
ब्रिटेन के लिंकन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विकसित की ऐसी तकनीक
एनवायरमेंट पल्स टीम
जलवायु परिवर्तन से खेती को बचाने की एक नई आशा जगी है। ब्रिटेन के लिंकन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वे अधिक लवणीय परिस्थितियों में भी अच्छी तरह से काम कर सकें।
जलवायु परिवर्तन के कारण मिट्टी की लवणता बढ़ रही है, जो वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है। इस समस्या से निपटने के लिए, वैज्ञानिकों ने एक तरीका खोजा है जिससे मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को हल्के खारे पानी से सिंचित करके प्रशिक्षित किया जा सकता है। इससे वे सूक्ष्मजीव अधिक लवणीय परिस्थितियों में भी सक्रिय रह सकते हैं और फसलों की वृद्धि में मदद कर सकते हैं।
इस अध्ययन का नेतृत्व प्रोफेसर मैथ्यू गोडार्ड ने किया और यह प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका एप्लाइड एंड एनवायरनमेंटल माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन से पता चलता है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर, वर्षा के बदलते पैटर्न और बढ़ते तापमान के कारण कृषि भूमि की लवणता बढ़ रही है। लगभग 30 प्रतिशत कृषि भूमि पहले से ही लवणता से प्रभावित है और 2050 तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि मिट्टी को नियंत्रित मात्रा में हल्के खारे पानी से सिंचित करने पर सूक्ष्मजीव धीरे-धीरे नई परिस्थितियों के अनुरूप ढल जाते हैं। इससे फसलों की वृद्धि और उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव कम होता है। यह तकनीक किसानों को कम लागत वाला और व्यावहारिक समाधान प्रदान कर सकती है जो भविष्य की जलवायु परिस्थितियों के लिए खेतों को तैयार करने में मदद कर सकती है।
प्रोफेसर मैथ्यू गोडार्ड के अनुसार, यह पहली बार प्रदर्शित किया गया है कि प्राकृतिक कृषि सूक्ष्मजीव समुदायों को इस तरह विकसित किया जा सकता है कि वे जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में भी खाद्य उत्पादन को सहारा दे सकते हैं। यह तकनीक कृषि में ताजे पानी की खपत को भी कम कर सकती है और इसे फसल सुधार तथा जल प्रबंधन जैसी अन्य रणनीतियों के साथ जोड़कर टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित की जा सकती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रशिक्षित सूक्ष्मजीवों की संरचना और कार्यप्रणाली में सकारात्मक बदलाव आए, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों का चक्र बेहतर हुआ और उसकी लवणता सहन करने की क्षमता बढ़ी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि विकसित करने, किसानों की आय सुरक्षित रखने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

