UNEP की नई रिपोर्ट में चेतावनी—दुनिया को अब तापमान बढ़ने की अवधि और अधिकतम स्तर सीमित करने पर करना होगा ध्यान केंद्रित
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक प्रयासों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की नई चेतावनी ने दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती पेश की है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने कहा है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक-पूर्व स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य अब मौजूदा परिस्थितियों में हासिल करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है।
UNEP की 141 पृष्ठों की नई रिपोर्ट ‘Limiting Overshoot: Navigating Exceedance’ में कहा गया है कि पेरिस समझौते के समय उपलब्ध सबसे कड़े उत्सर्जन-कमी वाले रास्ते अब व्यवहार्य नहीं रह गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, मानव गतिविधियों से होने वाली तापमान वृद्धि लगभग 1.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुकी है और वर्तमान गति जारी रहने पर 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करना अपरिहार्य हो सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब जलवायु नीति का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने से पूरी तरह रोकना नहीं, बल्कि ओवरशूट यानी इस सीमा से ऊपर जाने की अधिकतम ऊंचाई और अवधि को यथासंभव कम रखना होना चाहिए।
UNEP के आकलन के मुताबिक, वर्ष 2026 के बाद 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रहने के लिए दुनिया के पास लगभग 130 अरब टन CO₂ का ही शेष कार्बन बजट है। इसके मुकाबले वैश्विक स्तर पर हर वर्ष करीब 40 अरब टन CO₂ उत्सर्जित हो रहा है और उत्सर्जन में पर्याप्त तेजी से कमी नहीं आई है। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा उत्सर्जन स्तरों को देखते हुए यह शेष बजट कुछ ही वर्षों में समाप्त हो सकता है।
1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर रहने के लिए वैश्विक CO₂ उत्सर्जन को 2025 से लगातार कम करते हुए लगभग 2031 तक शून्य तक लाना पड़ता। मौजूदा नीतियों के तहत दुनिया इस लक्ष्य से काफी दूर है और सदी के अंत तक तापमान वृद्धि लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है। UNEP की रिपोर्ट से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि दशकों से वैज्ञानिक चेतावनियों के बावजूद जलवायु प्रतिबद्धताएं उत्सर्जन में आवश्यक गति से कमी नहीं ला सकी हैं।
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि दुनिया ने जलवायु कार्रवाई में बहुत देर की है। उनके अनुसार, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लगातार बढ़ रही भीषण गर्मी यह दिखा रही है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अपेक्षा से अधिक तेजी से सामने आ रहे हैं और अधिक गंभीर तथा लंबे समय तक बने रहने वाले हैं। 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने पर अत्यधिक मौसम की घटनाओं में वृद्धि, समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी, खाद्य एवं जल सुरक्षा पर दबाव और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका है।
छोटे द्वीपीय देशों के अस्तित्व पर भी इसका सीधा खतरा मंडरा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमानों के मुताबिक 2026 से 2030 के बीच पांच वर्ष के औसत तापमान के पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा से ऊपर रहने की संभावना काफी अधिक है। UNEP ने चेताया है कि हर पांच वर्ष की देरी से उस अधिकतम तापमान में कम से कम लगभग 0.1 डिग्री सेल्सियस की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है, जिसका दुनिया को भविष्य में सामना करना पड़ेगा।
रिपोर्ट का सबसे आशावादी परिदृश्य भी चिंता कम नहीं करता। यदि सभी देशों की मौजूदा राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं को पूरी तरह लागू किया जाए और घोषित नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं को भी हासिल कर लिया जाए, तब भी वैश्विक तापमान वृद्धि का अधिकतम स्तर लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इस परिदृश्य को हासिल करने के लिए 2035 तक वैश्विक उत्सर्जन को लगभग आधा करना होगा। UNEP के विशेषज्ञों के अनुसार, इसके बाद भी तापमान को नीचे लाने की प्रक्रिया अत्यंत कठिन और अनिश्चित होगी।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि तापमान को बाद में 1.5 डिग्री सेल्सियस के आसपास वापस लाने का अर्थ यह नहीं होगा कि दुनिया पहले जैसी स्थिति में लौट आएगी। समुद्र का स्तर बढ़ता रहेगा, विलुप्त हो चुकी प्रजातियां वापस नहीं आएंगी और पर्माफ्रॉस्ट से वातावरण में पहुंच चुका कार्बन आसानी से वापस नहीं लिया जा सकेगा। UNEP ने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से भी जोड़ा है। बढ़ते तापमान के कारण मच्छरों और अन्य वाहकों से फैलने वाली बीमारियां नए भौगोलिक क्षेत्रों तक पहुंच सकती हैं।
इससे संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा बढ़ सकता है। उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में 2050 तक वैश्विक खाद्य उत्पादन में उल्लेखनीय कमी आने की आशंका जताई गई है। इसका सबसे अधिक प्रभाव उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और मध्य अमेरिका जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कुपोषण के जोखिम के रूप में सामने आ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, अत्यधिक गर्मी की घटनाएं भी अधिक सामान्य होती जा रही हैं।
ऐसी गर्मी की लहरें जो पहले लगभग एक सदी में एक बार आने की आशंका होती थी, अब कई क्षेत्रों में 10 से 20 वर्ष के अंतराल पर देखने को मिल सकती हैं। जलवायु परिवर्तन का असर पृथ्वी के उन प्राकृतिक तंत्रों पर भी पड़ रहा है जो स्वयं जलवायु को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रिपोर्ट में पश्चिमी अंटार्कटिक बर्फ की चादर के कुछ हिस्सों में संभावित अपरिवर्तनीय बर्फ क्षरण की आशंका जताई गई है।
1970 के दशक के बाद दुनिया में ग्लेशियरों के कुल नुकसान का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पिछले एक दशक में हुआ है। उष्णकटिबंधीय प्रवाल भित्तियां भी गंभीर संकट में हैं। 2023 से 2025 के बीच 80 प्रतिशत से अधिक उष्णकटिबंधीय कोरल रीफ के ब्लीचिंग की रिपोर्ट सामने आई है। वहीं, अमेजन वर्षावन के बड़े हिस्से पर दीर्घकालिक क्षति का खतरा बढ़ रहा है। वनों और अन्य प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की यह क्षति जलवायु संकट को और गंभीर बना सकती है, क्योंकि ये तंत्र वातावरण से कार्बन हटाने और उसे संग्रहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के लिए तापमान वृद्धि और समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी अस्तित्व का संकट बनती जा रही है। UNEP के अनुसार, 2050 तक समुद्र के स्तर में पांच से 10 सेंटीमीटर की अतिरिक्त वृद्धि भी हिंद महासागर और उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में बाढ़ के जोखिम को काफी बढ़ा सकती है। समुद्र के स्तर में वृद्धि के साथ तूफानी लहरें अधिक अंदर तक पहुंच सकती हैं, ताजे पानी के स्रोतों में खारे पानी का प्रवेश बढ़ सकता है और निचले द्वीपीय क्षेत्रों में रहने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
पलाऊ के राष्ट्रपति सुरांगेल व्हिप्स जूनियर ने रिपोर्ट को दुनिया के लिए एक निर्णायक मोड़ बताते हुए कहा कि जलवायु संकट से सबसे अधिक प्रभावित देशों के लिए यह भविष्य की ऐसी तस्वीर है जो कई स्थानों पर पहले ही वास्तविकता बन चुकी है। उन्होंने जलवायु-सुरक्षित भविष्य के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और निवेश में तत्काल और अभूतपूर्व वृद्धि की जरूरत बताई। UNEP ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान रहने से पृथ्वी की कई महत्वपूर्ण प्रणालियों में अपरिवर्तनीय बदलाव शुरू हो सकते हैं।
इनमें पश्चिमी अंटार्कटिक और ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरें, अमेजन वर्षावन तथा अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) शामिल हैं। AMOC अटलांटिक महासागर की धाराओं की एक महत्वपूर्ण प्रणाली है, जो अटलांटिक क्षेत्र और यूरोप की जलवायु को प्रभावित करती है। यदि ऐसी प्रणालियों में बड़े पैमाने पर बदलाव होते हैं तो वैश्विक जलवायु व्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान को सुरक्षित या स्वीकार्य नहीं माना जा सकता। तापमान को भविष्य में फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे लाने में सफलता मिलने की स्थिति में भी कई देशों और समुदायों को स्थायी नुकसान और बदली हुई परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। UNEP के मुताबिक सबसे आशावादी स्थिति में भी दुनिया को लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस के अधिकतम तापमान वृद्धि से निपटना पड़ सकता है। मौजूदा जलवायु संकट को देखते हुए अब प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से कितना ऊपर जाता है और कितने समय तक वहां बना रहता है।
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव एक-दूसरे को बढ़ा भी सकते हैं। जंगलों में आग से कार्बन भंडारण क्षमता कम हो सकती है, सूखे से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है, अत्यधिक गर्मी सौर ऊर्जा प्रणालियों की दक्षता को कम कर सकती है और तापमान वृद्धि आर्द्रभूमियों से मीथेन उत्सर्जन बढ़ा सकती है। UNEP का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए अधिक जिम्मेदार और इससे निपटने की अधिक क्षमता रखने वाले देशों को उत्सर्जन कम करने की दिशा में सबसे तेज और सबसे महत्वाकांक्षी कदम उठाने चाहिए।
UNEP की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब नवंबर में तुर्किये के अंताल्या में होने वाले COP31 जलवायु सम्मेलन की तैयारियां तेज हो रही हैं। जीवाश्म ईंधन के चरणबद्ध उपयोग को समाप्त करने की गति और स्वरूप को लेकर विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद सम्मेलन में एक बार फिर महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि इस वर्ष की भीषण गर्मी, जंगलों की आग और घातक बाढ़ भविष्य में आने वाले खतरे की चेतावनी हैं।
उनके अनुसार, दुनिया को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होने वाली तापमान वृद्धि को जितना संभव हो उतना कम और कम अवधि वाला बनाने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी होगी। UNEP की रिपोर्ट का व्यापक संदेश यही है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने की आशंका को जलवायु कार्रवाई से पीछे हटने का कारण नहीं बनाया जा सकता। इसके विपरीत, अब हर वर्ष और हर अंश डिग्री की वृद्धि को सीमित करना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। आने वाले कुछ वर्षों में लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि दुनिया कितनी गर्म होगी और भविष्य में तापमान को नीचे लाने की कितनी संभावना बची रहेगी।
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