बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने मुंबई में छाई घनी धुंध के पीछे समुद्र से आने वाले सोडियम क्लोराइड (सामान्य समुद्री नमक) को भी एक नया कारण माना है। अल नीनो और अरब सागर का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण और समुद्री लहरों के जरिए नमक के सूक्ष्म कण हवा में तैरने लगते हैं, जो दृश्यता को प्रभावित करते हैं और इमारतों के आसपास धुंध की परत बनाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि समुद्री नमक का सीधे तौर पर स्वास्थ्य पर गंभीर नुकसान का प्रमाण नहीं है और सीपीसीबी (CPCB) इसे मानक प्रदूषक नहीं मानता, लेकिन यह अन्य प्रदूषकों के साथ मिलकर द्वितीयक प्रदूषण को बढ़ावा दे सकता है। इसलिए, मुंबई की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए मानवीय प्रदूषण स्रोतों के साथ-साथ इन प्राकृतिक कारकों को भी समझना आवश्यक है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : अल नीनो और समुद्र के बढ़ते तापमान से वाष्पीकरण में तेजी, हवा में तैरते नमक के कण बना रहे धुंध की परत; विशेषज्ञों ने कहा- समुद्री नमक अकेले खराब वायु गुणवत्ता की वजह नहीं मुंबई, 30 अक्टूबर। मुंबई की आसमान छूती इमारतें इन दिनों घनी धुंध की चादर में ढकी नजर आ रही हैं।
शहर में बिगड़ती वायु गुणवत्ता के बीच अब समुद्र से आने वाला नमक भी धुंध की एक वजह के रूप में सामने आया है। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने पहली बार सोडियम क्लोराइड (NaCl), यानी सामान्य समुद्री नमक को शहर के आसमान में छाई धुंध के लिए जिम्मेदार तत्वों में शामिल किया है। विशेषज्ञों के अनुसार, अरब सागर के पानी का तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
इसके अलावा समुद्र में उठने वाली लहरों से नमक के बेहद छोटे कण और एरोसोल वातावरण में पहुंचते हैं। पानी के वाष्पित होने के बाद नमक के कण हवा में निलंबित रह जाते हैं। ये कण वातावरण में धुंध की परत बनाने और दूर तक देखने की क्षमता यानी दृश्यता को प्रभावित करने में योगदान देते हैं। मुंबई समेत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई हिस्से अल नीनो के प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
यह जलवायु संबंधी स्थिति तापमान बढ़ने और वर्षा के स्वरूप में बदलाव से जुड़ी है। गर्म अरब सागर से वाष्पीकरण बढ़ने और समुद्री लहरों के कारण हवा में नमक के कणों की मात्रा बढ़ सकती है। वायु गुणवत्ता विशेषज्ञ और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के पूर्व वैज्ञानिक तुहिन बनर्जी ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि नमक यानी सोडियम क्लोराइड एक अपारदर्शी तत्व है।
इसके कण दृश्यता को सीधे प्रभावित करते हैं और शहर की इमारतों के आसपास घनी धुंध जैसी परत बनाने में योगदान दे सकते हैं। वातावरण में मौजूद नमक के कण वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा सल्फर ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया कर सकते हैं। इससे द्वितीयक प्रदूषकों के निर्माण की संभावना रहती है। इसके अलावा हवा की रफ्तार कम होने पर नमक के एरोसोल और दूसरे प्रदूषणकारी कण वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं, जिससे धुंध की समस्या और गंभीर हो सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि समुद्री नमक की मौजूदगी को मुंबई की बिगड़ती वायु गुणवत्ता का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। शहर में वाहनों, उद्योगों और अन्य मानवीय गतिविधियों से निकलने वाले प्रदूषक भी वायु प्रदूषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, सामान्य वातावरण में मौजूद सांद्रता पर समुद्री नमक के एरोसोल सांस के जरिए शरीर में जाने से गंभीर प्रत्यक्ष स्वास्थ्य नुकसान होने का स्थापित प्रमाण नहीं है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) भी सोडियम क्लोराइड को वायु गुणवत्ता के अलग मानक प्रदूषक के रूप में सूचीबद्ध नहीं करता। इसके प्रमुख निगरानी मानकों में पीएम 2.5, पीएम 10, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड शामिल हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री नमक के कण वातावरण में मौजूद दूसरे रासायनिक तत्वों के साथ प्रतिक्रिया कर द्वितीयक प्रदूषण में योगदान दे सकते हैं।
लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, सर्किट बोर्ड और मोबाइल फोन में जंग लगने तथा क्षरण की समस्या भी पैदा हो सकती है। इस तरह मुंबई की धुंध के पीछे समुद्री और मानवीय दोनों तरह के कारक काम कर सकते हैं। अरब सागर का बढ़ता तापमान और बदलती जलवायु परिस्थितियां इस समस्या को प्रभावित कर रही हैं, लेकिन शहर की वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए स्थानीय प्रदूषण स्रोतों पर नियंत्रण भी उतना ही जरूरी है।

