IIT गुवाहाटी ने प्लैटिनम जैसी महंगी धातुओं की जगह निकल और एंथ्रासीन आधारित सस्ता कैटेलिस्ट विकसित किया। यह 88% ऊर्जा दक्षता के साथ पानी से ग्रीन हाइड्रोजन बनाता है और लंबे समय तक इस्तेमाल में स्थिर रहता है। इससे भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन सस्ता होगा और ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ को गति मिलेगी।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए एक सस्ता कैटेलिस्ट विकसित किया है, जो भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ते कदमों को मज़बूती दे सकता है।
हाइड्रोजन को एक अहम स्वच्छ ऊर्जा ईंधन माना जाता है, क्योंकि इससे ऊर्जा बनाने पर मुख्य उपोत्पाद के तौर पर सिर्फ पानी निकलता है। इसका इस्तेमाल फ्यूल सेल्स के साथ-साथ खाद उत्पादन समेत कई उद्योगों में भी होता है।
लेकिन दिक्कत यह है कि आज बनने वाली ज़्यादातर हाइड्रोजन अब भी जीवाश्म ईंधन से ही तैयार होती है — करीब 90-95% हाइड्रोजन प्राकृतिक गैस और कोयले जैसे स्रोतों से बनाई जाती है, जिससे ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। पानी से इलेक्ट्रोलिसिस के ज़रिए हाइड्रोजन बनाना एक साफ-सुथरा विकल्प है, लेकिन इसके लिए दमदार कैटेलिस्ट चाहिए होते हैं।
पानी को तोड़ने (वॉटर स्प्लिटिंग) के लिए अब तक सबसे कारगर कैटेलिस्ट दुर्लभ और महंगी नोबल मेटल्स से बनते रहे हैं, जिस वजह से बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन उत्पादन के लिए इनका इस्तेमाल करना मुश्किल रहा है।
आईआईटी-गुवाहाटी की टीम ने इसके बजाय एक सस्ते और आसानी से उपलब्ध निकल साल्ट को एंथ्रासीन-आधारित ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल के साथ इस्तेमाल किया। इस स्टडी की अगुवाई करने वाले आईआईटी-गुवाहाटी के केमिस्ट्री विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर अक्षय कुमार के मुताबिक, टीम ने कमरे के सामान्य तापमान पर अल्ट्रासोनिक तरंगों की मदद से एक आसान प्रक्रिया में यह कोऑर्डिनेशन पॉलिमर कैटेलिस्ट तैयार किया।
इस तरह बना मटीरियल एक विस्तृत नेटवर्क बनाता है, जिसमें निकल परमाणु ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल्स से आपस में जुड़े होते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह संरचना हाइड्रोजन बनाने वाली रिएक्शन के लिए ढेर सारे एक्टिव साइट्स मुहैया कराती है, साथ ही इलेक्ट्रॉन को मटीरियल के भीतर कुशलता से आने-जाने में भी मदद करती है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि सप्लाई की गई कुल बिजली का करीब 88% हिस्सा सीधे पानी को तोड़ने में इस्तेमाल हुआ। उनका कहना है कि हाइड्रोजन उत्पादन को व्यावहारिक बनाने के लिए ऊर्जा की बर्बादी कम करना बेहद ज़रूरी है। खास बात यह भी रही कि लंबे समय तक इस्तेमाल के दौरान भी यह कैटेलिस्ट स्थिर बना रहा, जो इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिहाज़ से अहम बनाता है।
आईआईटी-गुवाहाटी के असिस्टेंट प्रोफेसर कालीशंकर भट्टाचार्य के मुताबिक, स्टडी में निकल और एंथ्रासीन-आधारित फ्रेमवर्क के बीच एक तालमेल भरा असर देखने को मिला, जिसमें दोनों घटक एक-दूसरे का प्रदर्शन बेहतर करते हैं। टीम ने कैटेलिस्ट के व्यवहार को समझने के लिए केमिकल एनालिसिस और मॉडलिंग का सहारा लिया, जिससे पता चला कि निकल परमाणु एंथ्रासीन कंपोनेंट के साथ मिलकर एक त्रि-आयामी (थ्री-डायमेंशनल) नेटवर्क बनाते हैं।
यह स्टडी जर्नल ऑफ मटीरियल्स केमिस्ट्री ए में प्रकाशित हुई है। इसे अक्षय कुमार और कालीशंकर भट्टाचार्य के अलावा शोध छात्रा निहारिका तंवर, जुमाना इशरत और खादिमुल इस्लाम ने मिलकर लिखा है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह सस्ता और स्थिर मटीरियल पानी से हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया को और दक्ष तथा बड़े पैमाने पर संभव बनाने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है।
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