2047 तक भारत को जलवायु-सुरक्षित बनाने के लिए नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के साथ-साथ ‘Net Resilience’ को विकास की मुख्यधारा में शामिल करना होगा। स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि, जल संचयन, ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर, हरित उद्योग और ईको-सिस्टम का संरक्षण।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। अगर भारत को 2047 तक जलवायु संकट के प्रभावों से वास्तव में स्वतंत्र और लचीला (climate-resilient) बनना है, तो केवल नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य पर्याप्त नहीं होगा।
भारत को ऊर्जा, कृषि, जल, शहरों, उद्योग और प्राकृतिक संसाधनों में ऐसा बदलाव करना होगा जिससे विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी न रहें।
2047 तक भारत की Climate Independence के लिए प्रमुख कदम
- स्वच्छ ऊर्जा को अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाना सौर, पवन, जलविद्युत, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज और अन्य कम-कार्बन ऊर्जा स्रोतों का तेजी से विस्तार करना होगा। कोयले पर निर्भरता धीरे-धीरे घटाते हुए बिजली व्यवस्था को अधिक विकेंद्रीकृत बनाना जरूरी होगा।
- हरित परिवहन को मुख्यधारा में लाना 2047 तक इलेक्ट्रिक कारों, बसों, ट्रकों और दोपहिया वाहनों के साथ-साथ रेलवे और सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देनी होगी। शहरों में पैदल और साइकिल-अनुकूल बुनियादी ढांचा प्रदूषण और ईंधन आयात दोनों कम कर सकता है।
- Climate-smart agriculture बढ़ता तापमान, अनियमित मानसून, सूखा और बाढ़ कृषि को सबसे अधिक प्रभावित कर सकते हैं। कम पानी वाली फसलें, माइक्रो-इरिगेशन, प्राकृतिक खेती, मिट्टी संरक्षण, मौसम आधारित सलाह और जलवायु-प्रतिरोधी बीजों को बड़े पैमाने पर अपनाना होगा।
- पानी की सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना 2047 का climate-resilient India तभी संभव है जब गांवों और शहरों के पास पर्याप्त सुरक्षित पानी हो। वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, नदी और wetlands का संरक्षण तथा treated wastewater का पुन: उपयोग आवश्यक होगा।
- शहरों को Climate-resilient बनाना लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, वाराणसी जैसे शहरों को heatwaves, floods और खराब वायु गुणवत्ता के लिए तैयार करना होगा। Urban forests, खुले हरित क्षेत्र, cool roofs, बेहतर drainage और climate-sensitive urban planning जरूरी होंगे।
- उद्योगों का Green Transformation Steel, cement, chemicals और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योगों में green hydrogen, renewable electricity, energy efficiency, carbon capture और circular economy जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना होगा। Waste को resource में बदलना भी इसी बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
- प्रकृति को विकास का साझेदार बनाना वन, wetlands, नदियां, mangroves और grasslands केवल जैव-विविधता के स्रोत नहीं हैं; वे बाढ़, गर्मी और कार्बन उत्सर्जन के खिलाफ प्राकृतिक सुरक्षा कवच हैं। इसलिए ecological restoration को infrastructure development जितनी ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
- Climate finance और green jobs 2047 की climate transformation के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। Green bonds, climate funds, private investment और carbon markets के साथ युवाओं के लिए renewable energy, EVs, sustainable construction, climate technology और environmental management में लाखों रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।
- स्थानीय समाधान, राष्ट्रीय मिशन Climate change का प्रभाव हर राज्य में अलग है। राजस्थान को water stress, हिमालयी राज्यों को landslides और glacier risks, तटीय राज्यों को cyclones और sea-level rise तथा गंगा के मैदानी क्षेत्रों को floods और heatwaves जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए एक समान नीति के बजाय region-specific climate action plans जरूरी होंगे।
- 2047 का लक्ष्य केवल Net Zero नहीं, Net Resilience होना चाहिए भारत की वास्तविक climate independence का अर्थ होगा—कम जीवाश्म ईंधन आयात, सुरक्षित खाद्य और जल व्यवस्था, स्वच्छ ऊर्जा, climate-resilient infrastructure, स्वस्थ शहर और ऐसी अर्थव्यवस्था जो climate shocks के बावजूद तेजी से आगे बढ़ सके।
2047 में स्वतंत्र भारत की परिकल्पना तभी पूर्ण होगी जब भारत जलवायु परिवर्तन का केवल सामना करने वाला देश नहीं, बल्कि climate solutions देने वाला वैश्विक नेतृत्वकर्ता बने। ऊर्जा से लेकर खेती और शहरों से लेकर उद्योग तक हर क्षेत्र में हरित परिवर्तन को विकास की मुख्यधारा बनाना ही भारत को climate-secure और आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता है।
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