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Reading: सांस्कृतिक विरासतों पर जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का प्रभाव
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Environment Pulse > फ्यूचर ग्रीन > सस्टेनिबिलिटी > सांस्कृतिक विरासतों पर जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का प्रभाव
एनवायरमेंट पल्स डेस्क
सस्टेनिबिलिटीस्टोरीहवा

सांस्कृतिक विरासतों पर जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण का प्रभाव

Environment Pulse
Last updated: August 7, 2026 10:14 pm
Environment Pulse
Published: August 7, 2026
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एनवायरमेंट पल्स डेस्क
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वायु प्रदूषण दिल्ली स्थित हुमायूँ के मकबरे को गंभीर रूप से क्षति पहुँचा रहा है

प्रदूषण के कारण इसके बलुआ पत्थर की सतह पर ‘काली परत’ जम रही है

एनवायरमेंट पल्स डेस्क

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ आर्किटेक्चरल हेरिटेज में एक नया स्टडी ये बता है की वायु प्रदूषण दिल्ली स्थित हुमायूँ के मकबरे को गंभीर रूप से क्षति पहुँचा रहा है। जब कारन पता करने की कोशिश की गयी तो पाया गया कि प्रदूषण के कारण इसके बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) की सतह पर ‘काली परत’ (ब्लैक क्रस्ट) जम रही है।

इस अध्ययन का शीर्षक “हुमायूँ के मकबरे पर वायु प्रदूषण के प्रभाव का आकलन करने हेतु काली पपड़ी के अभिलक्षणन (Characterization) की एक विश्लेषणात्मक विधि” है। इस शोध से आने वाले समय में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल और अन्य स्मारकों के संरक्षण के लिए साक्ष्य-आधारित रणनीतियाँ बनाने में मददगार साबित होगा। ये पूरा रिसर्च किया है IIT कानपुर और IIT रुड़की के शोधकर्ताओं ने ।

स्पष्ट तौर पर बात हुमायूँ के मकबरे की बात हुई है , पर ये अकेला नहीं है।  विश्व भर में सांस्कृतिक स्थल नई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जहाँ एथेंस में वायु प्रदूषण संगमरमर को नष्ट कर रहा है, वहीं वेनिस पर समुद्र के बढ़ते जलस्तर का खतरा मंडरा रहा है। ऐसा भी माना जा रहा है कि वर्षा चक्र में बदलाव के कारण कई पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण कठिन होता जा रहा है।

1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित ‘एथेंस का एक्रोपोलिस’ शास्त्रीय सभ्यता का प्रतीक है, जिसने पश्चिमी वास्तुकला और लोकतंत्र की नींव रखी। हालाँकि, इसके प्रसिद्ध सफेद पेंटेलिक संगमरमर से बने स्मारक, जैसे कि पार्थेनन और एरेचथियन, वायु प्रदूषण के कारण खतरे में हैं।

वाहनों और उद्योगों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड गैस संगमरमर के साथ प्रतिक्रिया कर जिप्सम बनाती है। इससे स्मारकों पर काली पपड़ी जम जाती है, जो प्रदूषकों को सोख लेती है और पत्थर के क्षरण को तेज कर देती है।

रोमन इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण ‘कोलोसियम’ प्रतिवर्ष 1.2 करोड़ से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करता है। 1980 में यूनेस्को की सूची में शामिल इस 2,000 साल पुराने एम्फीथिएटर को बढ़ते तापमान, शहरी प्रदूषण और अत्यधिक पर्यटन से नुकसान पहुँच रहा है।

1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा प्राप्त यह शहर समुद्र के बढ़ते जलस्तर और बार-बार आने वाली बाढ़ से जूझ रहा है। पिछली शताब्दी में यह शहर लगभग 23 सेमी डूब चुका है।

यहाँ की इमारतें छिद्रपूर्ण (Porous) सामग्री से बनी हैं। शहर की सुरक्षा के लिए इटली ने MOSE प्रोजेक्ट (मोबाइल फ्लड बैरियर सिस्टम) विकसित किया है।

Also Read: वर्जिनिया में एक नयी तरह की हरित क्रांति

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