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Environment Pulse > ईको सिस्टम > जल > जलवायु संकट: जब हमारे पास शब्द ही नहीं हैं तो समझें कैसे?
(फोटो सौजन्य-एआई)
जलजैव-विविधतास्टोरीहवा

जलवायु संकट: जब हमारे पास शब्द ही नहीं हैं तो समझें कैसे?

Environment Pulse
Last updated: August 6, 2026 8:10 pm
Environment Pulse
Published: August 6, 2026
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(फोटो सौजन्य-एआई)
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भारत में 780 से ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन जलवायु विज्ञान की भाषा सिर्फ एक है — अंग्रेज़ी।

जब हमारे पास किसी चीज़ को बयां करने के लिए शब्द ही नहीं होते, तो हमारी समझ भी सिमट जाती है।

एनवायरमेंट पल्स डेस्क

पर्यावरण के बारे में बात सिर्फ किसी एक भाषा में बात करने से नहीं चलेगा। ज़रुरत है तो उसके बारे में हर प्रांत, हर शहर, हर कसबे में बात करने से। उसके लिए ये भी ज़रूरी है की हम हर भाषा में पारंगत हों और अपनी बात को बहुत गंभीरता से कहें। अगर आप अलग अलग राज्य और भाषा के जानकारों से मिले उनसे अवश्य पूछिए की क्या वे अपनी मातृभाषा में ‘जलवायु परिवर्तन’ या ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कह सकते हैं? विडम्बना ये है की ऐसा हर कोई कर नहीं पायेगा। कुछ लोग शायद घुमा-फिराकर कोई शब्द निकाल भी लें, लेकिन ज़्यादातर के लिए यह शब्द अजनबी ही रहेगा।

बात याददाश्त की भी नहीं, बल्कि एक गहरी व्यवस्थागत खामी की तरफ इशारा करती है। ऑटो चालक, ठेला लगाने वाला, चौकीदार या दुकान वाला — शायद ही किसी ने कभी अपनी भाषा में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ शब्द सुना हो। असलियत ये है की असल ज़िन्दगी में पर्यावरण के तालमेल बिगड़ने से इन पर बुरा असर पढ़ता है।

एक सर्वे में सामने आया कि केवल 36% लोगों ने कहा कि वे ग्लोबल वार्मिंग के बारे में “कुछ-कुछ” जानते हैं, 17% ने कहा “बहुत कम” पता है, और 27% ने माना कि उन्होंने यह शब्द कभी सुना ही नहीं।

Also Read: अंडों  के केज-फ्री सिस्टम पर बहस जारी

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