देश पर अध्ययन तथा जन-जागरूकता कार्यक्रम भी इस कोष से वित्त पोषित किए जा सकेंगे।

इसके अलावा प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और शमन उपायों तथा नई पर्यावरणीय तकनीकों के प्रदर्शन से जुड़ी परियोजनाओं को भी सहायता मिल सकती है। हालांकि कोष की कुल राशि का अधिकतम 5 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

नियमों में कुछ खर्चों पर स्पष्ट रोक भी लगाई गई है। इनमें चिकित्सा खर्च, विदेश यात्राएं, सरकारी कार्यालय भवनों का निर्माण तथा कार्यालयों के लिए फर्नीचर या वाहनों की खरीद शामिल है। इसका उद्देश्य कोष की राशि को सीधे पर्यावरण संरक्षण और सुधार संबंधी कार्यों तक सीमित रखना है।

कोष के संचालन के लिए केंद्र और राज्यों में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (PMU) स्थापित की जाएंगी। इन इकाइयों की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी जाएगी। कोष में प्राप्त और खर्च की गई राशि की वार्षिक रिपोर्टिंग अनिवार्य होगी। पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा कोष का ऑडिट किया जाएगा।

पर्यावरण विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों के अनुसार, यह व्यवस्था प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के आर्थिक प्रवर्तन को पर्यावरणीय सुधार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। जुर्माने से प्राप्त राशि को अलग रखकर उसका इस्तेमाल स्वच्छ हवा और पानी, प्रदूषित क्षेत्रों की बहाली, बेहतर निगरानी तथा मजबूत नियामकीय क्षमता के लिए करने से पर्यावरणीय उल्लंघनों पर कार्रवाई का प्रत्यक्ष लाभ संरक्षण कार्यों में दिखाई दे सकता है।

नियम राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही प्रभावी हो गए हैं। सरकार को उम्मीद है कि यह व्यवस्था देश के प्रमुख प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के क्रियान्वयन को मजबूत करने के साथ ‘प्रदूषक भुगतान करे’ सिद्धांत को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाएगी।

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