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Environment Pulse > जमीन > यदि हम धरती को स्वस्थ्य रखेंगे, तो वह हमें स्वस्थ रखेगी
जमीनविचार

यदि हम धरती को स्वस्थ्य रखेंगे, तो वह हमें स्वस्थ रखेगी

Environment Pulse
Last updated: July 8, 2026 6:46 pm
Environment Pulse
Published: July 8, 2026
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 जो हम देते हैं, वही हमें वापस मिलता है-यही है प्रकृति का नियम

मांगें राम चौहान

प्रकृति एक जीवित प्रणाली है। जब हम उसे घाव देते हैं, तो वह घाव अंततः हमारे शरीर और आत्मा पर आकर लगते हैं। इसके विपरीत, जब हम पृथ्वी को चंगाई  प्रदान करते हैं, तो वह हमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से चंगाई लौटाती है। यह कोई काल्पनिक भावना नहीं, बल्कि विज्ञान और अनुभव दोनों द्वारा सिद्ध सत्य है।

आज विश्व स्तर पर जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वन कटाई और जैव विविधता का ह्रास पृथ्वी के घाव हैं। इन घावों का प्रभाव हम पर पड़ रहा है—सांस की बीमारियाँ बढ़ रही हैं, तनाव और अवसाद आम हो गए हैं, प्राकृतिक आपदाएँ लगातार हो रही हैं। लेकिन जो समुदाय और व्यक्ति पृथ्वी को हील करने में जुटे हैं, उन्हें प्रकृति अद्भुत उपहार दे रही है। वन रोपण इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। जब हम जंगलों को पुनर्स्थापित करते हैं, तो पेड़ कार्बन सोखते हैं, ऑक्सीजन देते हैं और वायु को शुद्ध करते हैं। परिणामस्वरूप हमारे फेफड़े स्वस्थ रहते हैं, श्वास रोग कम होते हैं। जंगल न केवल हवा ठंडी करते हैं बल्कि वर्षा का चक्र भी संतुलित रखते हैं। इससे सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएँ घटती हैं, जिससे हमारी फसलें और घर सुरक्षित रहते हैं।नदियों को साफ करना पृथ्वी को हील करने का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है।

जब हम गंगा, यमुना या स्थानीय नदियों से कचरा और प्रदूषण हटाते हैं, तो जल शुद्ध होता है। यह शुद्ध जल हमारे शरीर को हील करता है। स्वच्छ पानी पीने से पेट की बीमारियाँ घटती हैं, त्वचा स्वस्थ रहती है और समग्र स्वास्थ्य बेहतर होता है। साथ ही, स्वस्थ नदियाँ मछलियों और जल-पक्षियों को जीवित रखती हैं, जो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखती हैं।मिट्टी को हील करना भी उतना ही जरूरी है। रासायनिक खादों के बजाय जैविक खेती, खाद और कंपोस्टिंग अपनाने से मिट्टी की उर्वरता लौटती है। स्वस्थ मिट्टी पौष्टिक अन्न देती है, जो हमारे शरीर को बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। सूक्ष्म जीवों से भरपूर मिट्टी हमें अप्रत्यक्ष रूप से हील करती है।मानसिक स्वास्थ्य पर प्रकृति का प्रभाव सबसे गहरा है। जंगल में समय बिताना, पेड़ लगाना या नदी किनारे चलना तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) को कम करता है। शोध बताते हैं कि हरे-भरे वातावरण में रहने वाले लोगों में अवसाद और चिंता की दर कम होती है।

पृथ्वी को हील करने का कार्य हमें उद्देश्य  देता है, जो अकेलेपन और निराशा से बचाता है।भारतीय संस्कृति में यह सिद्धांत प्राचीन काल से विद्यमान है। “धरती माता” की अवधारणा हमें सिखाती है कि माता को स्वस्थ रखने वाला पुत्र स्वयं स्वस्थ रहता है। गांधीजी ने कहा था कि प्रकृति की जरूरत से ज्यादा लेना चोरी है। जब हम इस चोरी को रोकते हैं और पृथ्वी को लौटाते हैं, तो वह हमें शांति और समृद्धि देती है। आज हर व्यक्ति, समाज और सरकार को यह समझना होगा कि पृथ्वी को हील करना आत्म-रक्षा का सबसे प्रभावी तरीका है। प्रत्येक घर में पौधे लगाएँ, कचरा अलग करें, पानी बचाएँ, प्लास्टिक कम करें और जैविक जीवनशैली अपनाएँ।निष्कर्षतः, पृथ्वी और मनुष्य का संबंध माता-पुत्र का है। यदि हम माता को घावों से मुक्त रखेंगे, तो वह हमें निरोगी, प्रसन्न और संतुलित जीवन देगी। यह reciprocity का नियम है—जो हम देते हैं, वही हमें लौटता है। पृथ्वी को हील रखने का कार्य न केवल हमारा नैतिक दायित्व है, बल्कि हमारे स्वस्थ भविष्य की गारंटी भी है।जब हम पृथ्वी को हील करेंगे, तभी पृथ्वी हमें सचमुच हील करेगी।

(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में प्रशासनिक अधिकारी हैं।) 

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