सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की नई रिपोर्ट ‘Beyond Baseload: Reforming Thermal PPAs for India’s Energy Transition’ के अनुसार, पुराने और कठोर दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते (PPAs) भारत के ऊर्जा संक्रमण में एक बड़ी बाधा बन रहे हैं।
एनवायरमेंट पल्स डेस्क। भारत के ऊर्जा संक्रमण की राह में कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों के पुराने दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते (PPA) बड़ी बाधा बन रहे हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के एक नए अध्ययन के अनुसार, इन कठोर समझौतों के कारण बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMs) दशकों तक तय भुगतान करने के लिए बाध्य हैं, जबकि सौर ऊर्जा उत्पादन बढ़ने से दिन के समय कोयला आधारित बिजली की जरूरत लगातार घट रही है।
CSE की रिपोर्ट ‘Beyond Baseload: Reforming Thermal PPAs for India’s Energy Transition’ में कहा गया है कि ये अनुबंध उस दौर के लिए बनाए गए थे, जब देश में बिजली की कमी थी और कोयला संयंत्रों से लगातार बेसलोड बिजली उत्पादन पर अधिक निर्भरता थी। मौजूदा ऊर्जा व्यवस्था में, जहां नवीकरणीय ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है, वही व्यवस्था अब अक्षय ऊर्जा को ग्रिड में शामिल करने में बाधा डाल रही है।
इससे बिजली व्यवस्था की लागत बढ़ने और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों पर असर पड़ने का खतरा है। अध्ययन के लिए आठ राज्यों से प्राप्त सूचना के अधिकार (RTI) के जवाबों का विश्लेषण किया गया। इसमें कुल 67.1 गीगावाट थर्मल क्षमता को शामिल किया गया। अध्ययन के मुताबिक, इसमें से 6.1 गीगावाट क्षमता के लिए 2040 या उसके बाद तक के अनुबंध मौजूद हैं। इससे बिजली क्षेत्र में लंबे समय का ‘लॉक-इन’ पैदा हो रहा है। CSE के अनुसार, मौजूदा PPAs के तहत संयंत्रों को उनकी पूरी क्षमता से संचालित न किए जाने पर भी निश्चित क्षमता शुल्क का भुगतान करना पड़ता है।
यह स्थिति ऐसे समय में है जब अधिक सौर उत्पादन वाले घंटों में देश में अतिरिक्त कोयला क्षमता 80 गीगावाट तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा समझौते अभी भी बेसलोड बिजली उत्पादन की पुरानी सोच को प्रतिबिंबित करते हैं, जबकि अब कोयला संयंत्रों की भूमिका नवीकरणीय ऊर्जा के पूरक के रूप में अधिक लचीले ढंग से संचालन करने की हो रही है।
अध्ययन के मुताबिक, किसी सामान्य कोयला आधारित PPA की अवधि 11 वर्ष से बढ़ाकर 25 वर्ष करने से सालाना क्षमता शुल्क कम दिखाई दे सकता है, लेकिन लंबी अवधि के कारण उपभोक्ताओं द्वारा किया जाने वाला कुल भुगतान दोगुने से अधिक हो सकता है। CSE के कार्यक्रम निदेशक निवित के. यादव ने कहा कि भारत के पास इन अनुबंधों में सुधार करने का बेहतर अवसर है, क्योंकि देश की अधिकांश कोयला बिजली क्षमता और बिजली वितरण कंपनियां अभी भी सरकारी स्वामित्व में हैं। संस्था ने आधुनिक थर्मल PPA व्यवस्था विकसित करने की सिफारिश की है, जिसमें अनिवार्य पोर्टफोलियो समीक्षा, स्वैच्छिक पुनर्विचार के स्पष्ट सिद्धांत और अधिक दक्ष, लचीली तथा कम-कार्बन वाली ताप विद्युत को प्रोत्साहन देने के प्रावधान शामिल हों।
CSE ने 21 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय संवाद के दौरान इस अध्ययन के साथ कोयला संयंत्रों को अधिक लचीला बनाने पर एक अन्य रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग, GRID-India, NTPC और अन्य संबंधित संस्थानों के विशेषज्ञों ने चर्चा में हिस्सा लिया। बैठक में इस बात पर विचार किया गया कि थर्मल PPAs में सुधार और कोयला संयंत्रों के अधिक लचीले संचालन से नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड में अधिक मात्रा में शामिल करने के साथ उपभोक्ताओं की लागत को नियंत्रित कैसे रखा जा सकता है।
CSE का कहना है कि अनुबंधों में निश्चितता और जरूरत के मुताबिक बदलाव की क्षमता एक साथ संभव है। यदि सुधार नहीं किए गए, तो कम इस्तेमाल होने वाले संयंत्रों को लगातार निश्चित लागत का भुगतान बिजली की वास्तविक लागत बढ़ा सकता है और भारत के नवीकरणीय ऊर्जा आधारित बिजली तंत्र की ओर बढ़ने की गति को धीमा कर सकता है। संगठन ने भविष्य के थर्मल PPAs के लिए छोटी अनुबंध अवधि, प्रदर्शन आधारित प्रावधान और ऐसे तंत्र की सिफारिश की है, जिनसे नई बिजली इकाइयां पुराने और बदलती ऊर्जा जरूरतों के अनुरूप न रहने वाले समझौतों में स्वतः शामिल न हों।
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