प्रदूषण, अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन की दोहरी मार झेल रही कश्मीर की प्रसिद्ध डल झील का जलक्षेत्र पिछले पांच दशकों में लगभग 40 प्रतिशत तक सिमट गया है, जो कभी 22 वर्ग किलोमीटर से अधिक हुआ करता था और सीएजी रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2020 के बीच ही घटकर 15.40 से 12.91 वर्ग किलोमीटर रह गया है। होटलों, बस्तियों और सैकड़ों हाउसबोट से बिना उपचार के सीधे झील में पहुँचने वाले सीवेज, कचरे और जलकुंभी जैसी समस्याओं के कारण पानी में माइक्रोप्लास्टिक और भारी धातुओं (जैसे आर्सेनिक, सीसा व पारा) की मौजूदगी दर्ज की गई है, जबकि हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने व बर्फबारी घटने से पानी का ठहराव और ऑक्सीजन की कमी का संकट भी गहरा गया है। झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (LCMA) द्वारा खरपतवार हटाने और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसी पहलों पर 70 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने के बावजूद, अधूरी सीवर व्यवस्था और अनियंत्रित निर्माणों के कारण हजारों लोगों की आजीविका और श्रीनगर की अर्थव्यवस्था का केंद्र रही इस प्राकृतिक धरोहर के दीर्घकालिक अस्तित्व पर गंभीर खतरा बना हुआ है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क : कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की पहचान मानी जाने वाली डल झील इन दिनों प्रदूषण, अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से जूझ रही है।
कभी स्वच्छ जल, तैरते बगीचों और पारंपरिक हाउसबोट के लिए मशहूर रही यह झील अब जलकुंभी व अन्य जलीय खरपतवार, गाद जमने और बिना उपचार के सीवेज के प्रवाह जैसी समस्याओं से घिरी है।
इससे झील के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ इस पर निर्भर हजारों लोगों की आजीविका पर भी खतरा बढ़ रहा है। पिछले पांच दशकों में झील का क्षेत्रफल लगभग 40 प्रतिशत तक घटने का अनुमान है। गाद जमा होने से इसकी गहराई भी कम हुई है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2007 में झील का जलक्षेत्र 15.40 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 में घटकर 12.91 वर्ग किलोमीटर रह गया। हालांकि, विभिन्न आकलनों में झील का मौजूदा क्षेत्रफल लगभग 18 वर्ग किलोमीटर बताया गया है, जबकि ऐतिहासिक आंकड़ों में यह 22 वर्ग किलोमीटर से अधिक रहा है।
झील के भीतर और आसपास तैरते बगीचों, वनस्पतियों तथा निर्माण गतिविधियों के विस्तार से खुले पानी का क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है। डल झील के लिए घरेलू और व्यावसायिक कचरे का सीधे पानी में पहुंचना गंभीर समस्या बन गया है। घरों, होटलों, झील के भीतर स्थित 50 से अधिक बस्तियों और सैकड़ों हाउसबोट से निकलने वाला सीवेज कई स्थानों पर सीवर नेटवर्क से जुड़ा नहीं है।
परिणामस्वरूप, गंदा पानी झील में पहुंचकर पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाता है। इससे पानी में अत्यधिक जैविक वृद्धि, शैवाल और खरपतवार के फैलाव जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। झील के जल और यहां पाई जाने वाली व्यावसायिक महत्व की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक मिलने की भी जानकारी सामने आई है। वहीं, तलछट में आर्सेनिक, सीसा और पारे जैसी भारी धातुओं की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होने की स्थिति में यह समस्या भविष्य में और गंभीर हो सकती है। झील के किनारों पर अनियंत्रित निर्माण, जमीन पर कब्जे और तैरते बगीचों व बस्तियों के विस्तार ने इसके प्राकृतिक स्वरूप को प्रभावित किया है। जलवायु परिवर्तन इस संकट को और बढ़ा रहा है।
हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने, बर्फबारी में कमी, अनियमित वर्षा और बर्फ जल्दी पिघलने से झील में पानी के प्रवाह का स्वरूप बदल रहा है। पानी का ठहराव बढ़ने और गहराई कम होने से शैवाल की अत्यधिक वृद्धि तथा पानी में घुली ऑक्सीजन की कमी का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर जलीय जीवों और झील की जैव विविधता पर पड़ सकता है। डल झील केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि श्रीनगर की अर्थव्यवस्था का भी अहम हिस्सा है। मछली पकड़ने, तैरते बगीचों में सब्जियां उगाने, नाव परिवहन और पर्यटन से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका इस पर निर्भर है।
पानी की गुणवत्ता खराब होने से जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं, झील की सुंदरता और स्वच्छता प्रभावित होने से कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र पर भी नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है। झील संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एलसीएमए) ने हाल के वर्षों में खरपतवार हटाने, नौवहन मार्गों से गाद निकालने, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के रखरखाव और जलग्रहण क्षेत्र में पौधरोपण जैसे कार्यों पर 70 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।
कुछ क्षेत्रों में जलीय वनस्पतियों को हटाने और खुले जलक्षेत्र में मामूली सुधार की जानकारी भी दी गई है। इसके अलावा, सीवेज शोधन की क्षमता बढ़ाने के लिए नए संयंत्रों पर काम चल रहा है और डल-निशात झील पारिस्थितिकी तंत्र के एकीकृत प्रबंधन की योजना प्रस्तावित है। अधिकारियों ने झील में रहने वाले लोगों को बड़े पैमाने पर विस्थापित करने के बजाय, उनकी बस्तियों में स्वच्छता और सीवेज व्यवस्था सुधारने पर केंद्रित संरक्षण दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।
हालांकि, ऑडिट और न्यायाधिकरणों की रिपोर्टों में सीवर नेटवर्क की अधूरी व्यवस्था, शोधन संयंत्रों के अपेक्षित प्रदर्शन में कमी और झील में गंदे पानी के लगातार पहुंचने जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल खरपतवार हटाने से झील का दीर्घकालिक संरक्षण संभव नहीं है। इसके लिए प्रदूषक तत्वों और गाद के स्रोतों पर नियंत्रण, अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कार्रवाई, ठोस कचरे का बेहतर प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण जरूरी है।
डल झील का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि संरक्षण के प्रयास कितनी निरंतरता और समन्वय के साथ किए जाते हैं। यदि प्रदूषण, अतिक्रमण और बदलती जलवायु से जुड़ी चुनौतियों का प्रभावी समाधान नहीं निकाला गया, तो कश्मीर की यह प्रतिष्ठित प्राकृतिक धरोहर अपूरणीय क्षति की ओर बढ़ सकती है।
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