काराकोरम रेंज में ब्रॉड पीक की गोद में एक भीषण हिमस्खलन का शिकार बन गए
दुनिया के सबसे कठिन पहाड़ों को अपनी मुट्ठी में करके बनाया था खास रिकार्ड
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
वो पहाड़ चढ़ते भी थे उनको पहाड़ों से बात करना भी अच्छा लगता था। उस दिन भी एक और पर्वत को फतह करने वह निकले थे। निकलने से पहले उन्होंने एक बार चोटी को कोटि-कोटि नमन करके इतना कहा था कि उन्हें जाने का रास्ता दें और लौटने का भी। उन्हें क्या पता था की पहाड़ उन्हें अपने गोद में ही समेट लेगा। ब्रॉड पीक पर चढ़ने से पहले उन्होंने इंस्टाग्राम पर लिखा -बस सुरक्षित रास्ता दे देना, चढ़ने और उतरने का। पहाड़ ने वो गुज़ारिश नहीं सुनी।
निर्मल उस दिन निकले तो बहुत साथ लेकिन पाकिस्तान के काराकोरम रेंज में ब्रॉड पीक की गोद में वह हमेशा के लिए समा गए। वह एक भीषण हिमस्खलन का शिकार बन गए। उनके साथ मौजूद नौ अन्य पर्वतारोहियों ने भी अपनी जान गवई। निर्मल सिर्फ 43 वर्ष के थे।
नेपाल के म्याग्दी जिले के दाना गांव में जन्मे निम्स का जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता गोरखा सैनिक थे। जब पिता ने अंतर्जातीय विवाह किया तो उसका प्रभाव परिवार पर पड़ा और ज़ाहिर तौर पर निर्मल ने भी उसका दुष्परिणाम भुगता। सामाजिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर संघर्ष जीवन में रहा। लेकिन जो बच्चा गरीबी और भेदभाव के साये में बड़ा हुआ, वही आगे चलकर दुनिया के सबसे कठिन पहाड़ों को अपनी मुट्ठी में करने वाला बना।
परिवार के लिए बहुत ही गौरव भरा पल तब बना जब निर्मल 2003 में ब्रिटिश आर्मी की गोरखा ब्रिगेड में शामिल हुए, और 2009 में रॉयल नेवी की एलीट स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में जगह बनाने वाले पहले गोरखा बने। सर्द जंग के इस विशेषज्ञ ने 2018 में फौज छोड़ी — पहाड़ों के लिए, हमेशा के लिए।
ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट तब आया जब 2019 में “प्रोजेक्ट पॉसिबल” के तहत उन्होंने सभी 14 आठ-हज़ारी चोटियाँ महज़ छह महीने छह दिन में फतह कर लीं। जिसने कभी ज़िन्दगी के आज वह दुनिया को शिखर से देख रहा था। एवरेस्ट, ल्होत्से और मकालू — तीन विशाल चोटियाँ महज़ 48 घंटों के भीतर।
शायद इसी कामयाबी नतीजा था की नेटफ्लिक्स की डॉक्यूमेंट्री “14 पीक्स: नथिंग इज़ इम्पॉसिबल” में उनकी कहानी दुनिया के करोड़ों घरों तक पहुँचा। जनवरी 2021 में वे K2 की सर्दियों में पहली सफल चढ़ाई करने वाली टीम का हिस्सा बने। गौरतलब है की ये कीर्तिमान उनहोंने बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के हासिल किया । जीवन के अंत तक उनके नाम 56-57 आठ-हज़ारी सफल चढ़ाइयाँ दर्ज हो चुकी थीं। उन्होंने एलीट एक्सपेड की स्थापना की और निम्सदाई फाउंडेशन के ज़रिए पहाड़ी समुदायों और पर्यावरण के लिए काम किया। 2018 में उन्हें अत्यधिक ऊँचाई पर्वतारोहण में योगदान के लिए MBE से सम्मानित किया गया।
निम्स सिर्फ एक पर्वतारोही नहीं थे। वे लोगों के लिए एक मिसाल थे कुछ भी असंभव नहीं है। उन्होंने शेरपाओं और नेपाली पर्वतारोहियों को वो पहचान दिलाई जो दशकों से उनका हक़ था। हालांकि वह किसी पहचान के मोहताज नहीं थे लेकिन उनको पश्चिमी मीडिया अक्सर नज़रअंदाज़ करता रहा। उनकी सैन्य अनुशासन और अटूट जज़्बे ने आधुनिक पर्वतारोहण की परिभाषा ही बदल दी।
अपने अंतिम अभियान “हैट-ट्रिक चैलेंज” के चलते, निम्स अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए उसी पहाड़ पर गए जहाँ से वापसी नहीं हुई। उनकी पत्नी सुचि और उनकी बेटी को वह छोड़ गए और रह गया एक अधूरा सफर। अपने पीछे वह एक विरासत छोड़ गए जो अब हर उस युवा शेरपा और पर्वतारोही में जिंदा रहेगी।
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