नई दिल्ली में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में ‘टाइगर लैंडस्केप्स: संरक्षण, जैव-अर्थव्यवस्था और आजीविका एवं आय सृजन के लिए इकोटूरिज्म के स्तंभ’ विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ है। इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (IBCA), एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस कार्यशाला में बाघ परिदृश्यों को प्राकृतिक पूंजी के रूप में देखने, समग्र लैंडस्केप प्रबंधन अपनाने तथा स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण नीतियों में शामिल करने पर जोर दिया गया है। इस दौरान IBCA और ADB के बीच लैंडस्केप संरक्षण, सतत विकास और प्रकृति-सकारात्मक वित्तीय पहलों को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए गए।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने नई दिल्ली में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन किया। ‘टाइगर लैंडस्केप्स: संरक्षण, जैव-अर्थव्यवस्था और आजीविका एवं आय सृजन के लिए इकोटूरिज्म के स्तंभ’ विषय पर आयोजित यह कार्यशाला 2 और 3 सितंबर को आयोजित की जा रही है।
इसका संयुक्त आयोजन इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (IBCA), एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सहयोग से किया जा रहा है।
कार्यशाला में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव तन्मय कुमार, वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव सुशील कुमार अवस्थी, IBCA के महानिदेशक एस.पी. यादव और भारत के लिए ADB की कंट्री डायरेक्टर मिया ओका सहित मंत्रालय, IBCA, NTCA और ADB के वरिष्ठ अधिकारी तथा बाघ-बहुल देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए भूपेंद्र यादव ने कहा कि “संरक्षण में सामंजस्य और मानव-प्रकृति सहअस्तित्व पारिस्थितिक संरक्षण की नींव होना चाहिए।” उन्होंने भारत के ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के तहत संरक्षण की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कहा कि बाघों का अस्तित्व केवल बाघों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वस्थ जंगलों, घासभूमियों, नदियों, शिकार प्रजातियों, वन्यजीव गलियारों और स्थानीय समुदायों से सीधे जुड़ा हुआ है।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बाघ परिदृश्यों को प्राकृतिक पूंजी के रूप में देखने की आवश्यकता है। ये क्षेत्र जल सुरक्षा, कार्बन अवशोषण, जलवायु विनियमन, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं। ऐसे में संरक्षण की रणनीति को केवल किसी एक प्रजाति तक सीमित रखने के बजाय समग्र लैंडस्केप प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जिसमें पर्यावरणीय सुरक्षा के साथ सामाजिक और आर्थिक विकास को भी समान महत्व मिले।
उन्होंने प्रकृति-आधारित समाधानों, नवाचारपूर्ण वित्तीय तंत्र और समुदाय आधारित इकोटूरिज्म को बढ़ावा देने पर जोर दिया। यादव ने कहा कि भूमि का संरक्षण गुणवत्तापूर्ण भोजन की सुरक्षा से जुड़ा है और अंततः मानव अस्तित्व के लिए भी इसका महत्वपूर्ण महत्व है। उन्होंने कहा कि दुनिया आज मरुस्थलीकरण, मिट्टी में नमी की कमी और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।
ऐसे समय में बाघ परिदृश्यों का संरक्षण और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और अनुभव का उपयोग करते हुए प्रकृति संरक्षण के साथ टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है। भूपेंद्र यादव ने कार्यशाला के प्रतिभागियों से संरक्षण, जैव-अर्थव्यवस्था और इकोटूरिज्म से जुड़ी नीतियों में पारंपरिक ज्ञान को शामिल करने और उसे व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकृत करने पर विचार-विमर्श करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि कार्यशाला का उद्देश्य ज्ञान के आदान-प्रदान, क्षमता निर्माण, स्थानीय ज्ञान को साझा करने और नीति निर्माण की प्रकृति में सकारात्मक बदलाव लाने पर केंद्रित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस को वैश्विक दक्षिण के देशों में मौजूद स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान को एक मंच पर लाने में नेतृत्वकारी भूमिका निभानी चाहिए, ताकि पारिस्थितिक संरक्षण से जुड़ी नीतियों को अधिक समावेशी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बनाया जा सके।
IBCA और ADB के बीच समझौता कार्यशाला के दौरान इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस और एशियन डेवलपमेंट बैंक के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस साझेदारी का उद्देश्य लैंडस्केप संरक्षण, सतत विकास, क्षमता निर्माण, ज्ञान के आदान-प्रदान और प्रकृति-सकारात्मक वित्तीय पहलों में सहयोग को मजबूत करना है।
केंद्रीय मंत्री ने IBCA और ADB की साझेदारी का स्वागत करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के तहत इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस सात बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए काम करने वाले देशों और संस्थानों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण वैश्विक मंच बन रहा है। ADB की भारत के लिए कंट्री डायरेक्टर मिया ओका ने कहा कि वर्ष 2026 भारत और ADB के बीच साझेदारी के 40 वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि भारत ने पारिस्थितिक संरक्षण और टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास के क्षेत्र में व्यापक अनुभव अर्जित किया है, जिसे बाघ और अन्य बड़ी बिल्ली प्रजातियों वाले देशों के साथ साझा किया जा सकता है। मिया ओका ने कहा कि ADB बड़ी बिल्ली प्रजातियों वाले देशों को एक साथ लाने, भारत के संरक्षण अनुभव को साझा करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए टिकाऊ वित्तीय अवसर विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कई देशों के विशेषज्ञ और प्रतिनिधि शामिल दो दिवसीय कार्यशाला में बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, मलेशिया, नेपाल और वियतनाम के सरकारी प्रतिनिधियों एवं अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भाग लिया।
इसके अलावा भारत के पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, विभिन्न राज्यों के वन विभागों, टाइगर रिजर्वों, विकास साझेदारों, शोधकर्ताओं, संरक्षण विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों की भी भागीदारी रही। कार्यशाला का उद्देश्य बाघ परिदृश्यों को केवल वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र के रूप में देखने के बजाय उन्हें सतत विकास, स्थानीय आय और रोजगार सृजन तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिक सुरक्षा के आधार के रूप में विकसित करने के तरीकों पर चर्चा करना है।
इस मंच पर विभिन्न देशों और क्षेत्रों के संरक्षण अनुभवों को साझा करने, क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने तथा लैंडस्केप संरक्षण के लिए नवीन दृष्टिकोण विकसित करने पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। साथ ही जैव-अर्थव्यवस्था और इकोटूरिज्म को स्थानीय समुदायों की आजीविका से जोड़कर संरक्षण को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बनाने की संभावनाओं पर भी चर्चा होगी। कार्यशाला से यह संदेश उभरकर सामने आया कि बाघ संरक्षण को स्थानीय समुदायों के हितों, प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग और आर्थिक अवसरों से जोड़कर ही दीर्घकालिक सफलता हासिल की जा सकती है।
भारत का अनुभव इस दिशा में अन्य बाघ-बहुल देशों के लिए उपयोगी मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
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