मौसम का मिजाज समझना हमेशा से वैज्ञानिकों के लिए एक अबूझ पहेली रहा है, लेकिन अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इस चुनौती को आसान बनाने जा रही है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में, जहां मानसून न केवल खेती बल्कि देश की आर्थिकी, महंगाई और शेयर बाजार की दिशा तय करता है, वहां एआई तकनीक के जरिए मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने की नई शुरुआत हुई है। जानिए कैसे बदल रहा है मौसम के पूर्वानुमान का विज्ञान। बता रही हैं नवधा श्रीवास्तव।

नवधा श्रीवास्तव
मौसम दो दूनी चार जैसा गणितीय विज्ञान नहीं है। बहुधा हमें अनुमान और संभावना से इतर मौसम में अप्रत्याशित रूप से व्यापक बदलाव देखने को मिलते हैं। कई बार तो मौसम का मिजाज अबूझ पहेली की तरह होता है। कौन की घटना किस वजह से हुई यह कह पाना मुश्किल होता है। रेगिस्तान में भारी बारिश हो जाना, गर्म क्षेत्रों में बर्फबारी, भारी वर्षा क्षेत्र में सूखा पड़ना, कहीं एकाएक बादल फट जाना जैसी घटनाएं अनुत्तरित रह जाती हैं। यही वजह है कि मौसम की सटीक जानकारी और पूर्वानुमान वैज्ञानिकों के लिए भी चुनौती का सबब बने हुए हैं। चूंकि भारत में मानसून मौसम का मिजाज ही नहीं, बल्कि खेती-बाड़ी, कृषि उत्पादन, आर्थिकी जैसी अनेक महत्वपूर्ण चीजों की दशा और दिशा भी तय करता है। कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि भारत में मौसम का पूर्वानुमान महंगाई, जमाखोरी, सट्टा बाजार और शेयर मार्केट का भी रुख तय करता है। लिहाजा भारत में मौसम की सटीक भविष्यवाणी का खास महत्व है। भारतीय वैज्ञानिकों ने अब मौसम, खासतौर पर मानसून की सटीक भविष्य वाणी करने में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) यानि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करना शुरू किया है। इसकी तफ्सील में जाने से पहले मौसम से जुड़े कुछ पहलुओं की जानकारी जरूरी है।
मौसम शब्द अरबी भाषा से आया है…
मौसम अरबी भाषा का शब्द है। इसका अरबी उच्चारण मौसिम किया जाता है। इसका अर्थ होता है ऋतु अथवा समय। अंग्रेजी शब्द मानसून शब्द इसी मौसम शब्द की कोख से निकला है। इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। जब हम भाषा विज्ञान पढ़ते हैं तो पता चलता है कि विश्व की मूल भाषाएं संस्कृत, अरबी और लैटिन एक ही परिवार की भाषाएं हैं। कुछ लम्हों, घंटों अथवा दिनों की वायुमंडलीय हलचलों को मौसम कहा जाता है। जब यह किसी क्षेत्र विशेष में तीस से ज्यादा वर्षों तक नियमित रूप से कायम रहता है तो उसे जलवायु की संज्ञा दी जाती है।
प्राचीन काल से ही इंसान के लिए अहम रहा है मौसम का पूर्वानुमान
मानव सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथों जैसे वेद, अवेस्ता आदि में मौसम अथवा जलवायु को प्रभावित करने वाले कारकों की पूजा की जाती थी। इंद्र (बादल), सूर्य (प्रकाश), वरुण (जल) के कारक कहे जाने वाले देवताओं का वैदिक काल में बहुत महत्व था। यूनानी और फारस की सभ्यता में भी बिजली, वर्षा के देवता थे जिनकी पूजा की जाती थी। वाल्मीकि कृत रामायण और व्यास कृत महाभारत में भी मौसम के प्रभाव का वर्णन मिलता है। भारत में 3000 ईसा पूर्व यानि साढ़े पांच हजार साल से भी ज्यादा समय पूर्व के माने जाने वाले उपनिषदों में पानी के वाष्प बनने से बादलों के बनने की प्रक्रिया और दोबारा वर्षा के माध्यम से धरती पर जल बरसने का सांगोपांग वर्णन है। वाराहमिहिर ने 600 ईस्वी में वृहद् संहिता में भी बादल बनने के कारणों की समीक्षा की।
पश्चिमी जगत में भी मौसम का पूर्वानुमान बहुत पुराना
लगभग 650 ईसा पूर्व बेबिलोन की सभ्यता के लोगों ने बादलों को देखकर मौसम का पूर्वानुमान लगाना शुरू कर दिया था। 350 ईसा पूर्व महान विद्वान और दार्शनिक अरस्तू ने मौसम की विवेचना और विश्लेषण करने वाला मेट्रोलॉजिका नाम का ग्रंथ लिखा। मौजूदा समय में मौसम विज्ञान को मेट्रोलॉजी कहा जाता है। वह इसी ग्रंथ की देन है।
आधुनिक समय में मौसम की पहली भविष्यवाणी
अभिलेखों के अनुसार पहली बार मौसम का आधिकारिक व वैज्ञानिक पूर्वानुमान ब्रिटेन से निकलने वाले अखबार द टाइम्स में 1 अगस्त, 1861 को प्रकाशित हुआ था। इसको प्रकाशित करने वाले थे ब्रिटेन के नौ सेना अफसर रॉबर्ट फिट्जरॉय। रॉबर्ट को ही आधुनिक मौसम विज्ञान का जनक माना जाता है।
भारत में 1875 में मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की गई आईएमडी यानि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना 1875 में भारत में व्यापार करने आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने तत्कालीन कलकत्ता (कोलकाता) में की थी। इसका महत्व दो साल बाद ही 1877 में पड़े देश में भारी सूखे के समय उजागर हो गया था। उस वक्त मानसून और बारिश का पूर्वानुमान लगाने की कोशिश की गई थी। कलकत्ता के बाद अंग्रेजों ने मद्रास (चेन्नई) और बांबे ( मुंबई) में मौसम केंद्र खोले। आईएमडी ने 2025 में अपनी स्थापना का 150वां साल बड़ी धूमधाम से मनाया था। इन 151 वर्षों में आईएमडी ने मौसम विज्ञान के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं। कोलकाता से मौसम विभाग का मुख्यालय पहले पुणे स्थानांतरित हुआ। मौजूदा समय में इसका मुख्यालय नई दिल्ली स्थित मौसम भवन में है।
कैसे की जाती है मौसम की भविष्यवाणी ?
मौजूदा दौर में मौसम की भविष्यवाणी विभिन्न गणितीय मॉडलों, अत्याधुनिक सुपर कंप्यूटरों और मौसम उपग्रहों के माध्यम से होती है। आईएमडी (मौसम विज्ञान विभाग) का पुणे केंद्र सैटेलाइट से मिले चित्रों का विश्लेषण करके पूरे देश में स्थापित स्थानीय केंद्रों को मौसम की भविष्यवाणी, मानसून की चाल आदि का डाटा प्रेषित करता है। मौसम विभाग पूर्वानुमान और भविष्यवाणी के लिए जिन चीजों पर निर्भर रहता है, उन्हें जान लें—
स्थानीय केंद्रों से डाटा का संग्रह
आईएमडी ने देश भर में अनेक स्थानीय स्वचालित केंद्र स्थापित किए हैं। ये केंद्र हवा की गति, तापमान और नमी नापते रहते हैं और डाटा मुख्य केंद्र को भेजते रहते हैं।
वेदर बैलून
मौसम विज्ञान विभाग वायुमंडल के ऊपरी हिस्सों का जायजा लेने के लिए विशेष गुब्बारे भी समय-समय पर छोड़ता रहता है। ये आकाश में ऊंचे उड़कर मौसम की जरूरी जानकारी देते रहते हैं।
डॉपलर रडार
भारत के पास अत्याधुनिक डॉपलर रडार हैं जो वर्षा, चक्रवात व प्रति चक्रवात (साइक्लोन व एंटी साइक्लोन), तूफान आदि की सटीक जानकारी देते हैं।
उपग्रह (सैटेलाइट)
हम सभी जानते हैं कि भारत उपग्रहों के प्रक्षेपण में दुनिया के अग्रणी देशों में शुमार है। इनसैट श्रेणी के उपग्रह मौसम की सटीक जानकारी के लिए ही धरती की कक्षा में भेजे जाते हैं। इनसैट-3 डी और इनसैट 3 डीआर के जरिए बादलों की जीवंत तस्वीरें, वायुमंडलीय तापमान की जानकारी भेजते रहते हैं।
सुपर कंप्यूटर और गणितीय मॉडल
किसी समय भारत सुपर कंप्यूटर के लिए अमेरिका का मोहताज था। लेकिन अब इसके पास अपने मिहिर और प्रत्यूष नाम के सुपर कंप्यूटर हैं। ये सेकेंडों में अरबों गणनाएं कर सकते हैं। बीते सौ साल या ज्यादा के मौसम अनुभवों को ये कंप्यूटर चुटकियों में विश्लेषित करके अगले दिनों का पूर्वानुमान रख देते हैं।
देश की क्षमता पांच दिनों तक के मौसम की सटीक पूर्वानुमान की
भारत की मौजूदा समय में मौसम के सटीक भविष्यवाणी करने की क्षमता तीन से पांच दिनों तक की है। पांच दिन के पूर्वानुमान लगभग 90 फीसदी तक सही होते हैं। मौसम विज्ञान के क्षेत्र में भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा खिलाड़ी है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) की एजेंसी विश्व मेट्रोलॉजिकल संगठन ( डब्ल्यूएमओ) के नियमों के अनुसार भारत को मौसम की जानकारी अपने पड़ोसी देशों, अरब देशों व अन्य एशियाई देशों को साझा करनी पड़ती है। पाकिस्तान भारत का दुश्मन देश है, मगर डब्ल्यूएमओ के नियमों के अनुसार भारत को मौसम की जानकारी पाकिस्तान को भी देनी पड़ती है। कई बार भारत की सटीक भविष्यवाणियों की वजह से पाकिस्तान भारी नुकसान से बच गया है।
अमेरिका और यूरोपीय देश 7 दिन पहले का सटीक पूर्वानुमान कर सकते हैं
अमेरिका और यूरोपीय देश भारत की अपेक्षा दो दिन पहले तक का पूर्वानुमान करने की क्षमता रखते हैं। इसका काफी लाभ होता है। अमेरिकी और यूरोपीय देशों के मौसम पूर्वानुमानों की सटीकता 95 फीसदी से ज्यादा की बताई जाती है। मिशन मौसम, नए उपग्रह, मॉडल्स और एआई का उपयोग भारत ने मौसम की सटीक जानकारी और पूर्वानुमान के लिए मिशन मौसम लांच किया है। इसके तहत पूर्वानुमान के क्षेत्र में कई बदलाव किए गए हैं। पुणे में विकसित भारत फोरकास्ट सिस्टम मॉडल के जरिए पहले से ज्यादा सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। इसे दुनिया के सबसे उन्नत मौसम मॉडलों में शुमार किया गया है। नया सुपर कंप्यूटर अर्क अब एक छोटे गांव या ब्लॉक मौसम का सटीक पूर्वानुमान देने में सक्षम है।
मानसून के पूर्वानुमान में एआई का उपयोग
भारत में पहली बार मौसम के पूर्वानुमान में एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की मदद लेने की शुरुआत की गई है। दावा किया जा रहा है कि इस एआई तकनीकी से भारत के 16 राज्यों के 3000 उपजिलों में 4 सप्ताह पूर्व मानसून के मार्ग, उसकी गति और बारिश का सटीक अनुमान लगाया जा रहा है। कई मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि एआई मौसम के सटीक पूर्वानुमान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ले आएगा। उसका अनुमान किसी भी इंसानी मॉडल से ज्यादा सटीक होगा।
(लेखिका पेट्रोलियम विश्वविद्यालय, देहरादून की स्नातक और डॉटा विश्लेषण विशेषज्ञ हैं)

