ओडिशा सरकार ने अंगुल जिले के सतकोसिया टाइगर रिजर्व से गांवों के विवादित विस्थापन और उसमें बरती गई कथित अनियमितताओं की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन किया है।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। ओडिशा सरकार ने अंगुल जिले के सतकोसिया टाइगर रिजर्व से गांवों के विवादित विस्थापन की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है।
गांवों को उनके पारंपरिक आवास से हटाने की प्रक्रिया में जबरन बेदखली, अधिकारों के उचित निपटारे और निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन में कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद यह कदम उठाया गया है।
वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से 17 अगस्त को जारी अधिसूचना में समिति के गठन की जानकारी दी गई। यह कार्रवाई ओडिशा मानवाधिकार आयोग के 9 फरवरी 2026 के आदेश के बाद की गई है।
सतकोसिया टाइगर रिजर्व के कोर और बफर क्षेत्रों में रहने वाले कई गांवों के निवासियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें अपने पुश्तैनी घरों और जमीनों से हटाया गया, जबकि वे लंबे समय से वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व में रह रहे थे।
ग्रामीणों ने विस्थापन की प्रक्रिया में ग्राम सभाओं की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति नहीं लिए जाने का आरोप लगाया। इसके साथ ही वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत उनके पारंपरिक और सामुदायिक अधिकारों के उचित निपटारे तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के निर्धारित दिशा-निर्देशों के पालन पर भी सवाल उठाए गए।
पांच सदस्यीय जांच समिति की अध्यक्षता राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अरबिंद कुमार पाढ़ी करेंगे। समिति में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के प्रधान सचिव भास्कर ज्योति सरमा, विधि विभाग के प्रधान सचिव पवित्र मोहन सामल और अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के आयुक्त-सह-सचिव बी. परमेश्वरन शामिल हैं।
पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पूर्व सदस्य सचिव अनूप नायक को स्वतंत्र विशेषज्ञ के तौर पर समिति में शामिल किया गया है।
समिति सतकोसिया टाइगर रिजर्व से जुड़े गांवों के विस्थापन की पूरी प्रक्रिया की गांववार जांच करेगी। हालांकि रायगड़ा गांव को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, क्योंकि उसका विस्थापन पहले निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार किया जा चुका था।
जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि अन्य गांवों को स्थानांतरित करने के दौरान कानून और संरक्षण संबंधी दिशा-निर्देशों का किस हद तक पालन किया गया। समिति विशेष रूप से वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की संबंधित धाराओं की समीक्षा करेगी।
इसमें धारा 38V के तहत बाघ अभयारण्यों के कोर और महत्वपूर्ण बाघ आवास क्षेत्रों से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। इसके अलावा वन अधिकार अधिनियम, 2006 और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन संबंधी दिशा-निर्देशों के पालन की भी जांच की जाएगी।
समिति यह भी देखेगी कि गांवों के विस्थापन से पहले ग्रामीणों के वन अधिकारों का विधिवत निपटारा किया गया था या नहीं और ग्राम सभाओं की वास्तविक सहमति ली गई थी या नहीं। जांच के दौरान लाभार्थियों की सूची की भी समीक्षा की जाएगी। समिति यह पता लगाएगी कि कहीं किसी पात्र परिवार को मुआवजे या पुनर्वास से बाहर तो नहीं कर दिया गया और कहीं ऐसे लोगों को लाभ तो नहीं दिया गया जो निर्धारित मानदंडों के तहत पात्र नहीं थे।
मुआवजे और पुनर्वास पैकेज की पर्याप्तता का भी मूल्यांकन किया जाएगा। यदि किसी परिवार को कम मुआवजा मिला है या उसके अधिकारों का उचित संरक्षण नहीं हुआ है तो समिति अंतर के आधार पर अतिरिक्त मुआवजा, अधिकारों की बहाली या आजीविका सहायता जैसे सुधारात्मक उपायों की सिफारिश कर सकती है।
जांच में यदि किसी अधिकारी की भूमिका में गंभीर अनियमितता सामने आती है तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश भी की जा सकती है।
इससे इस प्रक्रिया में जवाबदेही तय होने की संभावना बढ़ गई है। समिति का उद्देश्य केवल पुराने मामलों की समीक्षा करना नहीं बल्कि भविष्य में होने वाले विस्थापन के लिए अधिक पारदर्शी और अधिकार-आधारित प्रक्रिया सुनिश्चित करना भी है। सतकोसिया ओडिशा के महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में से एक है।
इसे वर्ष 2007 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। हालांकि बाघ संरक्षण के लिहाज से रिजर्व का प्रदर्शन पिछले वर्षों में गंभीर चिंता का विषय रहा है। वर्ष 2007 में यहां 12 बाघ दर्ज किए गए थे, लेकिन 2022 की बाघ गणना में सतकोसिया में एक भी बाघ नहीं मिला। बाघों की संख्या में इस भारी गिरावट ने संरक्षण व्यवस्था और आवास प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सतकोसिया में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए वर्ष 2018 में दूसरे राज्यों से बाघ लाकर बसाने की योजना भी शुरू की गई थी, लेकिन यह प्रयास अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सका। इसके बाद रिजर्व में बाघों के लिए सुरक्षित और निर्बाध आवास तैयार करने की आवश्यकता पर जोर बढ़ा।
कोर क्षेत्र में चार गांव, बफर क्षेत्र में 131 गांव और प्रभाव क्षेत्र में कई अन्य गांव लंबे समय से संरक्षण प्रबंधन के सामने चुनौती के रूप में चिन्हित किए जाते रहे हैं। हालांकि संरक्षण के लिए गांवों का पुनर्वास करने की जरूरत और ग्रामीणों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। मानवाधिकार आयोग ने भी अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि किसी भी गांव को केवल संरक्षण के नाम पर मनमाने तरीके से विस्थापित नहीं किया जा सकता।
आयोग ने जांच पूरी होने तक बफर, फ्रिंज और संबंधित अन्य गांवों से आगे किसी भी तरह के विस्थापन पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। मानवाधिकार आयोग के अनुसार बाघ संरक्षण क्षेत्र से गांवों का पुनर्वास तभी किया जाना चाहिए जब प्रक्रिया स्वैच्छिक हो, ग्रामीणों के अधिकारों का पहले उचित निपटारा किया गया हो और ग्राम सभा की वास्तविक सहमति प्राप्त की गई हो।
इसका अर्थ है कि केवल सरकारी मुआवजा पैकेज घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रभावित परिवारों को पूरी जानकारी देकर उनकी सहमति और अधिकारों को कानूनी रूप से सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा। सतकोसिया का मामला भारत में वन्यजीव संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन की व्यापक चुनौती को भी सामने लाता है।
बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए निर्बाध आवास जरूरी है, लेकिन जंगलों पर पीढ़ियों से निर्भर समुदायों के भूमि, वन और आजीविका संबंधी अधिकार भी कानून द्वारा संरक्षित हैं। ऐसे में किसी भी पुनर्वास योजना की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितने गांव खाली कराए गए, बल्कि यह भी देखना होगा कि विस्थापित परिवारों को सुरक्षित आवास, स्थायी आजीविका, उचित मुआवजा और सामाजिक सुरक्षा मिली या नहीं।
नई जांच समिति से उम्मीद है कि वह सतकोसिया में अब तक हुए गांववार विस्थापन की प्रक्रिया का विस्तृत मूल्यांकन करेगी और जिम्मेदारी तय करने के साथ भविष्य के लिए स्पष्ट दिशा भी सुझाएगी। समिति की रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि किन मामलों में नियमों का पालन हुआ, कहां प्रक्रियागत खामियां रहीं और किन परिवारों को सुधारात्मक सहायता की जरूरत है।
सतकोसिया में बाघों की वापसी और जंगलों के संरक्षण की चुनौती के बीच यह जांच एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। यदि संरक्षण योजनाओं में स्थानीय समुदायों के अधिकारों और उनकी भागीदारी को पर्याप्त महत्व दिया जाता है, तो वन्यजीव संरक्षण और मानवीय हितों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
आने वाले समय में समिति की सिफारिशें यह तय करने में अहम होंगी कि सतकोसिया में संरक्षण की अगली रणनीति केवल वन्यजीवों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाने तक सीमित रहेगी या फिर स्थानीय समुदायों के अधिकारों और आजीविका को साथ लेकर एक अधिक न्यायसंगत मॉडल विकसित किया जाएगा।
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